पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने बेहद ‘खूबसूरत’ प्रतिक्रिया दी है. जख्मों को कुरेदे बिना उनके इस स्पीच को सुनिए, आपका दिल गदगद हो जाएगा. आपको लगेगा कि हमारे पड़ोसी देश का पीएम कितना संवेदनशील है. वह किस तरह मानवता की बात कर रहा है. वह जंग को लेकर कितना संवेदनशील है. इमरान खान ने कहा कि पाकिस्तान खुद आतंकवाद में अपने 70 हजार से अधिक लोगों को खो चुका है. उन्होंने सवाल उठाया कि पुलवामा में पाकिस्तान आखिर क्यों आतंकी हमला करवाएगा? इस हमले से उसे क्या हासिल होंगे? उन्होंने फिर कहा कि भारत अगर पुख्ता सबूत दे तो वह दोषियों के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई करेंगे.

इमरान साहब सुनने में तो आपकी ये बातें अच्छी लगती हैं. लेकिन, माफ कीजिएगा, हमारी आत्मा को मिले जख्मों को देखने पर आपका चेहरा डरावना लगता है… 26 नवंबर 2008 को मुंबई पर हुए हमले से लेकर पठानकोट एयरबेस और उरी हमले तक हम हर मौके पर आपको सबूत पर सबूत देते रहे. लेकिन अफसोस कि आपकी सरकार और आपकी सेना को इन हमलों में मारे गए निर्दोष लोगों की लाश, लाश नहीं दिख रही थी. दो जनवरी 2016 को पठानकोट एयरबेस पर हुए हमले के बाद हमने तो आपको बकायदा जांच में भागीदार बनाया. आपकी टीम को घटनास्थल का दौरा करवाया…, लेकिन इसके बावजूद मौके पर मौजूद खून के धब्बे और गोलियों के निशान आपको बनावटी लगते हैं. मुंबई हमले के जिंदा सबूत कसाब को आपने अपनाने से इनकार कर दिया कि वो आपका नागरिक है. हद तो तब हो गई जब उरी में सो रहे सेना के जवानों पर हुए हमले से भी आपका दिल नहीं पसीजा. सो रहे जवानों को जिंदा जलाकर मारने वाले आतंकी आपको ‘जेहादी’ दिखते हैं. इतना ही नहीं इन चंद आंकड़ों को भी देख लीजिए. हमें पता है कि इनमें भी आपको ‘आजादी के लिए जंग’ दिखेगी.

– 26 अगस्त 2017: पुलवामा जिले के पुलिस लाइन पर हमला, 8 जवान शहीद
– 29 नवंबर 2016: जम्मू के नागरौटा में आर्मी कैप पर हमला, 7 जवान शहीद
– 18 सितंबर 2016: उरी में सेना के कैंप पर हमला, 18 जवान शहीद
– 25 जून 2016: श्रीनगर-जम्मू हाईवे पर सीआरपीएफ की बस पर फायरिंग, 8 जवान शहीद
– 5 दिसंबर 2014: उरी के मोहरा में आर्मी कैंप पर हमला, 10 जवान शहीद
– 24 जून 2013: श्रीनगर के हैदरपोरा में बिना हथियार के बस में जा रही सेना पर हमला, 8 जवान शहीद
– 19 जुलाई 2008: श्रीनगर के नारबल में सड़क किनारे किए गए विस्फोट में 10 जवान शहीद

इमरान साहब… हम भी जंग नहीं चाहते. हमें पता है कि जंग से कुछ हासिल नहीं होगा. दोनों देशों में करोड़ों लोग आज भी भूखे सोते हैं. इलाज के अभाव में लाखों दम तोड़ देते हैं. करोड़ों बच्चे आज भी स्कूल का मुंह नहीं देख पाते… इसी कारण हम इतनी पीड़ा सहने के बाद भी जंग से नफरत और अमन से प्रेम करते हैं. लेकिन अब… हमारा भी धैर्य जवाब दे चुका है. हमें भविष्य में अंधकार ही अंधकार दिख रहा है. आपमें उम्मीद की एक किरण दिखी थी… लेकिन आज वो भी कहीं खो गई लगती है. कुछ माह पहले तक उम्मीदों से भरे इमरान का चेहरा आज काला और डरावना दिखा रहा है… खुदा हाफिज…!

डिस्क्लेमरः आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं.