चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा दुनिया भर के प्रमुख अर्थशास्त्रियों, रणनीतिकारों, नीति निर्माताओं और विश्लेषकों के बीच बहस का एक बहुत विवादस्पद बिंदु है. हालांकि पाकिस्तान की सरकार और पाकिस्तानी सेना के भय से वहां मौजूद लोग इस परियोजना की पूरे दिल से प्रशंसा करते हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शायद ही कोई विश्लेषक ऐसा हो जो पाकिस्तान के लिए इसके लाभ बता सके. चीन ने अपना खेल बखूबी खेला है और चारों ओर से पाकिस्तान को इस तरह से घेर लिया है जिसमें पाकिस्तान का हारना पूरी तरह से तय है और दूर दूर तक कहीं भी उसकी जनता का भला नहीं होने वाला है. भला होगा तो सिर्फ चंद राजनेताओं, उनके पिछलग्गुओं और सेना के बड़े जनरलों का, जिन्होंने चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारे में अरबों रुपये कमाए हैं . प्रमुख आर्थिक जानकारों का मानना है कि इस परियोजना में केवल चीन ही है जो पाकिस्तान की कीमत पर स्वयं लाभान्वित होगा. पाकिस्तान धीरे-धीरे एक आर्थिक आत्महत्या की ओर बढ़ रहा है और हमारे पास इसे साबित करने के लिए निम्नलिखित कारण हैं-Also Read - Analysis: पैंगोंग त्सो पर चीन ने किया पुल का निर्माण, सैटेलाइट तस्वीरों में खुलासा; भारत के लिए क्या हैं इसके मायने?

1. पाकिस्तान की नकारात्मक आर्थिक वृद्धि- चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारे की समय सीमा का लगभग आधे से भी अधिक समय बीत चुका है और ये परियोजना पाकिस्तान के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में एक पैसे का भी योगदान नहीं कर पायी है. इसके वर्तमान हालत देखते हुए ऐसा लगता है कि अगले 3-5 वर्षों में भी ये कोई चमत्कार नहीं दिखा पायेगी. पाकिस्तान के ऊपर कर्ज़े का पहाड़ रोज़ाना लगभग चौदह अरब रुपये की दर से बढ़ता जा रहा है और इसमें सबसे बड़ा हिस्सा महंगे चीनी कर्ज़े का है. ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि 2022 के अंत तक इस कर्ज़े के बढ़ने की रफ़्तार 20 अरब रुपये और 2025 तक 35 अरब रुपये रोज़ाना हो जाएगी जबकि पाकिस्तान का सकल घरेलू उत्पाद लगातार घट रहा है. ब्याज की दर लगातार बढ़ रही है और कर्ज़े और ब्याज का भुगतान पूरी अर्थव्यवस्था को चौपट कर रहा है. Also Read - CPEC Project: संकट में सीपीईसी परियोजना, पिछले 3 साल के दौरान नहीं हुआ काम

एक और महत्वपूर्ण पक्ष है – इस आर्थिक गलियारे ने गरीब पाकिस्तानियों को कई लाख नौकरियों के सब्ज़बाग दिखाए और सरकार के प्रचार के कारण आम जनता को इससे बहुत ज्यादा उम्मीदें बंध गईं. जनता का कल्याण स्थायी सामाजिक विकास के लिए आवश्यक था, लेकिन यह पहलू बुरी तरह से विफल हुआ और आज तक एक भी नौकरी पैदा नहीं हो पायी. गरीब पाकिस्तानी केवल परियोजनाओं के निर्मांण के दौरान मज़दूरी करते नज़र आये और उनके चीनी मालिक मज़े से सारा पैसा चीन भेजने में व्यस्त रहे. बिजली परियोजनाएं इसका एक बड़ा उदाहरण है जहाँ पाकिस्तान सरकार महंगी दरों पर बिजली खरीदने को विवश है और चीनी व्यापारी आनंद में हैं. Also Read - म्यांमार में तख्तापलट- आखिर क्यों म्यांमार की सेना न्याय से ऊपर है

2. परियोजनाओं में देरी या उनकी लागत वृद्धि के लिए कोई जवाबदेही तय नहीं – पहले प्रारम्भ हुई बिजली परियोजनाओं को छोड़कर, चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारे की एक भी परियोजना समय पर पूरी नहीं हुई. आज हर परियोजना की लागत आश्चर्यजनक रूप से बढ़ चुकी है वह भी तब जब इनमें से अधिकतर परियोजनाएं शुरू भी नहीं हो पायी है. हैरानी की बात यह है कि पूरे पाकिस्तान या चीन में ऐसा कोई नहीं है जो इन देरी या लागत में बढ़ोतरी की जिम्मेदारी ले सके. आर्थिक गलियारे की हर परियोजना चाहे छोटी हो या बड़ी, के प्रशासक सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी होते हैं जिनसे जवाबदेही का साहस किसी में नहीं है. कुछ पत्रकारों और समाजसेवियों ने आवाज़ उठाई भी पर वो आवाज़ें आज कब्रों में दफ़न है.

भ्रष्टाचार, ख़राब प्लानिंग और बिना किसी तरह की पारदर्शिता के ये परियोजनाएं चल रही है जहाँ सेना के करीबी नेता, सरकारी अधिकारियों, सैन्य कमांडरों और कुछ चुने हुए व्यवसायी संगठनों का एक गंदा सिंडिकेट यूरोप, अमेरिका और मध्य पूर्व में संपत्ति खरीदने के लिए तेज़ी से धन की निकासी कर रहा है. यह इस परियोजना का सत्य है जिसे छिपाने के लिए पाकिस्तानी सेना ने अपने पिछलग्गू इमरान खान नियाज़ी को प्रधानमंत्री बनाया और देश के चुने हुए मूर्खों को उसके मंत्रिमंडल का सदस्य ताकि कोई भी उनके कामों पर सवाल न उठाये और बेचारी पाकिस्तानी जनता को हमेशा की तरह भारत विरोधी बयान देकर बेवकूफ बनाया जाता रहे.

3. पाकिस्तानी सम्पत्तियों का चीन को हस्तांतरण – पाकिस्तान चीन के कर्ज़े के चक्रव्यूह में बुरी तरह फंस चुका है और अब इस ऋण जाल के बुरे पहलू सामने आने लगे हैं. पाकिस्तान ने हाल ही में सिंध में स्थित दो द्वीपों – बुड्डो और बुंदल को चीन को सौंप दिया है, पूरा ग्वादर मुक्त व्यापार क्षेत्र पहले से ही चीन के हवाले कर दिया गया था . यही नहीं 2020 के मध्य में, पाकिस्तान ने अपने सैन्डक माइंस को चीन को कौड़ी के भाव पर मात्र 350 मिलियन अमरीकी डालर की कीमत पर दे दिया था और अब पाकिस्तान कुछ और संपत्तियों को चीन को सौंपने की तैयारी में है. यह किसी भी देश की संप्रभुता के लिए खतरनाक है और खासकर जब पाकिस्तान जैसापरमाणु हथियारों से लैस देश इसमें शामिल है, तो हालात और भी ज्यादा भयावह हो जाते है. यह न केवल पाकिस्तान या उसके पड़ोसियों के लिए बल्कि पूरी मानवता और दुनिया के लिए गंभीर चिंता का विषय है.

4. चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारे का सैन्य पहलू- पूरा विश्व भली भांति जानता है कि पाकिस्तान में जो कुछ भी होता है- वह उनकी सेना द्वारा संचालित होता है. बिना पाकिस्तानी सेना की मर्ज़ी के पूरे देश में पत्ता भी नहीं हिल सकता. वे 1947 में पाकिस्तान की स्थापना के समय से ही देश पर शासन कर रहे हैं और आगे भी ऐसा करते रहेंगे और हमें अगले कुछ दशकों में भी उम्मीद की किरण नहीं दिखाई देती . 2014 से जब श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने सत्ता संभाली, भारत न केवल आर्थिक और सैन्य दोनों मोर्चों पर तेज़ी से आगे बढ़ रहा है, बल्कि आक्रामक तेवर भी दिखा रहा है जो पाकिस्तान के सेना के लिए चिंता का विषय है .

दूसरी ओर, पाकिस्तान आतंकवाद संबंधित गतिविधियों में शामिल होने के कारण अमेरिका और अन्य अंतरराष्ट्रीय शक्तियों के प्रकोप का भी सामना कर रहा है जो पाकिस्तानी सैन्य कमांडरों के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है. पाकिस्तान को सैन्य साज़ो सामान की अत्यधिक आवश्यकता है और इस समय, चीन ही उसके पास मौजूद एकमात्र स्रोत है. चीन भी बड़ी तेज़ी से उसे हथियार और अन्य उपकरण बेच रहा है और उसके बदले पाकिस्तान के मुख्य हिस्सों को कब्ज़ा कर रहा है. अब चूंकि सैन्य समर्थन का प्रश्न है तो पाकिस्तान सरकार के वरिष्ठ अधिकारी, राजनेता और अन्य लोगों के पास चीन की आलोचना करने की हिम्मत नहीं है और एक प्रकार से पाकिस्तान का पूरा तंत्र चीनी धुनों पर नाचने को मजबूर है.

5. चीनी हाथों में औद्योगिक उत्पादन- जैसा कि हम देख पा रहे हैं कि चीन कर्ज़े के नाम पर धीरे-धीरे पाकिस्तानी उद्योगों का अधिग्रहण कर रहा है. पिछले 5 वर्षों में पाकिस्तान के औद्योगिक उत्पादन में नकारात्मक वृद्धि हुई है, और चीन को प्रमुख उद्योगों को सौंपना पाकिस्तान की विवशता बन गयी है. इसके कारण से पाकिस्तान के औद्योगिक उत्पादन पर चीन का नियंत्रण बढ़ता जा रहा है और पूरी अर्थव्यवस्था धीरे धीरे चीन की गुलाम बनती जा रही है. चीन इसका उपयोग कभी भी पाकिस्तान के लाभ के लिए नहीं करने वाला है और उसका एक मात्र उद्देश्य कम से कम समय में इससे अपने लिए अधिकतम लाभ प्राप्त करना ही होगा. यह पाकिस्तान की जैसे विकासशील देश कीअर्थव्यवस्था और सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर पर गंभीर प्रभाव डालेगा. यह एक आत्मघाती मिशन है. दिलचस्प बात यह है कि यह पाकिस्तान ही था जिसने पूरी दुनिया में आत्मघाती आतंकी अभियानों को प्रायोजित किया था और आज भी कर रहा है. यह देश आज खुद आर्थिक आत्महत्या की राह पर अग्रसर है.

6. विदेशी संबंधों पर नकारात्मक प्रभाव- पाकिस्तान पहले से ही खतरनाकआतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने के कारण दुनिया में अलग-थलग हो गया था और समूचे विश्व की आलोचना झेल रहा है . वहीं चीन अपनी आक्रामक विस्तारवादी नीतियों और कर्ज़े की कूटनीति के लिए जाना जाता है. उनकी इस जोड़ी ने पाकिस्तान के विदेशी संबंधों पर एक नकारात्मक प्रभाव पैदा किया है. पाकिस्तान जो आज तक इस्लामिक देशों के संगठन ओ आई सी का प्रमुख सदस्य था , आज उसी संस्था में विशेष रूप से सऊदी अरब और यूएई के आगे अपनी सारी प्रतिष्ठा मिटटी में मिला चुका है. इसी तरह, कई अन्य मुस्लिम देश हैं जो अब पाकिस्तान के साथ अच्छे सम्बन्ध नहीं रख पा रहे हैं और इसका एक बड़ा कारण चीन-पाकिस्तान की दोस्ती है.

पांच लेखों की पूरी श्रृंखला का ये आखिरी लेख है और अंत में अगर पूरी कहानी को संक्षेप में कहें तो, हमारे पास यह विश्वास करने के मजबूत कारण हैं कि पाकिस्तान आर्थिक आत्महत्या की ओर हमारे अनुमान से भी कहीं अधिक तेज़ी से बढ़ रहा है . आज ऐसे समय में, जब पाकिस्तान में भ्रष्टाचार और आतंकवाद का प्रयोजन चरम पर है, कोई बाहरी देश या एजेंसी इसके साथ खड़ा होने के लिए आगे आ रहा ह. जहाँ तक टर्की और चीन की बात है तो उनके अपने मंसूबे हैं जो अंततः पाकिस्तान की बर्बादी की ओर ही इशारा करते हैं . अगले 3-5 साल भारतीय उपमहाद्वीप के लिए महत्वपूर्ण होने जा रहे हैं और हम इस भूभाग का हिस्सा होने के नाते चीन के हाथों में पाकिस्तान के कुल पतन का गवाह बनने जा रहे हैं.

अमित बंसल रक्षा मामलों के जानकार हैं. अंतरराष्ट्रीय संबंधों और आंतरिक सुरक्षा से जुड़े विषयों पर उनकी गहरी रुचि है. वह लेखक, ब्लॉगर और कवि भी हैं.) इस आलेख में व्यक्त विचार लेखक की निजी राय है.