ऑस्ट्रियाई लेखक स्टीफन स्वाइग ने इस किताब को आत्महत्या से कुछ महीने पहले ही पूरा किया था. अव्वल तो इस किताब को आत्मकथा बताया गया है, लेकिन आप पढ़ेंगे तो लगेगा कि किसी आत्मकथा में इस तरह से समय, काल और वैश्विक परिस्थिति का प्रयोग शायद ही किया गया होगा. युद्ध के दौरान लिखी गई और युद्ध की विभीषिका से ही डरा रही यह किताब उस वक्त हाथ लगी है जब देश में युद्ध जैसे माहौल पैदा हुए हैं और इसके आस-पास ही प्रतिक्रियाओं आ रही हैं. उस दौर में यहूदी होना या फिर हिटलर की कार्यप्रणाली से एक लेखक का अपना देश छोड़ना जैसे बिंदु इसमें इस बारीकी से जोड़े गए हैं कि बार-बार यह सोचने को मजबूर होना पड़ सकता है कि यह आत्मकथा से इतर एक सामाजिक इतिहास है. किताब के निष्कर्ष में जाएंगे तो लगेगा कि यहां पर-पल होती अनहोनी के बीच अपनों के खोने का डर ऐसा है कि यह हमें बार-बार युद्ध के खिलाफ होने के लिए प्रेरित कर रही है.Also Read - IRS अधिकारी डॉ. कविता भटनागर के उपन्यास 'लव अनलॉक्‍ड' का विमोचन, AIIMS चीफ डॉ. गुलेरिया भी रहे मौजूद

हिटलर से प्रताड़ित स्वाइग देश छोड़कर ब्राजील पहुंचते हैं और सिर्फ अपनी यादों, अनुभवों और सहे गए अत्यचारों को ”मैं” से ”हम” तक ले जाते हैं. स्कूल-कॉलेज, लाइब्रेरी, कोर्स बुक से बात करते हुए इस किताब में स्वाइग आपको एक तरह से बताते हैं कि किसी भी क्षेत्र में कुछ सीखने, करने या पाने के लिए सिर्फ अकादमिक कैरियर ही जरूरी या फिर फायदेमंद नहीं हो सकता है. फ्राइड ने यहां तक लिखा है कि कभी-कभी यही अकादमकि कैरियर की पहल आपकी उस ”मंजिल” के लिए रोड़ा साबित हो सकता है. Also Read - 'एक देश बारह दुनिया'- किस्से और पंक्तियां उनके लिए जो अपनी जड़ों से उजड़ गए! (पुस्तक समीक्षा)

हर शख्स के जेहन में एक न एक शहर होता है, जहां वह बार-बार जाना चाहता है. लेकिन ये किताब पढ़ते हुए मुझे वियना, बेल्जियम और पेरिस देखने की तलब लग गई. बार-बार सोचा कि यार सैलरी इतनी होनी चाहिए कि यूरोप तो घूम ही आऊं :D. किताब पढ़ते हुए जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया तो आपको ऐसा लगेगा कि अपने आस-पास के किसी शहर की ही बात पढ़ने लगे हैं, जिसे बखूबी जानते हैं. Also Read - पुस्तक समीक्षा: सरकारी स्कूलों पर विश्वास बहाली का दस्तावेज है 'उम्मीद की पाठशाला'

पूरी किताब में प्रेम, आत्मविश्वास, अपने शहर-अपनी चीजों से लगाव, अपनों पर विश्वास इस तरह दिखता है कि किताब को पढ़ने के बाद आप थोड़ी देर तक बैठकर ये सोचेंगे कि अगर यह आत्मकथा है तो ”अपनी चीजों” को इतना जीने वाला लेखक आत्महत्या कैसे कर सकता है. आप मन में लेखक का स्केच बनाकर उसके बारे में सोचने को मजबूर हो जाएंगे. आपको लगेगा कि आप एक कहानी पढ़ रहे हैं और पहले विश्वयुद्ध से दूसरे युद्ध तक पहुंच जा रहे हैं. यहां आपको जिंदगी की चुनौतियों के बीच किन चीजों से शक्ति मिलती है और एकांत में स्वाइग अपनी किसी क्षमता पर किस तरह सर्वोत्तम हो जाते हैं का पता चलता है.

स्टीफन स्वाइग की इस किताब ”द वर्ल्ड ऑफ यशटर्डे” का ओमा शर्मा ने बखूबी अनुवाद किया है और ”वह गुजरा जमाना” आपको बार-बार महसूस कराता है. यह किताब इस समय इसलिए भी मौजू है क्योंकि पाकिस्तान के साथ तनाव अभी जारी है. सीमा पर जवान शहीद हो रहे हैं और सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक कुछ लोग युद्ध की मांग कर रहे हैं. ऐसे समय में यह किताब युद्ध की विभीषिका का अहसास करा रही है.