आलोक कुमार मिश्राAlso Read - 'एक देश बारह दुनिया'- किस्से और पंक्तियां उनके लिए जो अपनी जड़ों से उजड़ गए! (पुस्तक समीक्षा)

सरकारी स्कूलों की वर्तमान दुर्दशा की कहानी से कौन परिचित नहीं है? वास्तव में यह कहानी हमारे अपने समाज और उसके सपनों के पतन की कहानी ही है. ऐसा नहीं है कि सरकारी स्कूली व्यवस्था कभी पूर्ण संपन्न रूप से अपने उरूज पर थी और अब वह अपनी संपन्नता से लुढ़क कर रसातल को चली आई है. कमोबेश अपनी संसाधन क्षमता और भूमिका में वह बहुत अच्छी स्थिति में कभी भी नहीं थी. पर सत्तर-अस्सी के दशक और खासकर उदारीकरण-बाजारीकरण की आँधी के बाद बेशक जिस कच्ची-पक्की जमीन पर उसके पाँव थे वह भी उखड़ने लगे. पहले निजी स्कूलों की न्यून उपस्थिति में कमोबेश सभी समूहों-वर्गों के बच्चे इसी व्यवस्था से निकलते थे. पर इस नये दौर में यह द्वैध अलिखित रूप से स्थापित हो गया कि संविधान की भावना और शैक्षिक दस्तावेजों में बार-बार सबके लिए समान स्कूली प्रणाली की प्रतिबद्धता के बावजूद शिक्षा की कई परतें होंगी. वैसे तो इन्हें मोटे तौर पर अमीर परिवारों के बच्चों के लिए मंहगे निजी स्कूल और सामान्य, गरीब और वंचित परिवारों के बच्चों के लिए संसाधन विपन्न सरकारी स्कूल में बांटकर देखा जा सकता है. Also Read - समीक्षा: पाकिस्तान से तनाव और युद्ध जैसे माहौल में... पढ़ना चाहिए 'वो गुजरा जमाना'

पर मामला इतना सरल भी नहीं है. निजी स्कूलों में फीस के अनुसार कई स्तर हैं तो सरकारी स्कूलों में भी केन्द्रीय सरकारी कर्मचारियों के बच्चों के लिए केंद्रीय विद्यालय, सैनिकों के बच्चों के लिए सैनिक विद्यालय, ग्रामीण क्षेत्रों के उच्च उपलब्धि वाले बच्चों के लिए नवोदय, अन्य सभी साधारण और गरीब परिवारों के बच्चों के लिए सामान्य स्कूल आदि हैं, जिनमें पर्याप्त गुणवत्ता परक अंतर भी है. शिरीष खरे अपनी पुस्तक ‘उम्मीद की पाठशाला’ में बहुपरतीय शिक्षा पर चिंता प्रकट करते हुए इस विपरित काल में भी दूर-दराज और ग्रामीण-आदिवासी अंचल के ऐसे सरकारी स्कूलों की सफलता की कहानियाँ सामने लेकर आए हैं जो अपने सीमित संसाधनों के बल पर ही शिक्षकों-अभिभावकों व समुदाय की प्रतिबद्धता से सफलता के नये मानक गढ़ रहे हैं. इन स्कूलों ने न केवल बच्चों को सही शिक्षा दी है, उन्हें सिखाया है बल्कि स्कूलों के द्वारा समुदाय और आसपास के समाज में भी अपना सकारात्मक दखल बढ़ाया है.

इसी वर्ष (2020) ही अगोरा प्रकाशन से आई यह पुस्तक एक तरह से सही समय पर आये उस दस्तावेज का काम कर सकती है जो लोगों के बीच सरकारी स्कूलों के प्रति छीजते विश्वास को पुनर्स्थापित कर सके. सामाजिक कार्यकर्ता और ‘एक देश समान शिक्षा आंदोलन’ उत्तर प्रदेश के संयोजक वल्लभाचार्य पांडेय ने शिरीष खरे की इस अकादमिक उद्यम को सच ही ‘यथार्थ की कलात्मक प्रस्तुतियां’ कहा है. लेखक ऐसी-ऐसी यथार्थ पूर्ण स्कूली कहानियाँ सुनाते हैं जो आश्चर्य से ही नहीं भरते बल्कि निजी स्कूलों की लूट के बरक्स सब तक समान पहुंच वाले समान स्कूल प्रणाली की जरूरत को पुनर्स्थापित कर देते हैं.

‘आत्मकथ्य’ पढ़कर लेखक की वैचारिक बुनावट को आधार देने वाले प्रसंगों को समझा जा सकता है. जिसमें सामान्य ग्रामीण पृष्ठभूमि से होकर पत्रकारिता की दुनिया में भटकाव, गरीब लोगों से गरीबी पर बातचीत और उसमें आड़े आने वाले ‘आत्म-स्वाभिमान’ की भावना तक के बीच उनकी समझ निर्माण और संवेदनशील मन की अपनी भूमिका है. किताब में शामिल लेखक की लिखी कविता ‘मेरी छोटी बहन’ भावुक करने वाली है. यह कविता एक ही समय और पृष्ठभूमि में भिन्न लैंगिक शैक्षिक और सामाजिक अनुभवों को गहरे रूप में दर्ज करती है.

‘अगर शिक्षा की हो एक परत’ शीर्षक के अंतर्गत लेखक ने 1882 में ही औपनिवेशिक शासन में आए भारतीय शिक्षा आयोग के समक्ष ज्योतिराव फुले की सबके लिए समान शिक्षा की उपलब्धता की मांग युक्त ज्ञापन और 1911 में ब्रिटिश शासन के समक्ष इसी तरह की माँग से लैस गोखले विधेयक की ओर ध्यान दिलाया है. भले ही ये प्रयास विफल रहे हों किंतु आजाद भारत में कोठारी आयोग से लेकर नई शिक्षा नीति, रामामूर्ति कमेटी, राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा, 2005 तक के दस्तावेजों में समान स्कूली प्रणाली की प्रतिबद्धता को दोहराया गया है. पर आज सरकारें इस पर आंख मूँदे हुई हैं. नितांत विकसित पूंजीवादी देशों तक में सरकारी स्कूल व्यवस्था ही मजबूत है और सार्वजनिक नियंत्रण में है पर भारत जैसे गरीब देश में ऐसा क्यों नहीं है, यह लेखक का वाजिब सवाल है.

‘क्यों जरूरी है सरकारी स्कूलों की वकालत’ में लेखक उन स्थितियों को आंकता है जो सरकारी स्कूलों के परिणाम को निजी स्कूलों से कम आने पर मजबूर करते हैं. निजी स्कूलों में बच्चों को पहले ही टेस्ट लेकर एक स्तर पर होने के बाद प्रवेश दिया जाता है. अमूमन घर पर ज्यादा ध्यान, ट्यूशन की व्यवस्था आदि होती है जबकि सरकारी स्कूल सभी को अवसर देते हैं. ऊपर से गैर शिक्षणेत्तर कामों का शिक्षकों पर बोझ सामान्य बात है. यदि यह स्थिति न हो तो निजी स्कूल कतई सरकारी स्कूलों से बेहतर नहीं हो सकते. शिरीष खरे एक लोकतांत्रिक समाज के लिए इस बहु परतीय व्यवस्था को गलत मानते हैं.

पुस्तक में लेखक आगे अलग-अलग राज्यों विशेषकर महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, गोवा आदि के ऐसे सरकारी स्कूलों की सफलता की कहानी लेकर आते हैं जिन्होंने न केवल जड़ता तोड़ी, छवि बदली बल्कि समुदाय, सरकार आदि से मान्यता प्राप्त कर सफलता के नये मानक गढ़े. इस पुस्तक की बहुत सी कहानियों में ‘मूल्यवर्धन कार्यक्रम’ की सफलता एक साझा तत्व के रूप में सामने आती है खासकर महाराष्ट्र के स्कूलों की कहानी में. यह कार्यक्रम पुणे स्थित समाजसेवी संस्था ‘शांतिलाल मुथ्था फाउंडेशन’ ने एक दशक पहले विकसित किया था जिसे राज्य सरकार के सहयोग से सभी सरकारी स्कूलों में लागू किया गया है (पृ 45).

इस कार्यक्रम में स्वतंत्रता, समानता, न्याय, बंधुत्व जैसे संवैधानिक मूल्यों को बढ़ावा दिया जाता है. इसका उद्देश्य बच्चों को लोकतांत्रिक नागरिक बनाना है. इसमें कहानी, चर्चा, गतिविधि, मिलकर नियम बनाना आदि शामिल होता है. पुस्तक में बहुत से स्कूल इस कार्यक्रम की सफलता को बयां करते हैं. जैसे-

* जिला परिषद सांगली का एक स्कूल जो बंद होने के कागार पर था, अब जीवन दान पा चुका है.

* स्कूल से चलाए नशामुक्ति अभियान ने एक पूरे गाँव को नशामुक्ति की राह पर चला दिया है. ऐसा बच्चों द्वारा बड़ो को जागरूक करने और जागरूकता अभियान चलाने से संभव हुआ.

* जिला मुख्यालय रत्नागिरि से 40 किमी दूर लांचा ब्लाक के एक स्कूल की शिक्षिका शमा शेख बताती हैं कि कैसे मूल्यवर्धन कार्यक्रम से उन्होंने झगड़ालू बच्चे को पढ़ाई में अव्वल आदर्श बच्चा बनाया.

* आदर्शशाला वाकेड-2, रत्नागिरि के वे बच्चे जो गुमशुम रहते थे अब नाटक तैयार करते हैं.

* महाराष्ट्र के वर्धा जिले का गजानन प्राथमिक शाला अंधविश्वास के खिलाफ़ वैज्ञानिक शिक्षा देकर मिसाल कायम कर रहा है और बच्चों को संवेदनशील बना रहा है.

* एक स्कूल में बच्चों ने खुद ही समय पर स्कूल आने का नियम बनाया और देर से आने की समस्या दूर की. नारा गढ़ा- समय पर स्कूल चले हम.

* सांगली जिले के 6 स्कूलों की सफलता की कहानी प्रेरक है, जिसमें मादल मुट्ठी शाला को 2017 में अंतर्राष्ट्रीय मान्यता मिली और आई एस ओ प्रमाणपत्र मिला.

शिरीष खरे ने दो अलग-अलग पृष्ठभूमि के प्राथमिक शिक्षकों की डायरी के बारे में लिखते हुए यह स्थापित किया है कि कैसे भिन्नताओं के होते हुए भी सभी जगह समस्याएँ होती हैं और शिक्षक उनसे अपने तरीके से निपट सकते हैं अगर इच्छाशक्ति हो तो. एक डायरी है- जूलिया वेबर गार्डन की डायरी- माई कंट्री स्कूल डायरी (1946) जिसे जाॅन होल्ट की मदद से सबके सामने लाया गया. दूसरी डायरी है- उत्तराखंड के सहायक शिक्षक हेमराज की डायरी जो 40 वर्ष की उम्र में सड़क दुर्घटना में चल बसे. इसे अजीम प्रेम जी विश्वविद्यालय से जुड़े लोगों की मदद से सामने लाया गया.समय, पृष्ठभूमि अलग होते हुए भी यह डायरियां दो शिक्षकों के अदम्य जिजीविषा, बदलाव के लिए प्रयास, प्रयोग को सामने लाती हैं और प्रेरित करती हैं.

पुस्तक में नर्मदा जीवनशालाओं की कहानी बहुत प्रेरित करने वाली हैं जिनमें विस्थापित आदिवासी ‘लड़ाई और पढ़ाई साथ-साथ’ करके अपने वर्तमान और भविष्य से टक्कर ले रहे हैं. इन स्कूलों के पाठ्यक्रम में आदिवासी भाषाओं, कथाओं, जंगल के जीवन और परंपराओं पर विशेष जोर दिया गया है जिसे सामान्य व्यवस्था में उपेक्षित कर दिया जाता है. इसी तरह छत्तीसगढ़ के तीन सरकारी स्कूलों की सफलता की कहानी भी लाजवाब है. आदिवासी अंचल रायपुर से दो सौ किमी दूर अचानकमार के जंगलों में दिल्ली से गये प्रोफेसर प्रोफेसर प्रभुदत्त खेड़ा द्वारा पिछले तीन दशक से बैगा आदिवासियों के बीच उनका होकर काम करने की कहानी अपने आप में अनोखी है. शिक्षा और अन्य तरह की सेवाएं देने वाले प्रोफेसर साहब वहाँ ‘दिल्ली साब’ के नाम से जाने जाते हैं.

किताब आगे ‘दूसरी ओर’ शीर्षक के अंतर्गत छत्तीसगढ़, गोवा आदि राज्यों में शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षकों, विद्यार्थियों द्वारा किए जा रहे अनोखे कार्यों, उपलब्धियों और बदलाव की कहानियों को सामने लाती है. वास्तव में यह किताब सरकारी स्कूलों की पुनः प्राण प्रतिष्ठा के स्थानीय स्तर पर हो रहे प्रयासों को ही सामने लाने का काम नहीं करती बल्कि यह विचार स्थापित करने में भी सफल होती है कि अभी भी देर नहीं हुई है. समान स्कूली व्यवस्था ही लोकतंत्रिक समाज का आधार बन सकती है अन्यथा हम अपनी विषमताओं को यूँ ही पोषते रहेंगे.

यद्यपि इस पुस्तक को पढ़ते हुए इसकी कुछ सीमाएं भी उजागर होती हैं. जैसे पुस्तक में दर्ज लगभग सभी स्कूल प्राथमिक शाला हैं और कम विद्यार्थियों की संख्या वाले स्कूल हैं. प्रश्न उठता है कि क्या समान स्कूली प्रणाली का सपना सिर्फ़ प्राथमिक या कम संख्या वाले स्कूलों से ही संबंधित है? माध्यमिक या उच्चतर माध्यमिक स्कूलों और इसके शिक्षकों का भी तो इस सपने से गहरा ताल्लुक है ही. साथ ही बच्चों की अधिक संख्या वाले स्कूल भी अपनी अलग समस्याओं के साथ इस मामले में कैसे बेहतरीन कर रहे हैं उसे भी आगे लाया जा सकता है. इसी तरह सफलता की कहानियों से गुजरते हुए यह एहसास भी होता है कि कुछ जगहों पर कहानियाँ बहुत सरसरी ढंग से कही गई हैं. मात्र शिक्षक के कहे को ही कई बार सफलता का आधार मान लिया गया है, जबकि ऐसे मामले में अधिक गहरे पड़ताल की आवश्यकता होती है. ऐसा हो सकता है कि लेखक ने यह किया हो, पर इसे दर्ज करने में वे चूकते हुए दिखते हैं. एक और बात पुस्तक पढ़ते हुए मन में आती है. कुछ जगहों पर पिछले वर्षों में कुछ सरकारों ने भी सरकारी स्कूल व्यवस्था को बदहाली से निकालने के लिए सचेष्ट प्रयास किया है, उन्हें भी दर्ज किया जाना चाहिये था. जैसे दिल्ली सरकार ने बहुत से नवोन्मेषी कार्यक्रम चलाए हैं और स्कूलों को संसाधन संपन्न बनाने का प्रयास किया है. कुछ मुद्दों पर उसकी आलोचना भी हो सकती है पर इसे सार्वजनिक विमर्श में स्थान मिला है. पहली बार सरकारी स्कूल के मुद्दे पर सत्ताधारी दल चुनाव में उतरा जो अपने आप में हमारे देश में अनोखी बात ही है.

यद्यपि यह अपेक्षा मुझ जैसे पाठक की है जिसे आरोपित करना गलत भी हो सकता है. एक पुस्तक सभी पक्षों को खुद में समाहित कर पाए जरूरी नहीं. लेखक ने जिस पक्ष को पुस्तक में उठाया है वह काबिलेगौर है. सफलता की ये कहानियाँ हम शिक्षकों, अभिभावकों और समुदाय के लोगों को जरूर प्रोत्साहित करेंगी, सरकारी स्कूलों के गिरते साख को संभालेंगी और लोगों की नजर में अच्छी छवि गढ़ेंगी. लेखक को मेरी और से इतनी अच्छी पुस्तक के लिए धन्यवाद और शुभकामनाएं. उम्मीद है कि वह आगे भी इसी तरह से स्कूलों के बारे में लिखकर चौंकाते रहेंगे.