नई दिल्ली. आज अमृता प्रीतम का जन्मदिन है. आज ही के दिन वर्ष 1919 में पाकिस्तान के गुजरांवालां में इस महान लेखिका, साहित्यकार का जन्म हुआ था. अमृता प्रीतम ने भारत-पाकिस्तान का बंटवारा देखा था. दोनों देशों के लोगों की भावनाओं को समझा था. यही वजह थी कि उनके साहित्य में यह दर्द दिखता है और इसीलिए उन्हें दोनों देशों का प्यार हासिल हुआ. अमृता प्रीतम मूल रूप से कवयित्री थीं, लेकिन उनकी लिखी कहानियां, उपन्यास भी उतने ही प्रसिद्ध हुए हैं. ये रचनाएं इतनी मर्मस्पर्शी हैं कि इनका कई भाषाओं में अनुवाद हुआ और अमृता प्रीतम हिन्दी, उर्दू और पंजाबी के अलावा कई अन्य भाषाओं में पढ़ी जाने वाली बड़ी साहित्यकार बन गईं. आज उनके जन्मदिन पर पढ़िए उनकी दूसरी आत्मकथा ‘अक्षरों के साये’ के शुरुआती अंश.

मौत के साये
जब मैं पैदा हुई, तो घर की दीवारों पर मौत के साये उतरे हुए थे… मैं मुश्किल से तीन बरस की थी, जब घुटनों के बल चलता हुआ मेरा छोटा भाई नहीं रहा. और जब मैं पूरे ग्यारह बरस की भी नहीं थी, तब मां नहीं रही. और फिर मेरे जिस पिता ने मेरे हाथ में कलम दी थी, वे भी नहीं रहे… और मैं इस अजनबी दुनिया में अकेली खड़ी थी- अपना कहने को कोई नहीं था. समझ में नहीं आता था कि जमीन की मिट्टी ने अगर देना नहीं था, तो फिर वह एक भाई क्यों दिया था? शायद गलती से, कि उसे जल्दी से वापिस ले लिया और कहते हैं- मां ने कई मन्नतें मान कर मुझे पाया था, पर मेरी समझ में नहीं आता था कि उसने कैसी मन्नतें मानीं और कैसी मुराद पाई? उसे किस लिए पाना था अगर इतनी जल्दी उसे धरती पर अकेले छोड़ देना था.
लगता- जब मैं मां की कोख से आग की लपट-सी पैदा हुई- तो जरूर एक साया होगा- जिसने मुझे गाढ़े धुएं की घुट्टी दी होगी… बहुत बाद में- उल्का लफ्ज सुना, तब अहसास हुआ कि सूरज के आसपास रहने वाली उल्का पट्टी से मैं आग के एक शोले की तरह गिरी थी और अब इस शोले के राख होने तक जीना होगा…

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आने वाले वक्त का साया
जब छोटी सी थी, तब सांझ घिरने लगती तो मैं खिड़की के पास खड़ी कांपते होठों से कई बार कहती- अमृता! मेरे पास आओ. शायद इसलिए कि खिड़की में से जो आसमान सामने दिखाई देता, देखती कि कितने ही पंछी उड़ते हुए कहीं जा रहे होते… जरूर घरों- अपने-अपने घोसलों को लौट रहे होते होंगे… और मेरे होंठों से बार-बार निकलता- अमृता मेरे पास आओ! लगता, मन का पंछी जो उड़ता-उड़ता जाने कहां खो गया है, अब सांझ पड़े उसे लौटना चाहिए… अपने घर-अपने घोसले में मेरे पास…
वहीं खिड़की में खड़े-खड़े तब एक नज्म कही थी- कागज पर भी उतार ली होगी, पर वह कागज जाने कहां खो गया, याद नहीं आता… लेकिन उसकी एक पंक्ति जो मेरे होठों पर जम सी गई थी- वह आज भी मेरी याद में है. वह थी, ‘सांझ घिरने लगी, सब पंछी घरों को लौटने लगे, मन रे! तू भी लौट कर उड़ जा! कभी यह सब याद आता है, तो सोचती हूं- इतनी छोटी थी, लेकिन यह कैसे हुआ कि मुझे अपने अंदर एक अमृता सी लगती- जो एक पंछी की तरह आसमान में भटक रही होती, और एक अमृता वह जो शांत वहीं खड़ी रहती थी और कहती थी- अमृता! मेरे पास आओ!
अब कह सकती हूं- जिंदगी के आने वाले कई ऐसे वक्तों का वह एक संकेत था कि एक अमृता जब दुनिया वालों के हाथों परेशान होगी, उस समय उसे अपने पास बुलाकर गले से लगाने वाली भी एक अमृता होगी- जो कहती होगी- अमृता, मेरे पास आओ!

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अक्षरों के साये
मैं बहुत छोटी थी, जब मां नहीं रही- तो रात को जब मैं छत पर सोती, लगता- चांद पर मेरी मां का नाम लिखा हुआ है. चांद की छाती पर पड़े हुए जिन दो अक्षरों के साये दिखाई देते, वे दो अक्षर ‘र’ और ‘ज’ थे. मेरी मां का नाम राज था, और इन्हीं दो अक्षरों का साया मुझे चांद में दिखाई देता रहा. उठती हुई जवानी के साथ, उन्हीं दो अक्षरों में एक अक्षर और मिल गया ‘न’ और मुझे लगता, जिसके नाम के तीन अक्षरों का साया चांद पर दिखाई देता है, वह राजन जरूर कहीं इस दुनिया में होगा, जो कभी मुझे मिलेगा.
जिस तरह गीली मिट्टी पर से गुजरने वाले के पैरों के निशान वहां पड़े हुए दिखाई देते हैं, ठीक उसी तरह मुझे चांद में उसका नाम दिखाई देता और मैं सोचती- वह कभी एक मुहब्बत बन कर जाने किन राहों से गुजरता हुआ मेरी जिंदगी में आएगा. मैं जिंदगी भर अक्षरों को कागज पर उतारती रही, लेकिन अहसास वही बना रहा कि सारे अक्षर चांद पर से गिरते हैं. इसीलिए एक बार कहा-

खामोशी के पेड़ से मैंने
ये अक्षर नहीं तोड़े
ये तो जो पेड़ पर से झड़े थे
मैं वही अक्षर चुनती रही…

(साभार- अमृता प्रीतम लिखित ‘अक्षरों के साये’ से)