नई दिल्ली: इंडियन आर्मी को अपनी 22 हजार गायों को बेचने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है. इन गायों की देखभाल के लिए आर्मी को हर साल 300 करोड़ रुपए खर्च करने पड़ते हैं. पिछले साल जुलाई में मिलिट्री ऑफ डिफेंस (एमओडी) ने देशभर में फैले इंडियन आर्मी के 39 मिलिट्री फार्म को बंद करने का आदेश दिया था. मिलिट्री फार्म की शुरुआत 1889 में ब्रिटिश सरकार की ओर से किया गया था. दैनिक ट्रिब्यून की खबर के मुताबिक ये फार्म 20 हजार एकड़ में फैले हुए हैं लेकिन अब इन जमीनों का इस्तेमाल आने वाले कई प्रोजेक्ट के लिए होना है जिसमें ग्राउंड बेस्ड मिसाइल स्टोरेज, एविएशन और जवानों के लिए घर शामिल है. एक साल पहले ही इन गायों को बेचने का आदेश जारी किया गया था, लेकिन किसी ने इनकी निलामी में रुचि नहीं दिखाई. इसके बाद एक लाख कीमत की इन गायों को 1000 में बेचने का फैसला किया गया.

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मिलिटरी फार्म के मवेशियों को टोकन अमाउंट के एवज में केंद्र और राज्य सरकार के विभागों या डेयरी को-ऑपरेटिव के पास भेजने का आदेश जून के आखिर में दिया था. इसमें ट्रांसपॉर्टेशन का खर्च का वहन वह संस्था करेगी, जिसके पास मवेशी जाएंगे. इस फैसले के साथ ही 39 मिलिटरी फार्मों को बंद करने का रास्ता भी साफ हो गया है, जो करीब एक साल से इस वजह से अटका हुआ था. रक्षा मंत्रालय के एक पैनल ने पूरे देश में मिलिटरी फार्म को बंद करने की सिफारिश की थी, जिन्हें 1889 में बनाया गया था.

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आर्मी के पास 25 हजार गायें थीं. इनमें से 2700 को बेचा जा चुका है. 22 हजार गायें बची हुई थीं. इनमे से 11 हजार गायों को बेचने के लिए आवेदन मिल चुके हैं. फार्मों को बंद करने का ऑर्डर पिछले साल अगस्त में ही दे दिया गया था और इसके लिए तीन महीने की समयसीमा तय की गई थी. हालांकि, कई कोशिशों के बावजूद लिविंग असेट्स की वजह इन्हें बंद नहीं किया जा सका था. इसमें मिलिटरी फार्म में ज्यादा दूध देने वाली गायें सबसे बड़ी समस्या थीं.

इन गायों को डच-होलेस्टियन और शुद्ध साहीवाल की क्रॉस ब्रीडिंग के जरिए डिवेलप किया गया था, जो देश की औसत दूध देने वाली गायों की तुलना में दोगुना दूध देती हैं. इन फार्मों को बंद करने का अंतिम फैसला 2013 में आर्मी कमांडर्स के साथ मीटिंग के बाद लिया गया था. आर्मी के ये फार्म अंबाला, जालंधर,पठानकोट, जम्मू, श्रीनगर, कारगिल, इधमपुर, कोलकाता, आगरा, लखनऊ और अन्य जगहों पर फैले हुए हैं.