‘मुझे बचपन में आंधी-तूफान, तेज हवा से बहुत डर लगता था. इतना कि मैं अक्‍सर चीखने लगता. डर के मारे शरीर नीला पड़ने लगता. ऐसे में अगर पिता घर पर होते, तो मैं उनके पास चला जाता. वह मुझे अपने सीने से लगभग चिपका लेते. इतने स्‍नेह से गले लगाए रखते कि मानो स्‍नेह से गला घोंट देंगे! बच्‍चों को लाड़ की गोदी से तब तक मत उतारिए, जब तक वह खुद पांव पर चलने लायक न हो जाएं. क्‍योंकि जैसे ही वह बड़े होंगे, उनका भार आप नहीं उठा पाएंगे, उनके पास ही समय नहीं होगा.’ Also Read - मिसाल: 80 साल की उम्र में 'दादी अम्मा' ने पीएचडी की, देखें हौसलों की उड़ान...

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नागपुर से दिल्‍ली को लौटने वाली उड़ान में सुपरिचित लेखक, पत्रकार, वक्‍ता, चिंतक प्रभाष जोशी के लेखक, चिंतक बेटे सोपान जोशी ने यह बातें ‘डियर जिंदगी’ संवाद में कहीं. हम बहुत देर तक बच्‍चों की परवरिश, स्‍नेह और शिक्षा पर बात करते रहे. उसी संवाद का खूबसूरत हिस्‍सा मैंने आपसे ऊपर साझा किया. Also Read - 1400 अंग्रेजी मीडियम स्कूलों ने बंद की Online Classes, अभिभावकों के पास नहीं है फीस का पैसा

डियर जिंदगी : आंसू सुख की ओर ‘मुड़’ जाना है…

‘डियर जिंदगी’ के सफर में हमें सबसे अधिक चिंता जिन चीजों को लेकर देखने को मिलती है, उनमें पैरेंटिंग, रिश्‍ते, डिप्रेशन सबसे आगे हैं. ‘जीवन संवाद’ में माता-पिता जब भी मिलते हैं, अक्‍सर बच्‍चे को लेकर बात करते हैं, उसके व्‍यवहार को लेकर संवाद करना चाहते हैं. इनमें से अनेक लोगों के साथ अब संवाद वहां पहुंच गया है, जहां बातें विश्‍वास की रेखा पार कर रही हैं.

ऐसे अभिभावकों से मेरा कहना होता है- बच्‍चे की पढ़ाई, उसके स्‍कूल से कहीं अधिक चिंता इस बात को लेकर करनी होगी कि बच्‍चा स्‍कूल में कैसा महसूस कर रहा है. उसकी समझ कितनी नैसर्गिक है. उसे स्‍कूल में कितना अच्‍छा लगता है!

डियर जिंदगी : जीने की तमन्‍ना से प्‍यार करें, मरने के अरमान से नहीं…

हो सकता है बच्‍चे का प्रदर्शन ‘आपके’ लिहाज से अच्‍छा न हो, लेकिन आपका प्रदर्शन भी तो माता-पिता की अपेक्षा पर हमेशा खरा नहीं उतरा होगा. हो सकता है कि कुछ लोग इसके अपवाद हों, लेकिन अधिकांश की हकीकत तो यही है कि उनके माता-पिता उनसे कुछ और ही चाहते थे. वह उन्‍हें समझ नहीं पाए.

डियर जिंदगी : जब कोई बात बिगड़ जाए…

तो जो गलती हमारे साथ हुई, वही हम अपने बच्‍चों के साथ क्‍यों कर रहे हैं! जबकि हमें अपने अभिभावकों से जो स्‍नेह मिला उसका आधा भी हम अपने बच्‍चों को नहीं दे पा रहे हैं. क्‍योंकि हम पहले की अपेक्षा अधिक व्‍यस्‍त हो गए हैं. हमारा समय स्‍मार्ट टीवी, लैपटॉप और वर्चुअल डिस्‍कशन में जा रहा है.

डियर जिंदगी : ‘भीतर’ कितनी टीस बची है…

उसके बाद हम बच्‍चे को समझने, उसके साथ अधिक से अधिक समय बिताने, उसे स्‍नेह, प्रेम और आत्‍मीयता की बाल्‍टी में रोज स्‍नान कराने की जगह उसे ‘स्‍मार्ट’ बनाने में लगे रहे, तो वह भीतर से रूखा, सुस्‍त और एकाकी होता जाएगा. बच्‍चे को कोई फर्क नहीं पड़ता कि घर में कमाने वाले कितने लोग हैं. लेकिन उसे फर्क इससे पड़ता है कि उसका ख्‍याल कैसे रखा जा रहा है.

डियर जिंदगी : जिंदगी को निर्णय की ‘धूप’ में खिलने दीजिए

वर्किंग पैरेंटस जितनी आसानी से बच्‍चों को उसके लिए अधिक पैसे जुटाने के लिए ‘डे-केयर’ में छोड़ देते हैं, क्‍या बच्‍चे का मन उतनी आसानी से उन चीजों को स्‍वीकार करता होगा! हम बच्‍चे के लिए बहुत अधिक जुटाने के फेर में उसे बहुत अधिक अकेला छोड़ रहे हैं. उसके अंदर का अकेलापन उसे रूखा बना रहा है. भीतर से कठोर, जिद्दी बना रहा है.

डियर जिंदगी : अधूरे ख्‍वाबों की कहानी…

इसके उलट हो सकता है कि आपकी आय थोड़ी कम हो. आप उसकी सारी ख्‍वाहिशें पूरी न कर पाते हों, तो संभव है कि वह अपनी जिद के लिए कुछ दिन शिकायत करे, आपको परेशान करे. लेकिन उसे अगर स्‍नेह, प्‍यार पूरा नहीं मिला, तो वह जिंदगी भर शिकायत करेगा. अब दो शिकायतों के बीच चुनाव आपको करना है. क्‍योंकि बच्‍चा आपका है. इस पर सावधानी से फैसला आपको ही करना होगा…

 

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