नई दिल्ली. भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी पहले ऐसे गैर-कांग्रेसी नेता थे जो प्रधानमंत्री पद पर पहुंचे थे. देश के इस सर्वोच्च पद पर पहुंचने के लिए वाजपेयी को वर्षों तक संघर्ष करना पड़ा. राजनीति से ज्यादा अपने को साहित्य और पत्रकार के रूप में देखने की चाहत रखने वाले वाजपेयी ने अपनी किताब ‘बिंदु बिंदु विचार’ में सत्ता के लिए संघर्ष की बात स्वीकारी है. इसमें उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा है कि राजनीति में आना उनके लिए सबसे बड़ी भूल थी. उन्होंने राजनीति में आकर मन की शांति मर जाने और संतोष की समाप्ति को लेकर दुख प्रकट किया था. साथ ही यह भी कहा था कि सत्ता के लिए उन्हें ‘अपनों’ के साथ ही संघर्ष करना पड़ा. पूर्व प्रधानमंत्री के इस बयान को आप, वाजपेयी सरकार में पूर्व उप प्रधानमंत्री रहे भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी के साथ उनके संबंधों के आइने में देख सकते हैं. यह बयान भाजपा के एक अन्य नेता रहे गोविंदाचार्य के वाजपेयी को एनडीए सरकार का ‘मुखौटा’ कहे जाने के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण है. वाजपेयी सरकार के कार्यकाल में तत्कालीन उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी को मीडिया की खबरों में ‘लौह पुरुष’ की संज्ञा दी जाती थी, वहीं अटल बिहारी वाजपेयी को संघ परिवार से ‘सोची-समझी दूरी’ बनाए रखने वाला नेता और ‘विकास पुरुष’ कहा जाता था. Also Read - आने वाला कल न भुलाएं, आओ फिर से दीया जलाएं... PM मोदी की अपील में है अटल बिहारी वाजपेयी की इस कविता की झलक

Also Read - ममता ने पूर्व पीएम वाजपेयी को दी श्रद्धांजलि, कहा- हम उन्‍हें बहुत याद करते हैं

Also Read - 'मैं अखिल विश्व का गुरू महान', एक राजनेता जिसकी कविताएं बन गई जनमानस की आवाज, पढ़ें कुछ प्रमुख कृतियां 

राजनीति में आकर गांठ की पूंजी गंवा बैठा

अपने राजनीतिक जीवन की चर्चा करते हुए वाजपेयी ‘बिंदु बिंदु विचार’ में कहते हैं, ‘मैं स्वभाव से भुलक्कड़ हूं. पत्र का उत्तर न देना अथवा किसी को मिलने का समय देकर स्वयं घर से गायब हो जाना ऐसी भूले हैं, जिनकी भीड़ से स्मृति का भंडार भरा हुआ है. किंतु मेरी सबसे बड़ी भूल है राजनीति में आना. इच्छा थी कि कुछ पठन-पाठन करूंगा, अध्ययन और अध्यवसाय की पारिवारिक परंपरा को आगे बढ़ाऊंगा, अतीत से कुछ लूंगा और भविष्य को कुछ दे जाऊंगा. किंतु राजनीति की रपटीली राहों में कमाना तो दूर रहा, गांठ की पूंजी भी गंवा बैठा. मन की शांत मर गई. संतोष समाप्त हो गया. एक विचित्र सा खोखलापन जीवन में भर गया है. ममता और करुणा के मानवीय मूल्य मुंह चुराने लगे हैं. क्षणिक, स्थाई बनता जा रहा है और स्थायित्व को जड़ता मानकर चलने की प्रवृत्ति पनप रही है.’ राजनीतिक जीवन के संघर्ष के बारे में पूर्व प्रधानमंत्री ने अपनी अगली पंक्तियों में कहा है, ‘सत्ता का संघर्ष प्रतिपक्षियों से ही नहीं, स्वयं अपने ही दल वालों से हो रहा है. पद और प्रतिष्ठा को कायम रखने के लिए जोड़-तोड़, सांठ-गांठ और ठकुरसुहाती आवश्यक है. निर्भीकता और स्पष्टवादिता खतरे से खाली नहीं है. आत्मा को कुचलकर ही आगे बढ़ा जा सकता है.’

अटल बिहारी वाजपेयीः 'बाप जी' के साथ लॉ में लिया दाखिला, पिता-पुत्र को देखने आते थे लोग

अटल बिहारी वाजपेयीः 'बाप जी' के साथ लॉ में लिया दाखिला, पिता-पुत्र को देखने आते थे लोग

भाजपा के अंदर की स्थिति पर भी किया तंज

अटल बिहारी वाजपेयी के बारे में संसद के भीतर कई विपक्षी दलों के नेताओं ने कहा था, ‘गलत पार्टी में सही व्यक्ति’. इस तंज का वाजपेयी ने अपने अंदाज में कई बार जवाब भी दिया, लेकिन अपने जीवनकाल में ही वे भारतीय जनता पार्टी में संगठन स्तर पर आती ‘गिरावट’ पर चिंता जाहिर कर चुके थे. हालांकि अपने वक्तव्य में उन्होंने अन्य पार्टियों के मुकाबले भाजपा की तारीफ की है, लेकिन कमजोरियों की तरफ भी ध्यान दिलाया है. राजनीति में गंभीरता को हमेशा जरूरी मानने वाले वाजपेयी अपनी किताब ‘बिंदु बिंदु विचार’ में लिखते भी हैं, ‘इसमें संदेह नहीं कि जिस राजनीतिक दल से मैं संबद्ध हूं, वह अभी तक अनेक बुराइयों से अछूता है. किंतु उसमें भी ऐसे व्यक्तियों की संख्या बढ़ रही है, जो हल्की आलोचना में रस लेते हैं और प्रतिपक्षी की प्रमाणिकता पर खुले रूप में संदेह प्रकट करना अपना अधिकार मानते हैं.’ देश के नेताओं को वाजपेयी ने सही राजनीति की सीख देते हुए कहा था, ‘राजनीति की राहें रपटीली होती हैं. इन राहों पर चलते समय बहुत सोच-समझकर चलना पड़ता है. थोड़े से असंतुलन से गिरने की नौबत आ जाती है. इसलिए इन राहों पर बहुत अधिक संतुलन बनाए रखना होता है.’