Chandra Shekhar Azad Death anniversary: 27 फरवरी 1931 को भारत के वीर सपूत चंद्रशेखर आजाद सच में ‘आजाद’ हो गए थे. इस दिन को जहां लोग मायूसी के लिए जानते हैं वहीं इसी दिन को गर्व के लिए भी जानते हैं. मायूसी इसलिए क्योंकि इसी दिन भारत के वीर सपूत चंद्रशेखर आजाद ने करोड़ों भारतीयों को अलविदा कह दिया था. गर्व इसलिए क्योंकि आजाद ने कहा था कि वह कभी किसी ब्रटिश के हाथों में नहीं आएंगे और ना ही उनकी गोली से मरेंगे. इस लिए उन्होंने अपनी पिस्तौल से खुद को गोली मार ली और शहीद हो गए. आज ही के दिन चंद्रशेखर आजाद की मौत इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क (चंद्रशेखर आजाद पार्क) में हो गई थी. आज हम इसी वीर सपूत के बारे में 10 ऐसी बातें बताने वाले हैं जिसे जानकर हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो जाएगा. Also Read - पहली पत्नी नीलम सिंह को याद कर भावुक हुए पवन सिंह, साड़ी-चूड़ियां दानकर मनाई पुण्यतिथि देखें तस्वीरें...

चंद्रशेखर आजाद के जीवन की 10 अहम बातें- Also Read - 18 अगस्त को मनाई गई नेताजी सुभाष चंद्र बोस की पुण्यतिथि, तो नाराज परिजनों ने पूछे ये सवाल

1- चंद्रशेखर आजाद का बचपन मध्यप्रदेश के गांव भाबरा में बीता. क्योंकि आजाद के पिता पंडित सीताराम तिवारी अकाल के समय में उत्तर प्रदेश के अपने पैतृक निवास स्थान को छोड़कर मध्य प्रदेश के अलीराजपुर रियासत में नौकरी करते थे. यहीं भाबरा नामक स्थान पर आजाद के पिता आकर बसे और आजाद का जन्म भी यहीं पर हुआ. Also Read - Chandra Shekhar Azad Birth Anniversary: चंद्रशेखर हमेशा रहे आजाद, जानिए महान क्रांतिकारी की अमरगाथा

2- भाबरा गांव एक आदिवासी इलाका है. चंद्रशेखर आझाद का बचपन यहीं बीता इसलिए आजाद बचपन में ही निशानेबाजी सीख गए थे.

3- गांधीजी के असहयोग आंदोलन के वक्त चंद्रशेखर आजाद को गिरफ्तार कर लिया गया था. इसके बाद कोर्ट में जज ने आजाद से जब उनका नाम पूछा तो उन्होंने कहा कि आजाद मेरा नाम है, पिता का नाम स्वतंत्रता और मेरा पता जेल है.

4- जब पंजाब के जलियावाला बाग में अंग्रेजों ने शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे भारतीयों का नरसंहार किया उस वक्त आजाद बनारस में पढ़ाई कर रहे थे. इसके बाद साल 1921 में महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए असहयोग आंदोलन में उन्होंने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था.

5- महात्मा गांधी द्वारा 1922 में असहयोग आंदोलन को खत्म कर दिया गया क्योंकि इसी समय गोरखपुर में चौरी-चारा कांड की घटना को अंजाम दिया गया था. इसमें 21 पुलिस कांस्टेबलों को पुलिस थाने के अंदर जिंदा जला दिया गया था. इस हिंसा से नाराज होकर गांधीजी ने असहयोग आंदोलन को खत्म करने का निर्णय लिया. इसी के बाद से आजाद की विचारधारा में बदलावा आया और वो क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़कर ‘हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ के सक्रिय सदस्य बन गए.

6- 9 अगस्त 1925 को चंद्रशेखर आजाद ने ही रामप्रसाद बिस्मिल और अन्य साथियों के साथ ब्रिटिश खजाने के लूटा था. काकोरी नामक स्थान पर चलती ट्रेन में ब्रिटिश खजाने को हथियार खरीदने के लिए लूटा गया था, ताकि हथियारों का इस्तेमाल आंदोलन में किया जा सके. इस लूट को काकोरी लूट के नाम से भी जाना जाता है.

7- काकोरी लूट की घटना ने ब्रिटिश सरकार को अंदर से हिलाकर रख दिया था. इस घटना के बाद से ब्रिटिश सरकार ने आजाद को पकड़ने व गिरफ्तार करने की मुहीम शुरु कर दी.

8- आजाद लाला लाजपत राय को बहुत पसंद करते थें. वह उनके समर्थकों में से एक थे. उनकी मृत्यु के बाद से ही आजाद ने सांडर्स को मारने की योजना बनाई. साडर्स की ही वजह से लाला लाजपत राय की मौत हुई थी. आजाद, भगत सिंह और राजगुरु लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए 17 दिसंबर 1928 को लाहौर पहुंचे. यहां उन्होंने शाम के वक्त पुलिस अधीक्षक दफ्तर के बाहर इकट्ठे हो गए. फिर जैसे सी सांडर्स अपने अंगरक्षकों के साथ निकला तो भगत सिंह और राजगुरु ने उसपर ताबड़तोड़ फायरिंग कर उसे मौत की नींद सुला दिया. इसके बाद सांडर्स के अंगरक्षक भगत सिंह और राजगुरु का पीछा करने लगे तब आजाद ने अंगरक्षकों को गोली मार दी.

9- सांडर्स की हत्या के एक दिन बाद ही आजाद के मित्र सुखदेव राज ने उन्हें इलाहाबाद स्थित अल्फ्रेड पार्क में बुलाया. इसी बीच पुलिस ने पार्क को चारों ओर से घेर कर फायरिंग शुरु कर दी. इस बीच आजाद और पुलिस दोनों के बीच फायरिंग हुई. जब आजाद के पास आखिरी गोली बची तो उन्होंने खुद को गोली मार ली. क्योंकि उन्होंने कसम खाई थी कि वो कभी भी जीवित अवस्था में पुलिस के हाथ नहीं आएंगे.

10- आजादी के बाद अल्फ्रेड पार्क का नाम बदलकर चंद्रशेखर आजाद पार्क कर दिया गया वहीं आजाद के गांव का नाम बदलकर आजदपुरा कर दिया गया.