नई दिल्ली. राजनीति के विशेषज्ञ कहते हैं कि नेता का ‘Auro’ ही उसे दूसरों से अलग करता है. पेशे से आयुर्वेद डॉक्टर इस शख्स ने सभी गढ़ी हुई वर्जनाओं को तोड़ते हुए बिल्कुल सौम्य और शांत व्यक्तित्व से एक पार्षद से प्रदेश के मुखिया तक का सफर तय करता है. ‘राजनीति में कुछ भी टिकाऊ नहीं होता’ या ‘सत्ता किसी के पास लंबे समय तक नहीं होती’ जैसे मिथकों को तोड़ते हुए बीजेपी की तरफ से सबसे ज्यादा समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड बनाता है. वह एक अंधे ‘गुडनाइट’ को अपना हीरो मानता है और लोग उसे ‘चाउर वाले बाबा’ कहते हैं. हम बात कर रहे हैं छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह की.

रमन सिंह पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के वह साथी हैं, जिसके सहारे उन्होंने कांग्रेस के दिग्गज नेता मोतीलाल वोरा को लोकसभा चुनाव में हराने में सफलता पाई. जिसके चेहरे और कार्यप्रणाली के बल पर अजीत जोगी जैसे दिग्गज कांग्रेसी नेता को बुरी तरह हराकर बीजेपी छत्तीसगढ़ में सरकार बनाने में सफल रही. नक्सली हमले और ऑपरेशन ग्रीन हंट से लहूलुहान प्रदेश में लगातार तीन बार बीजेपी की सरकार बनती है और लोग उन्हें एक ‘साइलेंट परफॉर्मर’ कहने लग जाते हैं. 5000 से ज्यादा दिनों तक मुख्यमंत्री रहने वाले रमन सिंह की तुलना गाहे-बगाहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक से होने लगती है.

कौन है गुडनाइट, जो उनकी लाइफ का हीरो है
अपने कई इंटरव्यू में रमन सिंह बताते हैं कि वह पहली बार स्कूल एक अंधे शख्स के कंधे पर बैठकर पहुंचे थे. अंधा होने के बावजूद वह आसपास की चीजों को समझता-महसूस करता था. ऐसे में लोग उसे गुडनाइट कहते थे. बचपन में रमन सिंह गुडनाइट पर इसलिए गुस्सा होते थे कि वह उन्हें हर दिन स्कूल पहुंचा देता था. लेकिन आज वह गुडनाइट को अपनी जिंदगी का हीरो मानते हैं.

नरेंद्र मोदी का तोड़ा रिकॉर्ड
साल 2003 में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री बने रमन सिंह अभी तक मुख्यमंत्री बने हुए हैं. जुलाई, 2016 में बीजेपी की तरफ से सबसे ज्यादा दिनों तक मुख्यमंत्री बने रहने का रिकॉर्ड उनके नाम ही है. उनसे पहले यह रिकॉर्ड वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का था, जब वह गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे.

गरीबों का डॉक्टर
सामान्य किसान परिवार में जन्मे रमन सिंह ने आयुर्वेदिक मेडिसिन की पढ़ाई सरकारी आयुर्वेदिक कॉलेज रायपुर से पूरी की. इसके बाद उनके पास शहर में ही प्रैक्टिस करने का अवसर था. लेकिन वह अपने गांव लौट आए और एक छोटे से क्लिनिक में प्रैक्टिस करने लगे. कहा जाता है कि वह गांव के लोगों से कम फीस लेते थे, जिसकी वजह से वह गरीबों के डॉक्टर के रूप में फेमस हुए.

चाउर वाले बाबा
रमन सिंह ने एक रुपये किलो चावल की योजना चलाई, जिसकी चर्चा पूरे देश में शुरू हुई. इसमें गरीबों को 1 रुपये में चावल मिलता था. ऐसे में छत्तीसगढ़ में लोग उन्हें चाउर वाले बाबा कहने लगे. रमन सिंह ने अपने तीन बार के शासनकाल में राज्य की मूलभूत जरूरतों- सड़क, बिजली और पानी पर खूब काम किया. सरगुजा और बस्तर में दूषित पानी से होने वाली बीमारियों पर उन्होंने काम किया.

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छत्तीसगढ़ में साइलेंटली बढ़ाई अपनी ग्राफ
जिस समय छत्तीसगढ़ अलग राज्य बना उस समय में वहां बीजेपी के पास दिलीप सिंह जूदेव, करुणा शुक्ला और रमेश बैस जैसे दिग्गज नेता हुआ करते थे. रमन सिंह प्रदेश अध्यक्ष तो बन गए, लेकिन फिर भी उनका राष्ट्रीय राजनीति में कद काफी छोटा था. इतना ही नहीं पहली बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर पहुंचने के बाद भी रमन सिंह जूदेव और बैस की राजनीति के आगे ‘जूनियर’ जैसे ही दिखते थे. लेकिन साइंलेट परफॉर्मर रमन सिंह धीरे-धीरे इस तरह अपने ग्राफ को बढ़ाते गए कि आज छत्तीसगढ़ में बीजेपी का चेहरा सिर्फ और सिर्फ वह ही हैं.

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राजनैतिक सफर
जनसंघ के दिनों से उससे जुड़ने वाले रमन सिंह साल 1976-77 में कवर्धा युवा मोर्चा के अध्यक्ष बने थे. इसी बीच उन्होंने संगठन की राजनीति के साथ जनता की राजनीति भी करने के उद्देश्य से साल 1984 में कवर्धा नगर पालिका से पार्षदी का चुनाव लड़ा और उन्हें सफलता भी मिली. साल 1990 में बीजेपी ने उनपर विश्वास जताते हुए कांग्रेस के जगदीश चंद्रवंशी के खिलाफ कवर्धा विधानसभा का टिकट दे दिया. यहां भी रमन सिंह को सफलता मिल गई. साल 1993 में भी वह जीते, लेकिन 1998 में हार गए. इस बीच अटल बिहारी वाजपेयी की नजर उनपर पड़ी और उन्हें राजनांदगांव से मोतीलाल वोरा के खिलाफ लोकसभा चुनाव में उतार दिया. इस मौके को भुनाते हुए रमन सिंह ने जीत दर्ज की और फिर केंद्र की अटल सरकार में वाणिज्य-उद्योग राज्य मंत्री बने. साल 2002 में वह छत्तीसगढ़़ के बीजेपी अध्यक्ष बने. साल 2003 में वह राज्य के सीएम बने.

विवाद
पुष्प स्टील का विवाद रमन सिंह की सरकार में काफी चर्चित रहा था. इसके बाद बाल्को को जमीन आवंटन का मुद्दा भी राज्य में काफी चर्चा में रहा. इससे सरकारी खजाने पर असर पड़ने का भी आरोप लगा. फिर एक खदान को बीजेपी के राष्ट्रीय नेता के करीबी देने का आरोप लगा. हाल में उनके बेटे का नाम पनामा पेपर्स में कथित तौर पर आने का विवाद भी काफी चर्चा में रहा है.