क्या आप जानते है की सीता रावण की बेटी थी। अगर नहीं जानते तो आज हम आपको दशहरा के पावन अवसर पर रावण और सीता के बीच रिश्ते की हक़ीक़त बताएंगे। रामायण के प्रतिनायक रावण में बहुत से श्रेष्ठ गुण होते हुए भी उसके कर्मो ने उसकी सारी अच्छाइयों पर पानी फेर दिया। अगर रावण पर पराई नारी मतलब सीता के हरण का दोष ना होता तो रावण का चरित्र आज हमारे नज़रों में कुछ और ही होता।

रावण ने अपने खुद की मृत्यु की कामना की थी। अब आप सोच रहे होंगे की ऐसा तो अपने कभी सुना ही नहीं हैं। तो हम आपको बता दे कि -अद्भुत रामायण 8-12 में रावण ने कहा है कि “जब मै अज्ञान से अपनी कन्या के ही स्वीकार की इच्छा करूं तब मेरी मृत्यु हो।” और ऐसी भूल अज्ञान के चलते रावण ने कि सीता का हरण किया जो की उसकी बेटी थी।

दण्डकारण्य मे गृत्स्मद नामक ब्राह्मण थे जो माँ लक्ष्मी को अपनी बेटी के रूप में पाना चाहते थे। इस कारण एक कलश मे कुश के अग्र भाग से मंत्रोच्चारण के साथ दूध की बूँदें डालता था की उस कलश में माँ उनकी बेटी रूप में जन्म ले। लेकिन एक दिन उसकी अनुपस्थिति मे रावण वहाँ पहुँचा और ऋषियों को तेजहत करने के लिये उन्हें घायल कर उनका रक्त उसी कलश मे एकत्र कर लंका ले गया। कलश को उसने मंदोदरी के संरक्षण मे दे दिया-यह कह कर कि यह तीक्ष्ण विष है,सावधानी से रखे। यह भी पढ़ें: माँ सिद्धिदात्री को प्रसन्न करने के उपाय

रावण से परेशान हो कर मंदोदरी ने अपने प्राण त्यागने के लिए वह कलश का पदार्थ पी लिया। मंत्रोच्चारण वाले लक्ष्मी के आधारभूत दूध से मिले होने के कारण उसका प्रभाव पडा। मन्दोदरी के गर्भ में लक्ष्मी प्रकट होने लगी और अनिष्ठ की आशंकाओं से भयभीत मंदोदरी ने, कुरुश्क्षेत्र जाकर उस भ्रूण को एक कलश में रख धरती मे गाड दिया और सरस्वती नदी मे नहाकर चली आई।

राजा जनक के राज्य में अकाल पड़ा था और पंडितों ने उन्हें हल चलाने की सलाह दी। राजा जनक ने जब कुरुश्क्षेत्र के डरते पर हल चलाया तब हल में लगे सीता से एक कलह के फूटने की आवाज़ आई जब रुक कर राजा ने देखा तब उस में एक नन्ही बच्ची मिली, जैसे की राजा की कोई संतान नहीं थी उस कारण राजा ने उस बच्ची को अपने पुत्री के रूप में स्वीकार किया और सिता जो कि हल का एक निचला भाग होता है उस पर उसका नाम रखा गया “सीता”।

इस प्रकार से माँ सीता थी रावण की बेटी और भले अज्ञानता के कारण ही सही पर रावण ने अपनी ही बेटी का किया था हरण। जैसे की रावण ने अद्भुत रामायण 8-12 में कहा था वैसे ही उसके साथ हुआ। रावण की मृत्यु हुए उसके ही दोष के कारण क्योकि रावण ने किया था सीता का हरण जो की उसकी थी अपनी बेटी। कहा जाता है कि रावण जैसे ज्ञानी को अपने मृत्यु का कारण पहले से पता था। विष्णु के अवतार राम के हाथों उद्धार पाने के लिए रावण ने किया यह पाप था। कहानियों की मने तो रावण और कुंभकर्ण वास्तव में वैकुण्ठ लोग के द्वारपाल थे जिन्हें किसी गलती के कारण यह श्राप पाया था की वह 3 जन्म इस धरती पर लेने विष्णु के शत्रु के रूप में और तीनों समय भगवान उनका संहार कर उन्हें मुक्ति के पास पहुचाएंगे।