भारत के राजनीतिक इतिहास में अटल बिहार वाजपेयी को अजात शत्रु के रूप में देखा जाता था. उनका संपूर्ण व्यक्तिव एक शिखर पुरुष के रूप में दर्ज है. उनकी पहचान एक बेहतर व्यक्ति, संजीदा इंसान, पत्रकार, कवि, लेखक, भाषाविद के साथ-साथ एक कुशल राजनीतिज्ञ के तौर पर थी. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में रहते हुए भी उन्होंने विचारधार के खूटों से खुद को नहीं बांधा. लगभग 50 साल के राजनीतिक जीवन में जवाहर लाल नेहरू के बाद वह इकलौते शख्स थे जो तीन बार देश के प्रधानमंत्री बने. संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए हिंदी में भाषण देने वाले वह पहले भारतीय राजनीतिज्ञ थे. 16 अगस्त 2018 को उनका निधन हो गया. उनके निधन के बाद 25 दिसंबर को उनकी पहली जयंती मनाई जाएगी.

स्कूल के टीचर थे
25 दिसंबर 1924 को मध्यप्रदेश के ग्वालियर में जन्म अटल बिहारी वाजपेयी के पिता एक कवि और स्कूल में टीचर थे. ग्वालियर में ही सरस्वती शिशु मंदिर में उनकी पढ़ाई शुरू हुई. ग्वालियर विक्टोरिया कॉलेज (अब लक्ष्मी बाई कॉलेज) से हिंदी, अंग्रेजी और संस्कृत में ग्रेजुएशन किया. इसके बाद डीएवी कॉलेज कानपुर से उन्होंने राजनीतिक विज्ञान में पोस्ट ग्रेजुएट किया.

आरएसएस से जुड़ाव
साल 1944 में ग्वालियर में आर्य समाज की युवा इकाई आर्य कुमार सभा से उन्होंने सामाजिक जीवन शुरू किया. यहां वह महासचिव थे. हालांकि, इससे पहले 1939 में वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ चुके थे. बताया जाता है कि इनके जीवन में बाबासाहेब आप्टे का काफी प्रभाव रहा है. 1947 में वह संघ के पूर्णकालिक सदस्य (प्रचारक) बन गए.

भारतीय जनसंघ की आधारशीला रखी
साल 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद आरएसएस पर बैन लगा दिया. साल 1951 में दीन दयाल उपाध्याय के साथ मिलकर अटल ने एक राजनितिक पार्टी ‘भारतीय जनसंघ’ की आधारशीला सखी. इन्हें पार्टी का राष्ट्रीय सचिव बनाया. साल 1955 में उन्होंने पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा. साल 1957 में उन्हें यूपी के गोंडा की बलरामपुर सीट से जीत मिली और वह लोकसभा पहुंचे. इस दौरान उन्हें मथुरा और लखनऊ से भी लड़ाया गया था, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा था. इस साल देश की संसद में जनसंघ के सिर्फ चार सदस्य थे, जिसमें अटल भी एक थे. अटल जब लोकसभा में पहुंचे तो उनकी भाषण शैली से प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू काफी प्रभावित हुए थे.

जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष
दीन दयाल उपाध्याय की मृत्यु के बाद जनसंघ की जिम्मेदारी अटल बिहारी वाजपेयी के कंधे पर आ गई. अटल ने अपनी भाषण शैली और सांगठिक छमता से पार्टी का लगातार विस्तार किया. 1968 में वह जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने. साल 1975 में लगे इमरजेंसी में अटल जेल गए.

विदेश मंत्री बने
साल 1977 में जब जयप्रकाश नारायण ने सभी विपक्षी पार्टियों को कांग्रेस के खिलाफ एकजुट होने को कहा तो वाजपेयी ने जनसंघ का जनता पार्टी में विलय कर दिया. इस साल हुए चुनाव में जनता पार्टी की सरकार बनी. मोरारजी देसाई देश के प्रधानमंत्री बने और अटल उनकी कैबिनेट में विदेश मंत्री बने. 1979 में जनता पार्टी के टूटने तक वाजपेयी खुद को स्थापित कर चुके थे.

बीजेपी की स्थापना
जनता पार्टी के टूटने के बाद वाजपेयी ने 1980 में लाल कृष्ण आडवाणी, भैरो सिंह सेखावत और दूसरे नेताओं के साथ मिलकर भारतीय जनता पार्टी की स्थापना की. वह बीजेपी के पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष बने. 1984 के चुनाव में बीजेपी को सिर्फ 2 सीटें मिली.

पहली बार प्रधानमंत्री
राम मंदिर आंदोलन के बाद गुजरात और महाराष्ट्र में हुए चुनाव में बीजेपी को सफलता मिली और कर्नाटक में भी उसने बेहत प्रदर्शन किया. 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी पहली बार देश के प्रधानमंत्री बने. हालांकि, उनका कार्यकाल सिर्फ 13 दिन का था.

दूसरी बार प्रधानमंत्री
साल 1998 के चुनाव में बीजेपी को फिर से सफलता मिली और वह सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी. ऐसे में दूसरे दलों के साथ मिलकर नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस बना और अटल एक बार फिर देश के प्रधानमंत्री बने.

पहली बार गैरकांग्रेसी प्रधानमंत्री
साल 1999 के चुनाव में एक बार फिर बीजेपी को बड़ी सफलता मिली और अटल एक बार फिर देश के प्रधानमंत्री. इस दौरान एनडीए को 303 सीटें मिली. अटल पहले गैरकांग्रेसी प्रधानमंत्री रहे जिन्होंने पांच साल का कार्यकाल पूरा किया. साल 2004 के चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा. इसके बाद धीरे-धीरे अटल की तबीयत बिगड़ती गई और वह बेड पर चले गए.