नई दिल्ली। समाजसेवी और लेखिका सुधा मूर्ति ने एक छात्र की पढ़ाई-लिखाई का खर्चा उठाने का फैसला किया था तब वह यह नहीं जानती थीं कि वही छात्र एक दिन उन्हें ईमानदारी पर एक अहम सीख देगा. पढ़ाई-लिखाई में बेहद तेज छात्र हनुमनथप्पा पहली बार सुधा की नजर में तब आया जब कर्नाटक में दसवीं बोर्ड की परीक्षा में आठवीं रैंक पाने पर अखबार में उसकी तस्वीर प्रकाशित हुई. Also Read - India Railway: बेंगलुरु-दिल्ली के बीच 19 सितंबर से चलेगी किसान रेल, जानें किन-किन राज्यों से कब गुजरेगी

छात्रा के पिता कमाते थे सिर्फ 40 रुपये रोजाना Also Read - Bengaluru Riots: 60 और आरोपी अरेस्‍ट, अब तक कुल 206 लोग गिरफ्तार

मूर्ति ने अपनी नई किताब ‘हेयर, देयर एंड एवरीवेयर’ में लिखा है, वह कमजोर और मुरझाया हुआ था लेकिन उसकी आंखों में एक खास चमक थी. उसके पिता एक कुली थे और पांच बच्चों में वह सबसे बड़ा था. उसके पिता केवल 40 रुपये रोजाना कमाते थे. Also Read - Karnataka Covid-19: बेंगलुरु में बढ़ रहे कोविड-19 के मामलों पर सरकार ने कहा-अंतर राज्यीय यात्री हैं जिम्मेदार

उन्होंने लिखा कि आर्थिक तंगी के कारण लड़के को दसवीं के बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ी. इसके बाद सुधा ने छात्र को बेंगलुरू के अपने दफ्तर में बुलाया और कहा कि वह जो भी पढ़ाई करना चाहता है और जब भी करना चाहता है, उसका पूरा खर्च वह उठाएंगी. आदिवासी बच्चे के सामने ढेरों विकल्प थे लेकिन उसने चुना रामपुरा में अपने घर के नजदीक टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज को जहां का खर्च था महज 300 रुपये प्रतिमाह.

छात्र ने भेजा बकाया पैसा

कुछ दिन बाद सुधा को एक लिफाफा मिला जिसमें कुछ रुपए थे. इसके साथ एक पत्र भी था जिसमें हनुमनथप्पा ने लिखा था, मैडम मैं दो महीने से बेल्लारी में नहीं था, पहले महीने तो हमारे कॉलेज में अवकाश था और दूसरे महीने हड़ताल के कारण कॉलेज बंद था. इस दौरान मेरा खर्च 300 रुपये प्रतिमाह से भी कम था. मैं आपको बचे हुए 300 रुपये भेज रहा हूं.

सुधा बच्चे की ईमानदारी से बेहद प्रभावित हुईं. उन्होंने पीटीआई को दिए साक्षात्कार में कहा, मेरे काम में 80 फीसदी से ज्यादा समय लोग धोखा देते हैं, वह पैसा लेकर भाग जाते हैं, झूठ बोलते हैं, हां कुछ अच्छी बातें भी होती हैं. मैंने अच्छी और सकारात्मक चीजों के बारे में लिखने का फैसला किया.