जयपुर: नरेगा में मजदूरी कर जीवन यापन करने वाला एक 70 वर्षीय मजदूर, संपत्ति के नाम पर कुछ भी नहीं. आंखों की रोशनी पर उम्र का असर भले ही आ गया हो लेकिन उम्मीद की लौ रौशन है. यौवन कब का ढल चुका है लेकिन बदलाव लाने की आशा संजोये है. ये कहानी है राजस्थान के तीतर सिंह की जो राजस्थान के एक छोटे से गांव गुलाबेवाला का रहने वाला है.

सामान्य दिनों में वह सरकार की रोजगार गारंटी योजना नरेगा में दिहाड़ी या जमींदारों के यहां मजदूरी करके जीवन यापन करता है. लेकिन चुनाव आते ही उसके सपने जग जाते हैं, उसकी भूमिका बदल जाती है. वह उम्मीदवार होता है, प्रचार करता है, वोट मांगता है और बदलाव लाने का वादा करता है. पिछले कई दशकों से ऐसा हो रहा है वो हर बार शिकस्त खाता है लेकिन हिम्मत नहीं हरता. तीतर सिंह बताते हैं कि सरपंची से लेकर सांसदी तक वह कुल मिलाकर 25 चुनाव लड़ चुके हैं. इस विधानसभा चुनाव में फिर जीत की उम्मीद के साथ मैदान में है.

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सब कुछ निल सिवाय उम्मीद के !
लोकतंत्र की खूबियों और खामियों को एक साथ सामने लाने वाली यह कहानी जिस 70 वर्षीय तीतर सिंह की है उसके पास नकदी के नाम पर कुछ भी नहीं है और न जमीन जायदाद के नाम पर कुछ है. कुल मिला के न तो जेब में फूटी कौड़ी और न जमीन का एक इंच टुकड़ा फिर भी उम्मीदें है. निर्वाचन आयोग को दिए गए हलफनामे में मालमत्ते वाले खानों में ‘निल, निल, निल’ लिखा दूर से ही दिखता है. उसका गांव श्रीगंगानगर जिले की करणपुर तहसील में है जहां से वह निर्दलीय उम्मीदवार है.

टूटी फूटी हिंदी और मिली जुली पंजाबी बोलने वाले तीतर सिंह ने बताया कि यह उनका पचीसवां चुनाव होगा. वह सरपंची के तीन, जिला परिषद के तीन, लोकसभा के नौ और विधानसभा के दस चुनाव लड़ चुके हैं. हर बार की तरह इस बार भी उन्हें अपनी जीत का भरोसा है ‘क्योंकि भाजपा व कांग्रेस से निराश लोग उन्हें वोट देंगे.’ तीतर सिंह को सरकार की ओर से पांच सौ रुपये महीने की वृद्धावस्था पेंशन मिलती है. लेकिन चुनाव का काम चंदे और सहयोग से चलता है. उनके परिवार में तीन लड़के और दो लड़कियां हैं, जिनकी शादी हो चुकी है. बेटे भी दिहाड़ी मजदूरी करते हैं और पोतियां स्कूल जाती हैं.

भैरों सिंह शेखावत के खिलाफ लड़ चुके हैं चुनाव
तीतर सिंह की चुनाव लड़ने की जिद सत्तर के दशक में तब शुरू हुई जब वह जवान थे और उन जैसे अनेक लोग नहरी इलाकों में जमीन आवंटन से वंचित रह गए. उनकी मांग रही कि सरकार भूमिहीन, गरीब मजदूरों को जमीन आवंटित करे. इसी मांग और मंशा के साथ उन्होंने चुनाव लड़ना शुरू किया और फिर तो मानों इसकी आदत हो गई. एक के बाद एक चुनाव लड़े. तीतर सिंह बड़े गर्व से बताते हैं कि वे भैरों सिंह शेखावत के खिलाफ भी चुनाव मैदान में उतर चुके हैं. बरसों से उनके साथ काम कर रहे बाबूराम बताते हैं ‘‘तीतर सिंह दिल के बड़े अच्छे हैं और समाज, गरीब-गुरबों की सोचते हैं.’’ हालांकि चुनावी आंकड़े कभी इस नरेगा श्रमिक के पक्ष में नहीं रहे और हर बार उनकी जमानत जब्त हो जाती है.

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बता दें कि राजस्थान में इस तरह जिद से चुनाव लड़ने वाला कोई और उदाहरण सामने नहीं आया है. हालांकि अन्य राज्यों में बार बार चुनाव लड़ने के दावे करने वाले जरूर सामने आते हैं. इस तरह की जिद का बड़ा उदाहरण धरतीपकड़ उर्फ काका जोगिंदर सिंह रहे जिन्होंने विधायक से लेकर राष्ट्रपति तक 350 से ज्यादा चुनाव लड़े थे. निर्वाचन विभाग के अनुसार, तीतर सिंह को 2008 के विधानसभा चुनाव में 938 वोट, 2013 के विधानसभा चुनाव में 427 वोट और 2014 के लोकसभा चुनाव में 3924 वोट मिले. इस बार वह करणपुर विधानसभा से चुनाव लड़ रहे हैं जहां 16 प्रत्याशी मैदान में हैं और उनको चुनाव चिन्ह मिला है एसी. अब ये ‘एसी’ उनकी उम्मीदों को कितना सुकून पहुंचाएगा ये तो चुनाव के परिणाम ही बताएंगे फिलहाल तो गुलाबी ठण्ड वाले मौसम में चुनावी सरगर्मियों ने राज्य का पारा बढ़ा रखा है. (इनपुट एजेंसी)