‘डियर ज़िंदगी ‘और ‘जीवन -संवाद’ ऐसे अवसर प्रदान करते हैं, जहां संवाद से संकोच और दुविधा के पट धीरे धीरे बंद हो जाते हैं. जीवन ऐसे आंगन की ओर खुल जाता है, जहां एक ऐसा द्वार हमारी प्रतीक्षा में हमेशा से था, लेकिन हमें पहले दिखता ही नहीं था. वह अंकल हमारे अपार्टमेंट में ही रहते हैं. एक दिन यूं ही टहलते हुए मुलाकात हुई. उन्होंने बताया उनके पिता लखनऊ हाईकोर्ट में जज थे. वह लखनऊ हाईकोर्ट में वकील रह चुके हैं. लखनऊ में उनके पास अच्छी खासी संपत्ति है. एक ही बेटा है, जो नोएडा में आईटी इंजीनियर है, बहू भी इसी पेशे में है. बेटा- बहू नोएडा में रहना चाहते हैं. क्योंकि कैरियर यहीं है. इसलिए वह और उनकी पत्नी नोएडा रहने चले आए. Also Read - ड्रग चैट में दीपिका का नाम आने पर कंगना ने किया कटाक्ष बोलीं- हाई सोसायटी के बच्चे पूछते हैं- माल है क्या?

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डियर जिंदगी : माता-पिता के आंसुओं के बीच ‘सुख की कथा’ नहीं सुनी जा सकती… Also Read - सुशांत सिंह राजपूत के पूर्व असिस्‍टेंट ने कहा, अगर सर ड्रग्स लेते तो मुझे पता होता

उम्र यही कोई साठ के आस-पास. पति पत्नी दोनों खुशमिजाज, सेहतमंद हैं. लेकिन वह मुझे कुछ परेशान लग रहे थे. संवाद शुरू हुआ तो मन की परतों को पार करता हुआ वह ऐसे एकांत मोड़ पर जाकर खत्म हुआ, जिसे सुनने समझने और महसूस करने के लिए बहुत तो नहीं पर थोड़ी संवेदनशीलता की जरूरत होती है.

डियर जिंदगी : साथ रहते हुए स्‍वतंत्र होना!

हम कैसे मान लेते हैं कि माता-पिता का पूरा जीवन केवल बच्चों के समीप ही बुना होना चाहिए. माता पिता का अपना कोई सुख, अपनी कोई दुनिया हमारी समझ से भी कोसों दूर लगती है. लखनऊ में वह मजे से रह रहे थे, लेकिन उनको और उनकी पत्नी को समझाया गया अकेले रहना ठीक नहीं. अच्छा वाला मकान था जो उनकी यादों और सुख दुख का ‘ताजमहल’ था, उसे ‘ इमोशनल अत्याचार’ के तहत बिकवा दिया गया. सुरक्षा, बच्चों का साथ और उनके कैरियर का ऐसा जाल बुना गया, जिसमें एक ही बात समझ में आई कि बच्चे तो बार-बार आ जा नहीं सकते, इसलिए आप ही उनके पास जा कर रहें.

डियर जिंदगी : ‘आईना, मुझसे मेरी पहली सी सूरत मांगे…’

यह हमारे समाज और समय की एक ऐसी’ उलटबांसी’ है, जिसमें बुजुर्गों की पूरी दुनिया उलट-पुलट होती जा रही हैं. हम उनको, उनकी चेतना को केवल और केवल खुद से जुड़े बैठे हैं. उनकी पसंद, चित्त के आनंद और मन के रमने को हम लगभग भूलते जा रहे हैं. यार कुछ कुछ ऐसा है कि आप जंगल से अपने प्रिय परिंदों को इसलिए अपने आलीशान, भव्य लेकिन नकली ‘पार्क’ में रखना चाहते हैं, जिससे जंगल का सारा मनोरम आपके पास रहे. आपकी सुविधा, चाहत के अनुसार रहे.

अपेक्षा का कैक्टस और स्नेह का जंगल

बड़ों की पूरी दुनिया अपने गांव से ही नहीं, छोटे शहरों से सिमटते, कटते हुए केवल माचिस की तीलियों जैसे, मुर्गी के दड़बों कैसे घरों मैं कैद होती जा रही है. हम माता पिता, बड़े बुजुर्गों के स्वादानुसार नमक की जगह अपना स्वाद उन पर थोप है. दुनिया भर में वे शोध बताते हैं कि विस्थापन चाहे जिस वजह से हो वह हमारे चेतन और अवचेतन मन पर हानिकारक असर डालता है. सवाल और चिंता इस बात पर नहीं होनी चाहिए किसी के लिए क्या अच्छा है बल्कि यहां भी किसी कोने में रहना चाहिए कि उसका ‘सुख ‘कहां है.

हम अपने सुख की चादर बड़ी करने के फेर में अपनों की ही चादर काटते और उधेडते चले जाते हैं. इससे उनके मन के भीतर कुछ ऐसा मैल, तू की परत जमती चली जाती जाती है, जो कभी गहरी उदासी, अकेलेपन तू कभी तनाव और डिप्रेशन के रूप में सामने आती है. इसलिए, अपना सुख तो सुनिए लेकिन किस कीमत पर या चुना जा रहा है इसके प्रति जरूर सजग रहें.

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