Faiz Ahmad Faiz Birth Anniversary: भारतीय उपमहाद्वीप का एक ऐसा पंजाबी शायर जिसके कलाम में इंक़लाबी और रूमानी एहसास सांस लेते हैं. उर्दू अदब का वो शायर जिसने क्रांतिकारी रचनाओं को भी बड़े एहतराम और मोहब्बत से परोसा है. यूं तो दुनिया में ऐसे कई शायर हुए हैं जिन्होंने अपनी नज़्मों और ग़ज़लों को मआशरे का आइना बनाया है मगर उनमें से कुछ ही ऐसे फ़नकार हैं जिनके इस आईने का अक्स आवाम के दिल पर चस्पा हो सका है. सेना, जेल तथा निर्वासन में ज़िंदगी गुज़ारने वाले इस शायर को दुनिया फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ (Faiz Ahmad Faiz) से जानती है. आज इस बाकमाल शायर की जयंती है. Also Read - Birth Anniversary: गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौबहार चले... पढ़ें मोहब्बत और इंक़लाब से लैस फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की 6 चुनिंदा नज़्में

13 फरवरी, 1911 में पंजाब के सियालकोट जिले (अब पाकिस्तान में) में जन्मे इस शायर की आरंभिक शिक्षा उर्दू, अरबी तथा फ़ारसी में हुई. फ़ैज़ ने अपनी हायर एजुकेशन के लिए इंग्लैंड को चुना और कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से लॉ की डिग्री हासिल की. इस इंक़लाबी शायर ने अपनी ज़िंदगी में इल्म हासिल करने पर बहुत ज़ोर दिया. मुल्क के बंटवारे के वक्त फ़ैज़ ब्रिटिश भारतीय सेना में भर्ती थे मगर इस विभाजन के बाद उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया और लाहौर वापस आने का फैसला किया. Also Read - 'बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे...', ऐसा इंकलाबी शायर जिसके लहजे में मोहब्बत सांस लेती थी

फ़ैज़ ने अपनी ज़िंदगी में ख़ुद को उन कामों से क़रीब रखा जिससे उन्हें यह एहसास होता कि वो आवाम के क़रीब है. शायद इसीलिए उन्होंने अखबार कंपनी में संपादक की भी नौकरी की. इन नौकरियों के बीच फ़ैज़ के कलम की स्याही और गाढ़ी हो रही थी. आपको जानकार ताज्जुब होगा कि इस शायर ने जब पाकिस्तान के हुकूमत के खिलाफ लिखना और पढ़ना शुरू किया तब इन्हें कई साल तक जेल की हवा खानी पड़ी और यही नहीं एक वक़्त पर इन्हें अपनी विरोधी लेखनी के चलते मुल्क से भी बाहर निकाल दिया गया. 1951 में लियाकत अली खान की सरकार के खिलाफ जब फ़ैज़ ने मोर्चा खोला तब इन पर तख्तापलट की साजिश का आरोप लगाया गया. Also Read - 'मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग' लिखने वाले फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की यूं थी ज़िंदगी और ये हैं उनके मशहूर शेर    

पाकिस्तान से बाहर निकाल दिए जाने पर इस शायर ने कुछ वक़्त लंदन में गुज़ारा और जुल्फिकार अली भुट्टो जब पाकिस्तान के विदेश मंत्री बने तो फैज़ को वापस लाया गया. फ़ैज़ की ज़िंदगी अपने आप में ही एक मुकम्मल नज़्म सी लगती है. फ़ैज़ की रचनाओं ने हर मुल्क के आवाम को अपने सरकार से सवाल पूछने का हुनर और तरीका सिखाया.

फ़ैज़ के कई मशहूर नज़्मों में से एक नज़्म ‘हम देखेंगे’ का तज़किरा उस सदी से इस सदी और आने वाली तमाम सदियों तक होता रहा है और होता रहेगा. जिया उल हक के शासन के खिलाफ फैज ने ये नज़्म लिखी थी. इस आधुनिक उर्दू शायर को साल 1963 में लेनिन शांति पुरस्कार से नवाज़ा गया और साल 1984 में नोबेल पुरस्कार के लिए नामित किया गया. फ़ैज़ की शायरी ने हर नस्ल को हिम्मत बख्शी है.

यौम-ए-पैदाइश मुबारक फ़ैज़!