नई दिल्ली. आज से चार दिवसीय छठ पूजा (Chhath Puja) शुरू हो रही है. परंपरा, सामाजिकता, अध्यात्म और लोक आस्था, छठ महापर्व के यही रूप हैं जो हम सदियों से देखते आए हैं. अपना देश पर्व-त्योहार प्रधान देश है. शायद ही ऐसा कोई महीना बीतता हो, जब कोई त्योहार न आए. यहां तक कि पूर्वजों के श्राद्ध के लिए भी यहां एक पखवाड़ा निर्धारित है. लेकिन छठ पूजा के पीछे सामाजिकता और लोक आस्था ही वे तत्व हैं, जिसके कारण इसे महापर्व की संज्ञा दी जाती है. वहीं, इस पूजा में किसी पुरोहित की आवश्कता न पड़ना, डूबते सूरज की आराधना जैसे भी कई कारण हैं, जिससे इस पूजा का महात्म्य और बढ़ जाता है. नहाय-खाय, खरना, संध्या अर्घ्य और सुबह के अर्घ्य के साथ समाप्त होने वाली इस पूजा में शुरू से अंत तक सिर्फ और सिर्फ लोक आस्था ही सर्वस्व होता है. दार्शनिक दृष्टिकोण से देखें या धार्मिक, दोनों ही रूपों में आपको छठ पूजा के दौरान लोकाचार की महत्ता समझ में आएगी. आइए जानते हैं ऐसी ही कुछ वजहें जिससे सूर्योपासना का यह पर्व, महापर्व में तब्दील हो जाता है.

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कर्मकांड की बाध्यता नहीं

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देश में मनाए जाने वाले अधिकतर पर्व-त्योहारों में पंडितों यानी ब्राह्मण या कह लें पुरोहित की आवश्कता पड़ती ही है. लेकिन छठ में नहीं. कहने को तो होली भी ऐसे किसी विधि-विधान से रिक्त त्योहार है, लेकिन छठ तो बाकायदा पूरे विधि-विधान के साथ किया जाता है, फिर भी इसमें ऐसा क्या है जो इसे महापर्व बनाता है. दरअसल, छठ पूजा के दौरान सामाजिक परंपराओं की महत्ता इतनी व्यापक है कि इसके काम-काज निर्धारित होते हुए भी किसी धार्मिक कर्मकांड की जरूरत नहीं रह जाती. नहाय-खाय यानी व्रती सभी तरह से शुद्ध होकर अनुष्ठान का संकल्प लेगा. खरना के दौरान घर में बने प्रसाद का ही भोग लगेगा. फिर संध्या अर्घ्य और प्रातःकालीन अर्घ्य तक किसी पुरोहित की जरूरत नहीं. बस भगवान सूर्य की आराधना करनी है. न कोई मंत्र है और न कोई विधान. सिर्फ आस्था रखिए और सूर्य की उपासना करिए. छठी मइया का आशीर्वाद प्राप्त होगा.

डूबते सूरज की आराधना

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‘उगते सूरज को सलाम’, यह कहावत शब्दकोश बनने जितनी ही पुरानी है. लेकिन छठ महापर्व के दौरान व्रती डूबते सूरज की भी आराधना करते हैं. कहने को इसके पीछे वैदिक काल की कहानियां भी हैं, जिसमें सूर्य के तेज से डरकर लोगों द्वारा उसकी पूजा की बातें कही गई हैं. लेकिन तार्किक दृष्टि से देखें तो इसमें वैज्ञानिकता स्पष्ट है कि सूर्य पृथ्वी पर रहने वालों को भले डूबते या उगते दिखता हो, यह अस्त तो नहीं ही होता है. छठ महापर्व मनाने वालों की नजर से देखें तो शाम के समय अस्त होता दिखने वाला सूर्य दरअसल अगली सुबह आने के लिए विदा लेता है. यहां आपको विश्राम के बाद फिर से काम पर जुट जाने के कौशल का बोध होगा.

बेटियों के लिए पर्व

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पुरुष-प्रधान समाज में बेटियों की आराधना के लिए किसी पर्व का निर्धारण भी अपने आप में अनोखा दृष्टिकोण है. इसके लिए हमें छठ पूजा की परंपरा शुरू करने वाले हमारे पूर्वजों का आभारी होना चाहिए, जिन्होंने स्त्री की अवहेलना वाली तमाम ‘करतूतों’ के बावजूद समाज में इस तरह के त्योहार की शुरुआत की. बिहार और उत्तर प्रदेश में मनाए जाने वाले इस त्योहार के दौरान हर जगह एक गीत गाया जाता है, ‘बायना बांटे ला बेटी मांगी ले, पढ़ल पंडित दामाद’. इस गाने के शब्दों पर ध्यान दीजिए. और किसी भी त्योहार में आपको व्रतियों या आराधकों द्वारा भगवान से बेटी मांगने का जिक्र नहीं मिलेगा, लेकिन छठ इस मामले में भी अनूठा है. समाज की ढेर सारी विसंगतियों के बीच छठ महापर्व जैसे पर्वों से हमारे सामाजिक मूल्यों के प्रति हमारी भावना का पता चलता है. गोवा की राज्यपाल मृदुला सिन्हा ने छठ पूजा में बेटी मांगने के रिवाज से संबंधित अपने एक लेख में कहा भी है, ‘धारणा है कि यदि किसी आंगन में बेटियों के फेरे नहीं पड़े तो वह आंगन कुंआरा ही रह जाता है.’ यही है लोक-व्रत की महत्ता और उसके प्रति लोगों की आस्था.

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बाजार नहीं होता हावी

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होली, दिवाली या दशहरा, बाजार में सेल या आजकल के ऑनलाइन सेल से तो आप वाकिफ होंगे ही. लेकिन छठ में बाजार पर निर्भरता न के बराबर है. व्रतियों द्वारा बनाए जाने वाले प्रसाद या सूर्योपासना के लिए अन्य जरूरी चीजें सब ग्रामीण परिवेश के अनुरूप ही हैं. बांस की टोकरी हो या आटे का ठेकुआ या फिर गन्ना और केला, आपको सबकुछ अपने आसपास ही मिल जाएगा. जी हां, गांवों में छठ पूजा करने वाले व्रती गेहूं के आटे के लिए किसी चक्की वाले के पास नहीं जाते, बल्कि जांते पर गेहूं पीसकर छठ के प्रसाद के लिए आटा निकालते हैं. वहीं केला या गन्ना आदि भी घरों के ही होते हैं. आजकल कुछ लोग जरूर पीतल या अन्य धातुओं की टोकरियों में छठ करने लगे हों, लेकिन इनकी संख्या अब भी नगण्य ही है.

सामाजिक चेतना का पर्व

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जो लोग छठ पूजा करते हैं, नदी या तालाब के घाट पर उनसे मांग कर प्रसाद खाने की परंपरा भी छठ को अनोखा बनाती है. गांवों में कहा भी जाता है कि छठ का प्रसाद मांगकर ही खाना चाहिए. यानी छठ का व्रत कोई भी करे, घाट पर आने वाला हर व्यक्ति आस्था से जुड़ा है. इसलिए व्रती भी प्रसाद मांगने वालों को खुशी से भगवान भुवन भास्कर पर चढ़ाया प्रसाद देते हैं. लेकिन इससे पहले छठ पूजा के शुरू होने के समय से ही देखें तो गली-मोहल्ले में अगर एक व्यक्ति के यहां भी छठ हो रहा हो, तो उसके आसपास के सभी लोग इस पूजा से अनायास ही जुड़ जाते हैं. घाटों पर मल्लाह या स्वयंसेवक अपने आप जुटते हैं, इसके लिए किसी तरह की विशिष्ट व्यवस्था नहीं करनी होती है. समाज के हर वर्ग के व्यक्ति के लिए छठ उसका अपना त्योहार होता है.

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