नई दिल्ली. राजे-रजवाड़ों वाले राजस्थान में विधानसभा चुनाव की सरगर्मियों के बीच आज चर्चा बीकानेर की. दुनिया को नमकीन, खासकर मोठ की दाल वाली भुजिया का स्वाद चखाने वाले इस शहर का इतिहास, यहां बनने वाली मशहूर नमकीन से सैकड़ों साल पुराना है. चाहे हल्दीराम हो या बिकाजी, बीकानेरी नमकीन का नाम लेते ही आपके मुंह में अगर पानी आ जाता है, तो यह इस शहर की भुजिया का ही कमाल है. जनश्रुतियों की मानें तो बीकानेर की रेतीली मिट्टी की खासियत, यहां बनने वाली नमकीन को देश के किसी और इलाके की नमकीन से अलग करती है. कहते हैं- बीकानेर में कई ऐसी बावड़ी है जिसका पानी यहां बनने वाली नमकीन को खास बना देता है. लेकिन जनश्रुतियों से इतर तथ्य यह बताते हैं कि यहां के नमकीन व्यापारियों की अपने ग्राहकों को कुछ अच्छा खिलाने की ख्वाहिश ने बीकानेरी भुजिया को जन्म दिया और कालांतर में यह स्वाद देश-विदेश के सिर चढ़कर बोलने लगा. Also Read - यूपी के मंत्री ने कहा- कांग्रेस ने भ्रम फैलाकर पाया वोट, पछता रहे हैं मध्यप्रदेश के लोग

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राजा के नाम पर भुजिया बेचने से शुरू हुआ कारोबार

बीकानेर शहर में चाहरदिवारियों से घिरे बाजार के बीचों-बीच पहुंचने के बाद आपको चारों तरफ भुजिया तलते कड़ाह दिखेंगे. ढेर सारी दुकानें दिखेंगी. इन्हीं में से एक दुकान हल्दीराम भुजियावाले की भी हुआ करती थी, जो आज शहर के बाहरी इलाके में स्थित है. बीकानेर की स्थापना यूं तो राजा बिका के नाम पर हुई है, लेकिन इस शहर के निर्माण में सबसे बड़ा योगदान जिस राजा का माना जाता है, वह थे राजा डुंगर सिंह. हल्दीराम ने शुरुआती दिनों में जब अपनी पुश्तैनी दुकान में भुजिया बेचने की शुरुआत की, तो इसका नाम ‘डुंगर सेव’ रखा. यह नाम इसलिए ताकि लोगों को राजा के नाम से भुजिया के नाम की याद रहे. अपने प्रोडक्ट की ब्रांडिंग का यह फंडा, आज हल्दीराम के ब्रांड के बारे में जानते हुए आप समझ सकते हैं. उस समय भी हल्दीराम ने ‘डुंगर सेव’ के रूप में अपने उत्पाद को लोकप्रिय बनाया और यही आधार बना जब वह अपने नाम से खुद का उत्पाद लेकर बाजार में आए. सिर्फ बेसन से बनने वाली भुजिया के मुकाबले मोठ की दाल मिलाकर भुजिया बनाने का यह अंदाज पिछले करीब 6-7 दशकों से लोगों की जुबान पर चढ़ा हुआ है. यह हल्दीराम की मेहनत ही थी कि आज इस नाम के उत्पाद आंख मूंदकर खरीद लिए जाते हैं.

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महाराजा का नाम होगा, हल्दीराम को दुनिया जानेगी

देश-दुनिया के पर्यटकों के लिए राजस्थान न सिर्फ घूमने की जगह है, बल्कि छुट्टियां बिताने के लिए यहां इतने स्पॉट हैं कि आपके दिन कम पड़ जाएंगे. प्रदेश के हर इलाके में फैली रियासतों के किस्से, महल, शहर और गलियां देखते-देखते पर्यटक थकते नहीं हैं. लेकिन बीकानेर, राजस्थान की इस परिभाषा से जुदा है. यहां राजा-महाराजाओं के किस्से से ज्यादा नमकीन के किस्से सुने जाते हैं. हल्दीराम भुजिया की कहानी लिखने वाले पवित्र कुमार अपनी किताब ‘भुजिया के बादशाह’ में इससे जुड़ा एक रोचक किस्सा सुनाते हैं. दरअसल, बीकानेर के आखिरी महाराज साधु सिंह और हल्दीराम का जन्म लगभग एक ही समय में हुआ था. ऐसा कहा जाता है कि उस समय के एक भविष्यवक्ता ने कहा था- यह बालक (महाराजा) बीकानेर में लोकप्रिय होगा और प्रजा इससे प्यार करेगी. लेकिन हल्दीराम के बारे में उस भविष्यवक्ता ने दावा किया था कि यह बालक एक दिन विश्व में विख्यात होगा और हर कोई इसका नाम जानेगा. आज हल्दीराम की दुनियाभर में फैली शाखाओं को देखते हुए उस भविष्यवेत्ता के दावों को आप झुठला नहीं सकेंगे.

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अब चर्चा अभी हो रहे विधानसभा चुनाव की

राजस्थान में हो रहे विधानसभा के चुनाव में सतही तौर पर देखें तो पिछले चुनावों जैसी बानगी ही दिखती है. जैसा कि इस राज्य का ट्रेंड है, हर पांच साल पर एक पार्टी की सरकार का बदल जाना. इस बार के चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों के आधार पर कुछ ऐसी ही तस्वीर बनने की बात की जा रही है. हालांकि 7 दिसंबर को चुनाव और 11 दिसंबर को मतगणना होने के बाद ही इस पर कुछ सटीक बातें कही जा सकती हैं. लेकिन इस बार का चुनाव ज्यादा गहमा-गहमी वाला है, लिहाजा सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी जहां सत्ता में दोबारा लौटने के दावे कर रही है, वहीं प्रमुख विपक्षी कांग्रेस सत्ता-परिवर्तन के दावे कर रही है. प्रदेशभर में विरोध-प्रतिरोध का यह चुनावी खेल पूरे जोरों पर है. बीकानेर भी इससे अछूता नहीं है.

बीकानेर में विधानसभा की दो सीटें हैं- बीकानेर पूर्व और पश्चिम. बीकानेर पश्चिम से जहां वर्ष 2013 में भाजपा के गोपाल कृष्ण विजयी हुए थे, वहीं कांग्रेस के बुलाकी दास दूसरे नंबर पर रहे थे. इस बार कांग्रेस ने इस सीट से बीडी कल्ला चुनाव लड़ रहे हैं. वहीं उनके खिलाफ भाजपा के गोपाल जोशी मैदान में संघर्ष कर रहे हैं. बीकानेर पूर्व विधानसभा सीट से भी वर्ष 2013 में भाजपा की सिद्धी कुमारी विजयी रही थीं. उन्होंने कांग्रेस के गोपाल गहलोत को हराया था. इस बार भी भाजपा की ओर से सिद्धी कुमारी और कांग्रेस की ओर से कन्हैया लाल झांवर चुनाव लड़ रहे हैं.