दुनिया के अरबों लोग शुक्रवार रात करीब 12 बजे लगने वाले चंद्रग्रहण को देख सकेंगे. इस चंद्रग्रहण को मीडिया ने ‘ब्लड मून’ नाम दिया है. इसे दुनिया के अधिकतर हिस्से में देखा जा सकेगा. केवल उत्तरी अमेरिका और ग्रीनलैंड इस खगोलीय घटना के गवाह बनने से वंचित रह जाएंगे. यह इस सदी का सबसे लंबा चंद्रग्रहण होगा. इस ग्रहण को लेकर दुनिया के मीडिया में खूब चर्चा हो रही है. इसे भयावह रूप में दिखाया जा रहा है. लोगों को डराया जा रहा है. लेकिन आपको जानने की जरूरत है कि ये सारी बातें तरह-तरह की मान्याताओं पर आधारित हैं. आइए जानने की कोशिश करते हैं कि दुनिया में इसको लेकर क्या मान्याताएं हैं और विज्ञान क्या कहता है. Also Read - Chandra Grahan 2020: लाख गुणों से भरपूर है तुलसी का पौधा, जानें ग्रहण में इसके चमत्कारिक प्रभाव

संडे टाइम्स अखबार में इंग्लैंड के नॉटिंघम ट्रेंट यूनिवर्सिटी में एस्ट्रोनॉमी (ज्योतिष) के लेक्चरर डैनियल ब्राउन ने इस चंद्रग्रहण पर एक लेख लिखा है. दरअसल, चंद्रग्रहण में पूरा चांद धरती की छाया में छिप जाता है और इस कारण वह धरती से काला दिखने लगता है. लेकिन, धरती से रेफलेक्ट होकर सूर्य की कुछ रोशनी चांद पर तब भी पड़ती है. इस कारण धरती से चांद लाल दिखता है. इसे मीडिया ने ब्लड मून नाम दे दिया है, लेकिन वास्तविक रूप में लाल जैसा कुछ नहीं होता. Also Read - Chandra Grahan 2020: यहां देखें अपनी राशि अनुसार मंत्र जिनके जाप से खत्म होगा उपछाया चंद्रग्रहण का दुष्प्रभाव

चंद्रग्रहण की दुनिया की सभी संस्कृतियों में चर्चा की जाती है. इसके साथ तमाम तरह की कहानियां और किस्से जुड़े हुए हैं. कई इसको अशुभ मानते हैं. लेकिन इसमें आश्चर्यचकित होने जैसी कोई चीज नहीं है. दरअसल, एस्ट्रोनॉमी के हिसाब से जब कोई भी चीज सूर्य या चांद के नियमित लय को बाधित करती है तो उसका हमारे जीवन और जिंदगी पर व्यापक असर पड़ना स्वाभाविक है. इसके परेशान होने या डरने की कोई जरूरत नहीं है. Also Read - 2020 में दुनिया को दिखाई देंगे ग्रहण के 6 नजारे, भारत में इतने आएंगे नजर

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चांद पर खतरा!
दुनिया की कई संस्कृतियों में ‘ब्लड मून’ के साथ कई बुराइयों के जुड़े होने की बात की जाती हैं. अमेरिकी क्षेत्र में प्राचीन समय में चांद के रंग में इस बदलाव को धरती के इस उपग्रह पर जैगुआर के हमले और उसे खाने की कोशिश के रूप में पारिभाषित किया गया. उनका मानना था कि ये जैगुआर चांद के बाद धरती की ओर रुख करेगा. इस कारण वहां के लोग चंद्रग्रहण में चिल्लाते रहते हैं और हाथ में भाले बरछे लिए रहते हैं. कुत्ते पूरे समय भोंकते रहते हैं. उनका मानना था कि शोर मचाने से जैगुआर भाग जाएगा.

प्राचीन इराक की सभ्यता में चंद्रग्रहण को सीधे तौर पर राजा पर हमला करार दिया गया है. वे चंद्रग्रहण का सटीक अनुमान लगाने में सक्षम थे. इस कारण वे इस दौरान एक छद्म राजा को राजमहल में बैठा देते थे. वास्तविक राजा छिप जाते थे और चंद्रग्रहण खत्म होने के बाद ही वह बाहर निकलते थे.

हिंदू मान्यताएं
इसी तरह हिंदू मान्यताओं में कहा जाता है कि जब राहू ग्रह के अमरत्व के अमृत को पीने के कारण चंद्रग्रहण लगता है. दरअसल, कहा जाता है कि सूर्य और चांद देवता, राहू को खा गए थे लेकिन अमृत पीने के कारण राहू का धड़ जीवित रह गया. इसी का बदला लेने के लिए राहू का धड़ सूर्य और चांद को निगलना चाहता है और इस कारण वह उनका पीछा करते रहता है. जब वह सूर्य और चांद को पकड़ लेता है तब ग्रहण लग जाता है और राहू चांद को निगलने लगता है. भारत में आज भी करोड़ों लोग चंद्रग्रहण को अशुभ मानते हैं. इस दौरान भोजन और पानी को ढककर रखा जाता है और शुद्धिकरण का काम किया जाता है. इस दौरान गर्भवती महिलाओं को विशेषतौर पर कुछ भी खाने-पीने से रोका जाता है.

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अमेरिकी आदिवासी मान्यताएं
हालांकि ऐसा नहीं है कि सभी ग्रहण को इसी नजरिए से देखा जाता है. अमेरिका के कैलिफोर्निया में रहने वाले मूल हूपा और लिइसेनो ट्राइब्स यह मानते हैं कि ग्रहण के दौरान चांद जख्मी या बीमार हो जाता है. ग्रहण के बाद चांद को उपचार की जरूरत होती है. ये उपचार चांद की पत्नी या आदिवासी लोग करते हैं. इसी क्रम में लुइसेनो आदिवासी काले पड़े चुके चांद को देखते हुए उसके स्वस्थ होने की कामना में गीत गाते हैं.

दूसरी तरफ अफ्रीका के टोगो और बेनिन में बाटामालिबा के लोग मानते हैं कि चंद्रग्रहण सूर्य और चांद के बीच झगड़े का नतीजा है. उनका मानना है कि लोगों को इस झगड़े को खत्म कराने की कोशिश करनी चाहिए. इस कारण वे पुराने झगड़े भुलाने की कोशिश करते हैं. वहां पर यह परंपरा आज भी जारी है.

इस्लामिक मान्यताएं
इस्लामिक संस्कृति में ग्रहण को लेकर कोई अंधविश्वास नहीं जुड़ा है. इस्लाम में कहा जाता है कि सूर्य और चांद में अल्लाह के प्रति गहरा लगाव है, इस कारण ग्रहण के दौरान विशेष नमाज अदा की जाती है. इनका मानना है कि ग्रहण के दिन चांद और सूर्य दोनों अल्लाह से माफी मांगते हैं और उनकी इकबालियत को स्वीकार करते हैं.

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ईसाई मान्यताएं
ईसाई समुदाय ने चंद्रग्रहण को ईश्वर के गुस्से का प्रतीक बताया है और वे अक्सर इसे ईसा मसीह को सूली पर चढ़ाने से जोड़ते हैं. यहां ध्यान देने की बात है कि ईसाई समुदाय यह पर्व अप्रैल के आसपास पूर्णिम के बाद पहले रविवार को मनाता है ताकि कभी भी एस्टर के दिन कोई ग्रहण न लगे.

नहीं होती ‘ब्लड मून’ जैसी कोई चीज
‘ब्लड मून’ शब्द को लोकप्रियता 2013 में मिली. जॉन हेग की किताब ‘फोर ब्लड मून्स’ आने के बाद इस शब्द की खूब चर्चा हुई. उन्होंने इस शब्द के चरिए दुनिया में एक अंदेशा या नकारात्मकता को बढ़ावा दिया. इस किताब में उन्होंने 2014-15 के दौरान के चार चंद्रग्रहणों का जिक्र किया है. इसमें उन्होंने पाया है कि ये चारों चंद्रग्रहण यहूदियों के छुट्टी के दिन पड़े थे. इससे पहले केवल तीन बार ऐसा हुआ था. पूर्व में ऐसे तीनों दिन किसी न किसी अपशकुन के लिए जाने जाते हैं. हालांकि, इस्राइल के क्रिश्चन विटनेस नामक संस्था के जनरल सेक्रेटरी माइक मूर ने इस धारणा को खारिज कर दिया था. इसके बावजूद मीडिया नियमित रूप से ब्लड मूल शब्द का इस्तेमाल करता रहा है. यहां तक कि यह अब चंद्रग्रहण का पर्याय बन गया है.

यह अंधविश्वास इतना बढ़ गया है कि अब साइंस भी असहाय महसूस कर रहा है. वह यह नहीं बता पा रहा है कि ब्लड मून जैसी कोई चीज इस दुनिया में होती ही नहीं है. उससे डरने की कोई जरूरत नहीं है. आज रात होने वाली खगोलीय घटना मजेदार हो सकती है, यह सदी की सबसे बड़ी घटना हो सकती है लेकिन यह एक सामान्य चंद्रग्रहण ही है.