Chandra Shekhar Azad Birth Anniversary: 23 जुलाई यानी आज स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और पूरे भारतवर्ष के आत्मगौरव चंद्रशेखर आजाद की जयंती है. चद्रशेखर आजाद, यह नाम सुनते ही इंसानों के मन में दो छवि सामने आती है. पहली- मूछों पर भारतीयों के आत्मसम्मान का ताव. दूसरी भारत माता के प्रति आत्मसमर्पण ऐसा कि आखिरी गोली से खुद की जान ले ली, क्योंकि आजाद हमेशा आजाद रहता है. लेकिन ऐसी कई किस्से कहानियां है जो चंद्रशेखर आजाद स्वाधीनता संग्राम में एक अलग स्थान दिलाता है. यह वही आजाद हैं, जिनसे जेल में जब अंग्रेज पूछताछ कर रहे थे तो इन्होंने अपने पिता का नाम स्वतंत्रता और पता जेल बताया था. यह वही आजाद हैं, जिन्होंने मात्र 17 साल की उम्र में आजाद हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़े थे. यह वही आजाद हैं जिन्हें इनके शानदार दिमाग के कारण क्विक सिल्वर कहा जाता है. यह वही आजाद हैं जिन्होंने 1925 के काकोरी कांड में अहम भूमिका निभाई और अंग्रेजों की जड़ों को हिलाकर रख दिया था. यह वहीं चंद्रशेखर हैं, जिन्हें पहली बार जेल जाने पर 15 कोड़े मारने की सजा गई थी. Also Read - ताउम्र आजाद बने रहेंगे भारत के वीर सपूत चंद्रशेखर, जानें 10 बातें

आजाद हमेशा आजाद रहे Also Read - भीम आर्मी नेता चंद्रशेखर आज़ाद को मिली जमानत, कोर्ट ने कहा- अब 4 हफ्ते तक दिल्ली से दूर रहें

चंद्रशेखर आजाद ने एक बार स्वतंत्रता सेनानियों की बैठक में कहा था कि अंग्रेज कभी मुझे जिंदा नहीं पकड़ सकते हैं. इसके बाद जब अल्फ्रेड पार्क में उन्हें अंग्रेजों ने 27 फरवरी 1931 को घेरा तो आजाद ने पहले जमकर मुकाबला किया. लेकिन जब आजाद के पास आखिरी गोली बची, तो आजाद ने खुद की कनपटी पर पिस्तौल रख खुद की जान ले ली और वीरगति को प्राप्त हुए. यहां से आजाद ने बच्चे बच्चे के अंदर आजादी का वह बीज बोया जिसे अंग्रेज कभी जीते जी दबा नहीं सकते थे. आजाद की बातें और उनका खुद को शहीद कर देना ही उनके आजादी पसंद होने का प्रमाण था. आपको जानकर हैरानी होगी कि जब आजाद मृत पड़े थे तब भी अंग्रेज उनके पास जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे. जब उन्हें ये पता चल गया कि वो मृत हो चुके है तब अंग्रेज उनके पास गए और आजाद के मृत शरीर को गोली मारी. यह अमानवीयता थी जो अंग्रेजों ने दिखाई. लेकिन याद रहे आजाद कभी जिंदा अंग्रेजों के हाथ नहीं आए. यह मलाल तो उन्हें भी रहा. Also Read - हाईकोर्ट की दिल्ली पुलिस को फटकार, कहा- जामा मस्जिद पाकिस्तान में नहीं, जो वहां प्रोटेस्ट नहीं हो सकता

पंड़ित जी के घर एक योद्धा का जन्म

चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को आदिवासी ग्रम भाबरा में हुआ था. उनके पिता का नाम पंडित सीताराम तिवारी था. ये उन्नाव जिले के बदर गांव के रहने वाले थे. आकाल पड़ने के कारण बाद में इनका पिरवार भाबरा में बस गया. यही से चंद्रशेखर आजाद की प्रारम्भिक जीवन की शुरुआत हुई. उन्होंने धनुष बाण चलाना सीखा. बता दें कि इस गांव का नाम अब बदलकर चंद्रशेखर आजाद के नाम पर रख दिया गया है.

गांधी से प्रभावित थे आजाद

हम महात्मा गांधी को आज चाहे वैचारिक रूप से कितना भी कुछ बुरा भला कह रहे हों. लेकिन यह बात कोई झुंठला नहीं सकता है कि हर एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी महात्मा गांधी का सम्मान करता था, उनसे प्रभावित था. चंद्रशेखर आजाद भी गांधी से कापी प्रभावित थे. बता दें कि पहली बार जब अंग्रेजों ने आजाद को गिरफ्तार किया तो उन्हे मिजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया. लेकिन आपको पता है कि आजाद का हर सवाल का जवाब क्या था. आजाद से पिता का नाम पूछने पर उन्होंने बताया स्वतंत्रता, चंद्रशेखर से जब जज ने उनका नाम पूछा तो उन्होंने बताया आजाद, घर का पता पूछने पर आजाद बोले जेल मेरा घर है. बता दें कि आजाद के जवाबों के कारण मिजिस्ट्रेट को काफी गुस्सा आ गया और उसने आजाद को 15 कोड़े मारने की सजा दी थी. इस दौरान हर कोड़े के बाद आजाद दो ही शब्द बोलते थे- वंदे मातरम, महात्मा गांधी की जय. इसी घटना के बाद से ही चंद्रशेखर आजाद के नाम से प्रसिद्ध हुए

गांधी से नाराजगी

बात दरअसल 1922 की है जब महात्मा गांधी ने चौरा-चौरी घटना के बाद असहयोग आंदोलन को समाप्त कर दिया था. इससे आजाद गांधी से काफी नाराज हुए. इसके बाद उनका परिचय राम प्रसाद बिस्मिल से हुए. इसके बाद 1925 में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की स्थापना की गई. इसके बाद दोनों के बीच घनिष्ठता बढ़ती गई और अंग्रेजों के खिलाफ शस्त्र के दम पर आजादी छीनने की ठान ली. यहीं से आजाद गरम दल में शामिल होते हैं.