नई दिल्ली. आज वैद्यनाथ मिश्र, नागार्जुन, बाबा नागार्जुन या इन सबको मिलाकर कहें तो ‘यात्री’ की जयंती है. बिहार के दरभंगा जिले के तरौनी गांव में 1911 में जन्मे पिता गोकुल मिश्र और मां उमा देवी ने भगवान शंकर से संतान मांगी थी. इसीलिए बेटे ने जन्म लिया तो नाम पड़ा, वैद्यनाथ. मिथिला की धरती पर नागार्जुन से बड़ा विद्रोही छवि का साहित्य-सेवी शायद ही कोई हुआ हो. पिता हों या समाज या फिर देश, जहां कहीं उन्हें विद्रूपता दिखी, नागार्जुन ने उसे साहित्य का विषय बनाया. इसलिए महारानी विक्टोरिया की भारत यात्रा पर वे ‘आओ रानी हम ढोएंगे पालकी’ लिखते हैं. इमरजेंसी के दिनों में ‘इंदू जी इंदू जी क्या हुआ आपको’ लिख डालते हैं. फिर सर्वोदय के सिद्धांतों का मखौल उड़ते देख ‘गांधीजी के तीनों बंदर’ लिख देते हैं. मैथिली की धरती से निकले हिन्दी के इस महान साहित्यकार की जयंती पर आज आइए पढ़ते हैं उनकी कुछ कविताएं और उनके बारे में हिन्दी साहित्य के मूर्धन्य विद्वानों का कथन. Also Read - Bal Gangadhar Tilak Birth Anniversary: स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, हम इसे लेकर रहेंगे, जानें महान नेता के लोकमान्य बनने की कहानी

साहित्यकारों की राय ‘यात्री’ के बारे में
हिन्दी के आधुनिक कबीर नागार्जुन की कविता के बारे में डॉ. रामविलास शर्मा ने लिखा है, ‘जहां मौत नहीं है, बुढ़ापा नहीं है, जनता के असंतोष और राज्यसभाई जीवन का संतुलन नहीं है, वह कविता है नागार्जुन की. ढाई पसली के घुमंतू जीव, दमे के मरीज, गृहस्थी का भार- फिर भी क्या ताकत है नागार्जुन की कविताओं में! और कवियों में जहां छायावादी कल्पनाशीलता प्रबल हुई है, नागार्जुन की छायावादी काव्य-शैली कभी की खत्म हो चुकी है. अन्य कवियों में रहस्यवाद और यथार्थवाद को लेकर द्वन्द्व हुआ है, नागार्जुन का व्यंग्य और पैना हुआ है. क्रांतिकारी आस्था और दृढ़ हुई है, उनके यथार्थ चित्रण में अधिक विविधता और प्रौढ़ता आई है.’ Also Read - डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जयंती पर पीएम नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने दी श्रद्धांजलि, बताया- दूरदर्शी नेता

नागार्जुन के बारे में प्रसिद्ध आलोचक डॉ. नामवर सिंह ने लिखा है, ‘नागार्जुन की गिनती न तो प्रयोगशील कवियों के संदर्भ में होती है, न नई कविता के प्रसंग में; फिर भी कविता के रूप संबंधी जितने प्रयोग अकेले नागार्जुन ने किए हैं, उतने शायद ही किसी ने किए हों. कविता की उठान तो कोई नागार्जुन से सीखे और नाटकीयता में तो वे वैसे ही लाजवाब हैं. जैसी सिद्धि छंदों में, वैसा ही अधिकार बेछंद या मुक्तछंद की कविता पर. उनके बात करने के हजार ढंग हैं. और भाषा में भी बोली के ठेठ शब्दों से लेकर संस्कृत की संस्कारी पदावली तक इतने स्तर हैं कि कोई भी अभिभूत हो सकता है. तुलसीदास और निराला के बाद कविता में हिन्दी भाषा की विविधता और समृद्धि का ऐसा सर्जनात्मक संयोग नागार्जुन में ही दिखाई पड़ता है.’ Also Read - ममता ने पूर्व पीएम वाजपेयी को दी श्रद्धांजलि, कहा- हम उन्‍हें बहुत याद करते हैं

नागार्जुन को करीब से समझने वाले और उनकी रचनाशीलता को शब्दों में ढालने वाले प्रसिद्ध साहित्यकार और आलोचक डॉ. विजय बहादुर सिंह ने ‘नागार्जुन का रचनासागर’ में उन पर विस्तार से लिखा है. डॉ. विजय बहादुर सिंह लिखते हैं, ‘पारंपरिक अर्थों में नागार्जुन महाकवि नहीं हैं. किंतु वे महान कवि यदि नहीं भी कहे जाएं तो भी उनकी गिनती इसी श्रेणी में होगी क्योंकि राष्ट्रीय वेदनाओं की उनकी संवेदनीयता और राष्ट्रीय आंदोलन के गहरे सपनों के प्रति उनकी सजगता और आग्रहशीलता उन्हें यह स्थान मुहैया करा देती है.’ उन्होंने लिखा है, ‘आलोचक ठीक ही कहते हैं कि नागार्जुन आजादी के बाद के राष्ट्रीय जीवन-यथार्थ के सबसे बड़े कवि प्रवक्ता हैं. यद्यपि उनकी मुख्य मुद्रा तीखी आलोचनात्मक है किंतु उनके पाठक जानते हैं कि कोमल और सुंदर का सन्निवेश और सृजन भी उनके यहां बेजोड़ है. प्रकृति हो या प्रेम, राजनीति हो या धर्म, सभ्यता आदि, उद्योग-व्यापार हो या विज्ञान और ज्ञान, यहां तक कि इतिहास-पुराण और देवी-देवता हों, सबके सब कविता के लोकतंत्र में अपने उस चेहरे के साथ मौजूद हैं, जिसे ये सत्ताएं प्राय: छिपाने और बचाने का काम करती हैं.’

नागार्जुन की कविताओं के कुछ अंश पढ़ें

1- तीनों बंदर बापू के

बापू के भी ताऊ निकले तीनों बंदर बापू के
सरल सूत्र उलझाऊ निकले तीनों बंदर बापू के
सचमुच जीवनदानी निकले तीनों बंदर बापू के
ज्ञानी निकले, ध्यानी निकले तीनों बंदर बापू के
जल-थल-गगन-बिहारी निकले तीनों बंदर बापू के
लीला के गिरधारी निकले तीनों बंदर बापू के

सर्वोदय के नटवरलाल
फैला दुनिया भर में जाल
अभी जिएंगे ये सौ साल
ढाई घर घोड़े की चाल
मत पूछो तुम इनका हाल
सर्वोदय के नटवरलाल

लंबी उमर मिली है, खुश हैं तीनों बंदर बापू के
दिल की कली खिली है, खुश हैं तीनों बंदर बापू के
बूढ़े हैं, फिर भी जवान हैं तीनों बंदर बापू के
परम चतुर हैं, अति सुजान हैं तीनों बंदर बापू के
सौवीं बरसी मना रहे हैं तीनों बंदर बापू के
बापू को ही बना रहे हैं तीनों बंदर बापू के

2- सत्य

सत्य को लकवा मार गया है
वह लंबे काठ की तरह
पड़ा रहता है सारा दिन, सारी रात
वह फटी-फटी आंखों से
टुकुर-टुकुर ताकता रहता है सारा दिन, सारी रात
कोई भी सामने से आए-जाए
सत्य की सूनी निगाहों में जरा भी फर्क नहीं पड़ता
पथराई नजरों से वह यों ही देखता रहेगा
सारा-सारा दिन, सारी-सारी रात

3- रामराज

रामराज में अबकी रावण नंगा होकर नाचा है
सूरत शक्ल वही है भैया बदला केवल ढांचा है
नेताओं की नीयत बदली फिर तो अपने ही हाथों
धरती माता के गालों पर कस कर पड़ा तमाचा है.

(साभार: नागार्जुन की प्रतिनिधि कविताएं और नागार्जुन का रचनासागर)