गुजरात विधानसभा चुनाव से ही कांग्रेस में एक नए ”चाणक्य” पर चर्चा शुरू हुई, जो राजस्थान चुनाव में भी बदस्तूर जारी है. एक तरफ वह पार्टी का राष्ट्रीय संगठन महासचिव है तो दूसरी तरफ राजस्थान का पूर्व सीएम. एक तरफ उसे राजस्थान की पूरी 200 सीटों पर नजर बनाए रखते हुए प्रत्याशियों की जीत सुनिश्चित करना है तो दूसरी तरफ उसे अपनी खुद की सरदारपुर सीटे से एक बार फिर जीत का परचम लहराना है. एक तरफ चर्चा है कि वह सीएम बनेंगे या नहीं तो दूसरी तरफ इसकी बात हो रही है कि जिस शख्स ने उन्हें छात्रसंघ का चुनाव हराया था, क्या वह इस बार भी गहलोत के लिए चुनौती बनकर उभरेगा?

अशोक गहलोत की छवि एक जमीनी नेता से सीएम बनने की है. वह कांग्रेस के छात्र संगठन NSUI से छात्र संघ का चुनाव साल 1968-69 में लड़े थे. लेकिन उन्हें ABVP के शंभु सिंह खेतासर ने मात दे दी थी. 60 के दशक के बाद साल 2013 में एक बार फिर खेतासर गहलोत के लिए चुनौती बनकर उभरे और उनके खिलाफ मैदान में उतरे. लेकिन, उन्हें हार का सामना करना पड़ा. लेकिन साल 2018 में वही खेतासर इस बार उन्हें कड़ी चुनौती देते दिख रहे हैं.

कौन हैं राजेंद्र सोलंकी
गहलोत राजस्थान एक ब्रांड हैं और कांग्रेस उनके चेहरे को पूरे राज्य में भुनाना चाहती है. ऐसे में गहलोत लगातार पूरे राज्य का दौरा कर रहे हैं. 200 सीटों की रणनीति बनाने में गहलोत अपनी सीट पर प्रचार नहीं कर पा रहे हैं और इसके लिए उन्होंने उसी छात्र संघ के जमाने के अपने विश्वस्त राजेंद्र सोलंकी को जिम्मेदारी दी है हो पिछले 50 साल से उनके प्रचार का जिम्मा संभाल रहे हैं. बता दें कि जब गहलोत छात्र संघ का चुनाव लड़ रहे थे तब भी सोलंकी उनके प्रचार में उनके साथ खड़े थे.

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सोलंकी इस तरह कर रहे हैं प्रचार
सोलंकी विधानसभा में मौजूद एक-एक घर जा रहे हैं और पिछले 5 साल की बीजेपी की नाकामियों को गिना रहे हैं. उनका कहना है कि इस बार का वोट बीजेपी की सरकार के अन्याय के खिलाफ डाला जाए. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, वह क्षेत्र में कह रहे हैं, ‘अशोक गहलोत साहब यहां नहीं हैं. लेकिन आप सोलंकी जी को उनके प्रतिनिधि के तौर पर देखिए और कांग्रेस को वोट करिए.’ सोलंकी जोधपुर डेवलपमेंट अथॉरिटी के चेयरमैन रह चुके हैं. वह कहते हैं कि जब गहलोत पहली बार यूनिवर्सिटी का इलेक्शन लड़ रहे थे, वह तब से उनका प्रचार कर रहे हैं. वह कहते हैं कि गहलोत ने डोर-टू-डोर कैंपने के अलावा सैनिकपुरी, रूपनगर और विध्य नगर में पब्लिक मिटिंग भी की है.

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खेतासर ने किया दावा
दूसरी तरफ खेतासर का कहना है कि उन्होंने यूनिवर्सिटी इलेक्शन में गहलोत को चुनाव हराया है. साल 2013 में वह बाहरी थे, इस वजह से जनता ने उनका साथ नहीं दिया. उनका कहना है कि इस बार वह इलाके को समझ गए हैं. उन्होंने अपनी जीत का दावा किया. खेतासर राजपूत जाति से आते हैं और जोधपुर के ओसियन के रहने वाले हैं.

क्या कहते हैं लोग
खेतासर का आरोप है कि गहलोत हमेशा बाहर रहते हैं. उनके नेतृत्व की पिछली सरकारों ने बहुत कम विकास का काम किया है. हालांकि, क्षेत्र के लोगों ने इस दावे को इनकार करते हुए कहा कि वह कभी-कभी दुकान पर आते हैं. वह आसानी से उपबल्ध रहते हैं और जमीन से जुड़े नेता हैं.

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