नई दिल्ली: पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे अब  करीब-करीब स्पष्ट हो चुके हैं. राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भाजपा हार चुकी है जबकि मध्यप्रदेश में कांटे की लड़ाई में कांग्रेस बढ़त की हालत में है. मिजोरम और तेलंगाना में भाजपा के लिए पहले भी उम्मीदें काफी कम थीं और नतीजे इसी अनुरूप हैं. भाजपा का गढ़ माने जाने वाले इन हिंदीभाषी राज्यों में सत्ता से बाहर होना पार्टी के लिए किसी झटके से कम नहीं है. इन नतीजों को अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों और मोदी सरकार के भविष्य से जोड़कर देखा जा रहा है. यह सही है कि अरसे बाद मिली चुनावी सफलता से कांग्रेस को मजबूती मिली है, लेकिन इसे जल्दबाजी में मोदी सरकार के रिपोर्ट कार्ड के रूप में देखना राजनीतिक भूल हो सकती है.

  • क्या यह मोदी सरकार की हार है- नहीं. ये चुनाव राज्यों की विधानसभा के लिए थे. नेतृत्व से लेकर मुद्दे भी स्थानीय थे. भाजपा और कांग्रेस के शीर्ष केंद्रीय नेताओं ने प्रचार जरूर किया, लेकिन चर्चा संबंधित राज्यों के मुद्दों की ही रही. इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि राजस्थान में जहां मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के खिलाफ असंतोष ज्यादा था, वहां भी वोटर पीएम नरेंद्र मोदी के खिलाफ नहीं थे. दूसरा मुद्दा यह है कि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा लगातार 15 साल से सत्ता में थी और मुख्यमंत्री का चेहरा भी नहीं बदला था. ऐसी हालत में भाजपा को एंटी इंकम्बेंसी से जूझना पड़ा जिसका मुख्य कारण इन राज्यों की सरकारें ही थीं.
  • 2019 के पहले क्या कांग्रेस के लिए टॉनिक है- हां. 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद एक अदद जीत के लिए तरस रही कांग्रेस के लिए नतीजे इससे अच्छे नहीं हो सकते थे. लोकसभा चुनाव अब केवल छह महीने दूर हैं, लेकिन भाजपा से मुकाबले के लिए राष्ट्रीय या प्रांतीय स्तर पर कांग्रेस पार्टी को अब तक कोई गठबंधन बनाने में कामयाबी नहीं मिली है. ये नतीजे इस लिहाज से कांग्रेस के लिए संजीवनी का काम कर सकते हैं. खास बात यह भी है कि कांग्रेस पार्टी को जीत उन्हीं राज्यों में मिली है जहां वह अकेले चुनावी मैदान में उतरी थी. तेलंगाना में प्रजाकुटमी बनाने का उसे कोई फायदा नहीं मिला. नतीजे आने के बाद ऐसी संभावना है कि विपक्षी दलों के बीच कांग्रेस के नेतृत्व को स्वीकार्यता मिलेगी, राहुल गांधी अपनी पार्टी में भी मजबूत होंगे और लोकसभा चुनावों के लिए अपनी तैयारियों को मनमुताबिक अमलीजामा पहना सकेंगे.
  • क्या इसके बाद विपक्षी पार्टियों की गोलबंदी तेज होगी- हां. इसमें कोई संदेह नहीं कि इन नतीजों के बाद भाजपा के खिलाफ विपक्षी पार्टियों की गोलबंदी तेज होगी. इसका उदाहरण मंगलवार सुबह ही देखने को मिल गया जब समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और बसपा नेताओं ने स्पष्ट कर दिया कि वे मध्य प्रदेश में भाजपा के साथ नहीं जाएंगे. अब ममता बनर्जी और के चंद्रशेखर राव जैसे राज्यों के क्षत्रपों को भी अपने रुख में बदलाव करना पड़ सकता है. ये पार्टियां अब तक भाजपा और कांग्रेस से अलग थर्ड फ्रंट के गठन की कोशिशों में लगे थे. लेकिन अब उन्हें यह सोचने के लिए मजबूर होना पड़ेगा कि भाजपा को चुनौती देने के लिए कांग्रेस को साथ लेना जरूरी है.
  • क्या यह कांग्रेस की जीत है- नहीं, यह राज्यों में भाजपा क्षत्रपों की हार है. मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा लगातार 15 वर्षों से सत्ता में थी. यदि कांग्रेस इस बार भी जीत की हालत में नहीं आती तो इन राज्यों में उसके अस्तित्व पर सवालिया निशान लग जाते.
  • चुनावी नतीजों के बाद भाजपा में अंदरूनी कलह बढ़ेगी- हो सकता है. नरेंद्र मोदी के भाजपा के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचने के बाद से पार्टी में उनके विरोधियों की बातों को अब तक कोई तवज्जो नहीं दी जाती थी. लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे नेताओं को भी हाशिये पर डाल दिया गया था. सरकार से लेकर पार्टी तक में केवल मोदी और अमित शाह की आवाज ही सुनी जाती थी. उनके नेतृत्व को चुनौती मिलने की संभावना नहीं दिखती, लेकिन पार्टी में हाशिये पर पड़े नेता अब अपनी आवाज बुलंद कर सकते हैं.
  • क्या समय पूर्व चुनाव की कोई संभावना है, जैसा वाजपेयी ने किया था- नहीं. इसके दो कारण हैं. अटलबिहारी वाजपेयी ने जब ऐसा किया था तब भाजपा को सत्ता से बाहर होना पड़ा था और दोबारा सत्ता में आने के लिए 10 साल का इंतजार करना पड़ा था. दूसरा यह कि इन राज्यों में भाजपा को जीत मिली होती तो पार्टी अपने प्रति गुड सेंटीमेंट का फायदा उठाने के लिए चुनाव पर विचार कर सकती थी, लेकिन अब उसे नए सिरे से तैयारी करनी होगी.