सपने देखना सहज, सरल, सरस आदत है. बचपन से ही हमें सिखाया जाता है कि तय करो क्‍या बनाना है. इधर कुछ बरस में तो अजब-गजब स्‍कूल खुल गए हैं. जो बच्‍चे के जन्‍म से पहले, जन्‍म के तुरंत बाद और नर्सरी में पहुंचने से पहले ही उसके ‘गुणों’ की खोज में जुट गए हैं. यह सब इसलिए हो रहा है, क्‍योंकि हम अपने बच्‍चों के बहाने अपने ख्‍वाब को चांद पर ले जाने की आरजू रखते हैं! Also Read - युवा खिलाड़ियों के लिए घातक साबित हो सकता है ये ब्रेक : पैडी अपटन

डियर जिंदगी : माता-पिता के आंसुओं के बीच ‘सुख की कथा’ नहीं सुनी जा सकती… Also Read - मीका सिंह की मैनेजर की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत, पुलिस ने दी ये थ्योरी

बच्‍चे से अधिक तनाव में माता-पिता हैं, क्‍योंकि उन्‍हें एक ही चिंता है कि कहीं उनका बच्‍चा पिछड़ न जाए. वह कहीं पीछे न रह जाए, उस दौड़ में जहां से अनगिनत बच्‍चों से मुकाबला करना है. सुपरिचित डॉक्‍टर मित्र ने बताया कि इन दिनों महिलाओं में चिंता, तनाव और चिड़चिड़ेपन का बच्‍चों के रिपोर्ट कार्ड से गहरा संबंध है. यहां तक कि अनिद्रा, चिंता मिलकर थाईराइड बढ़ाने का काम कर रही हैं. Also Read - भारतीय टीम से भुला दिए जाने के बाद जान देना चाहता था ये पूर्व भारतीय तेज गेंदबाज

इस समय समाज में पहले से कहीं अधिक दूसरे सपने का संकट गहराया हुआ है. ‘डियर जिंदगी’ में हम निरंतर स्‍कूल की शिक्षा, संस्‍कार, रवैए पर सवाल करते रहे हैं. स्‍कूल सपनों की फैक्‍ट्री बन गए हैं, जहां से टॉपर्स, होनहार बच्‍चे पैदा करने का दावा कुछ इस अदा से किया जाता है कि हम उनके मायाजाल में सहज उलझते जाते हैं. स्‍कूल चार साल से बच्‍चे के दिमाग पर अपनी सोच थोपने का काम कुछ इस चतुराई से करने लगते हैं कि अच्‍छे, भले, समझदार अभिभावक इसकी चपेट में आने से नहीं बच सकते.वह बहुत जल्‍द बच्‍चे के खराब होते भविष्‍य के भंवर में डूबने-उतरने लगते हैं. वह भूल जाते हैं कि ‘चीजों’ को बड़ा होने में वक्‍त लगता है.

डियर जिंदगी : साथ रहते हुए स्‍वतंत्र होना!

यह लेख मुंबई से लिखा जा रहा है. सोमवार की शाम मुझे उस शिवाजी पार्क में ‘नेट़स’, मैदान में कुछ वक्‍त बिताने का समय मिला. यहां सैकड़ों बच्‍चों के बीच कभी ‘भारत रत्‍न’ सचिन तेंदुलकर ने अपने अथक ‘रियाज’ से न जाने कितनी सुबह, दोपहर और शाम को लुभाया था. हम भारतीय क्रिकेट का अलाप तो करते रहते हैं, लेकिन खेल से जिंदगी में कुछ सीखते नहीं. खेल को निखरने, संवरने में जो धैर्य, निष्‍ठा चाहिए. उसका दस प्रतिशत भी जीवन में उतर आए तो यह सपनों के तूफान हमें डरा नहीं सकते.

डियर जिंदगी : ‘आईना, मुझसे मेरी पहली सी सूरत मांगे…’

चिंता क्‍या होती है, उस नाविक से पूछिए, जिसकी नौका तूफान में फंसी होती है. वह चिंतिंत होने की जगह प्रयास में जुटा रहा है, जो वह कर सकता है, करता है. शेष वह नियति पर छोड़ देता है. दूसरी ओर शहरी, मध्‍यमवर्गीय, नौकरीपेशा समाज ‘बच्‍चों के बहाने’ अपने सपनों को लेकर इतना कुंठित होता जा रहा है कि वह अपने साथ, उनके जीवन पर भी अनजाने में ‘ग्रहण’ लगा रहा है.

अपेक्षा का कैक्टस और स्नेह का जंगल

सपनों के पीछे अगर समझ की सही आंच नहीं होगी तो वह बिखर जांएगे. उनका बिखरने के बीच खुद को संभालना बहुत मुश्किल होता है. इसलिए जितना संभव हो सपने बुनते समय खुद को अधिक से सहज, यर्थाथवादी, ठोस बनाया जाए. इसके साथ सपने को सही आंच पर चढ़ाया जाए. इससे जीवन का स्‍वाद बना रहेगा!

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