Mahatma Gandhi 150th Birth Anniversary : दिन तय नहीं था, लेकिन ये निश्चित था कि जल्द ही भारत को अंग्रेज़ों से मुक्ति मिल जाएगी, लेकिन इस दिन को देखने से पहले भारत में जो हो रहा था उसकी खुद महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) या किसी और ने शायद ही कल्पना की थी. अंग्रेज़ों की ‘फूट डालो और राज करो’ की योजना अपनी चरम कामयाबी की ओर थे. मोहम्मद अली जिन्ना (Mohammad Ali Jinnah) की अलग देश की मांग ने देश के हिंदू और मुस्लिमों को एक दूसरे की जान का दुश्मन बना दिया था. और इसका सबसे पहला शिकार बना था पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) का नोआखली जिला.

अलग देश के लिए जिन्ना द्वारा सीधी कार्रवाई का फरमान जारी करने के बाद हालात बिगड़ गए. और सबसे पहले इसका नतीजा नोआखली (Noakhali) में देखने को मिला. महात्मा गांधी आज़ादी के बीच जिन रक्त स्नान जैसी आशंकाओं से घिरे थे, उसकी पहली तस्वीर इसी इलाके में सामने आई. आज़ादी से करीब साल भर पहले 1946 में नोआखली में हिंदू-मुस्लिम के बीच सबसे पहले भिड़ंत हुई. ऐसी भिड़ंत जिसने लाशें ही लाशें बिखेर कर रख दीं. हिंदू और मुस्लिम दोनों ही समुदाय की बड़े पैमाने पर जनहानि हुई. कई दिन तक मार काट मची रही. लोग एक दूसरे की जान के दुश्मन हो गए.

ऐसी विषम परिस्थितियों से अहिंसा को धर्म मानने वाले महात्मा गांधी बेहद दुखी थी और उन्होंने मुश्किल हालात के बीच ही नोआखाली जाने का फैसला कर लिया. उन्होंने गांव के लिए पैदल ही शांति यात्रा शुरू की. पैदल ही भ्रमण करना शुरू किया. इस यात्रा के दौरान उन्होंने चप्पल पहनना छोड़ दिया. महात्मा गांधी को लगता था कि नोआखाली एक श्मशान भूमि है, जहां सैकड़ों-हजारों लोगों की मजारें हैं. किसी मजार पर चप्पल पहनकर चलना मृत आत्माओं का अपमान होता है, इसलिए उन्होंने चप्पल पहनकर यात्रा नहीं की.

महात्मा गांधी के साथ पूरा काफिला था. इतिहासकारों के मुताबिक महात्मा गांधी की रणनीति अलग थी. वह मुस्लिमों के घर रुकते. दौरा करने जाते तो मुस्लिमों को साथ लेकर जाते. हिंदुओ के घर जाकर मुस्लिमों से उनकी मदद करने को कहते. किसी भी तरह की आशंका को व्यक्त करने पर हिंदू और मुस्लिम दोनों को ही महात्मा गांधी बेहद सहज और सरलता के साथ मानवता का हवाला देकर समझाते. उन्होंने इस इलाके के गांव-गांव में समितियां बनाईं. और समितियां भी ऐसी जिनके हिंदू प्रतिनिधि का चुनाव मुसलमान करते और मुस्लिम प्रतिनिधि को हिंदू चुनते थे.

महात्मा गांधी ने इन समितियों को ही अमन की जिम्मेदारी सौंपी. महात्मा गांधी के इस कदम का मुस्लिम समुदाय पर गहरा प्रभाव पड़ा. ऐसा प्रभाव कि उस इलाके के एक गांव में तोड़े गए मंदिर को मुस्लिमों ने ही फिर से बनाना शुरू कर दिया था. प्रशासन के अधिकारी तक कहने लगे थे कि आपके यहां रहते कभी भी दंगे नहीं हो सकते. महात्मा गांधी यहां नोआखाली में पांच महीने रहे. और इतने समय में नोआखाली के हालात को उन्होंने पूरी तरह से बदल कर रख दिए थे. महात्मा गांधी की किसी भी तरह की हिंसा से निपटने की ऐसी ही रणनीतियों ने उन्हें न सिर्फ देश का राष्ट्रपिता, बल्कि पूरे विश्व में अहिंसा के पुजारी और अद्वितीय महात्मा के रूप के स्थापित कर दिया था.

ये दुर्लभ वीडियो पत्र सूचना कार्यालय, भारत सरकार से साभार है.