देश की आजादी के बाद ढेर सारे राजे-रजवाड़ों को जोड़कर बने राजस्थान में बड़े या कद्दावर नेताओं की फेहरिस्त निकाली जाए, तो सबसे पहला नाम संभवतः पूर्व उपराष्ट्रपति और प्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री भैरों सिंह शेखावत (Bhairon Singh Shekhawat) का ही आएगा. 50 साल से ज्यादा के राजनीतिक करियर में ज्यादातर समय विधानसभा, एक बार राज्यसभा और फिर उपराष्ट्रपति के पद तक पहुंचने वाले इस नेता ने जमीन से उठकर सियासत करना सीखा था. राजनीति की दुनिया में कदम रखने से पहले भैरों सिंह पुलिस की नौकरी करते थे. जिस तरह राजनीति में उनका करियर बेदाग और शानदार रहा है, ठीक उसी तरह पुलिस सेवा में भी बहुत कम दिन रहने के बावजूद उन्होंने अपनी कार्यशैली से वरिष्ठ अधिकारियों का ध्यान आकर्षित किया था. यह जानना रोचक होगा कि देश में हुए पहले चुनाव से सियासत में कदम रखने वाले भैरों सिंह के इस क्षेत्र में मुकाम हासिल करने की बुनियाद उनकी पत्नी ने रखी थी. जी हां, अगर उनकी पत्नी ने भैरों सिंह को उनके पहले चुनाव में नामांकन पर्चा भरने जाने के लिए 10 रुपए नहीं दिए होते, तो आज राजस्थान की राजनीति के इस सूरमा की हम कहानी नहीं पढ़ रहे होते. आगामी कुछ दिनों में जब राजस्थान की जनता विधानसभा चुनाव के लिए मतदान करेगी, उससे पहले भैरों सिंह शेखावत जैसे नेता की सियासी जिंदगी की कहानी जानना जरूरी है.

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सिर्फ 38 रुपए में लड़ा था पहला चुनाव
भैरों सिंह शेखावत का जन्म राजस्थान की राजधानी जयपुर से सटे सीकर जिले के खाचरियावास में हुआ था. पिता स्कूल में अध्यापक थे, इसलिए घर का रहन-सहन और भैरों सिंह का लालन-पालन सामान्य परिवारों की तरह ही हुआ था. जाहिर है उनकी बुनियाद जमीन से जुड़ी हुई थी, जो बाद के जीवन में भी हमें दिखती है. भैरों सिंह शेखावत के जीवन पर ‘माटी बन गई चंदन’ किताब लिखने वाले मिलाप चंद डांडिया लिखते हैं- शुरुआती पढ़ाई-लिखाई के बाद भैरों सिंह ने घर की आर्थिक स्थिति को देखते हुए किसानी शुरू कर दी थी. लेकिन पिता की असामयिक मौत के बाद शेखावत को नौकरी करनी पड़ी. और यह नौकरी दिलवाई तत्कालीन जयपुर रियासत के पुलिस सुपरिंटेंडेंट ठाकुर जयसिंह ने. ठाकुर जयसिंह की सिफारिश पर भैरों सिंह शेखावत पुलिस में थानेदार बन गए. महज 5 से 6 साल तक पुलिस की नौकरी करने के दौरान ही शेखावत ने अपनी कार्यशैली से पुलिस विभाग के अधिकारियों को हैरान कर दिया था. लेकिन सबसे बड़ी हैरानी तब हुई, जब उन्होंने यह नौकरी छोड़ दी और फिर से खेती-किसानी में जुट गए.

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Shekhawat

नौकरी छोड़ने के कुछ ही दिन बीते थे कि वर्ष 1952 आ गया और देश में पहली बार चुनाव हुए. इस चुनाव में भाग लेने के लिए लोगों के कहने पर भैरों सिंह ने मन तो बना लिया, लेकिन पास में पैसे नहीं थे. ऐसे में मुसीबत यह आई कि जिला मुख्यालय सीकर तक पहुंचे कैसे? इस आड़े वक्त में पत्नी ने 10 रुपए उधार दिए जिसको लेकर शेखावत सीकर पहुंचे. एक बात तो तय थी कि चुनाव जनसंघ के टिकट पर ही लड़ना है, लेकिन बीच में स्थितियां कुछ ऐसी बनी कि स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में भी नामांकन दाखिल करना पड़ा. अब दो-दो पार्टियों से चुनाव लड़ने के लिए जमानत के पैसे भी चाहिए थे, इसमें एक परिचित दुकानदार ने मदद की. तब जाकर पर्चा दाखिल हो पाया. बहरहाल चुनाव लड़ा और जीत भी गए, लेकिन सबसे रोचक बात यह कि पूरे चुनाव कार्यक्रम के दौरान सिर्फ 38 रुपए खर्च हुए थे. इतने कम पैसे में चुनाव लड़कर जीत जाना छोटी बात नहीं थी.

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अखबार दिखाकर चुनाव प्रचार
पहले चुनाव के दौरान भैरों सिंह शेखावत के बारे में जयपुर से छपने वाले एक छोटे अखबार ‘जयभूमि’ ने खबर प्रकाशित की थी. मिलाप चंद डांडिया अपनी किताब में लिखते हैं- चुनाव प्रचार के दौरान भैरों सिंह शेखावत इस अखबार की प्रतियां लेकर घूमते थे. रैलियों, सभाओं और जनसंपर्क के दौरान वह अखबार और उसमें छपी अपनी तस्वीर-खबर लोगों को दिखाते थे. इसका बड़ा व्यापक असर हुआ और लोगों ने यह मानना शुरू कर दिया कि भैरों सिंह शेखावत बड़ी शख्सियत है. बाद के दिनों में जब शेखावत राजस्थान के सीएम बन गए, तब भी वे इस अखबार की भूमिका के बारे में अक्सर जिक्र किया करते थे. चुनाव से जुड़ा एक और रोचक किस्सा है. डांडिया लिखते हैं- शुरुआती दिनों में भैरों सिंह शेखावत को भाषण देना नहीं आता था. ऐसे में सभाओं और रैलियों में जाना खतरे से खाली नहीं था. मगर धुन के धनी शेखावत ने इसके लिए एक तरकीब ढूंढ निकाली. वे चुनावी सभाओं में पार्टी का घोषणा-पत्र पढ़ते और वीर रस की कविताएं सुनाकर लोगों की तालियां बटोरते. इसके साथ-साथ ‘जयभूमि’ में छपी अपनी खबर और तस्वीर तो थी ही. इन सबकी बदौलत भैरों सिंह शेखावत ने अपना पहला चुनाव जीता था.

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जागीरदारी कानून का विरोध और अंत्योदय के जनक
किसी राज्य के मुखिया के तौर पर जन कल्याणकारी नीतियों को लागू करने में भैरों सिंह शेखावत का नाम आज भी देश में सबसे पहले लिया जाता है. खासकर उनके मुख्यमंत्रित्व काल में राजस्थान में लागू की गई अंत्योदय योजना को तो बाद में चलकर केंद्र सरकार ने भी अपनाया. कई अन्य राज्यों में भी इस योजना को हूबहू उसी शक्ल में दूसरे मुख्यमंत्रियों ने लागू किया. लेकिन मुख्यमंत्री बनने से पहले भी जनता, खासकर गरीब किसानों के लिए शेखावत निरंतर काम करते रहे थे. मिलाप चंद डांडिया अपनी किताब में लिखते हैं- इसी सिलसिले में आजादी के कुछ वर्षों बाद जब देश में जागीरदारी प्रथा का अंत करने वाले कानून को लागू करने का समय आया था, तो उस समय शेखावत ने अपनी पार्टी के विधायकों के उलट, सत्तारूढ़ सरकार का साथ दिया था. दरअसल, शेखावत जनसंघ पार्टी के विधायक थे, जिसके कई विधायक राजस्थान के पुराने जागीरदार रहे थे. इसलिए वे विधायक कांग्रेस द्वारा लाए जा रहे जागीरदारी विरोधी कानून के खिलाफ विधानसभा में मतदान करने का माहौल बना रहे थे. शेखावत ने इसका विरोध किया और सरकार के पक्ष में मतदान किया. पार्टी विरोधी इस कृत्य पर उन्हें जनसंघ से निकाल दिया गया. मगर बाद में जब जनसंघ के तत्कालीन अध्यक्ष श्यामा प्रसाद मुखर्जी को अपने इस नौजवान विधायक के जन कल्याणकारी विचारधारा का पता चला तो उन्हें वापस जनसंघ में ले लिया गया.

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