जिंदगी में हम अक्‍सर एकतरफा सोचते रहते हैं, क्‍योंकि हमें दूसरे पक्ष के बारे में बहुत ही कम पता होता है. इसकी एक वजह यह भी है कि शहर में बसे लोग अपनी उलझनों में इतने व्‍यस्‍त हैं कि उन्‍हें दूसरे के बारे में सोचने का समय ही नहीं. उनके पास दूसरे को समझने का समय, स्‍नेह और आत्‍मीयता तीनों की कमी है. Also Read - Angrezi Medium Trailer: सपनों की कहानी है इरफान खान की फिल्म अंग्रेजी मीडियम, हंसाती भी है रूलाती भी है

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‘डियर जिंदगी’ के लिए इससे बड़ी बात कुछ नहीं हो सकती कि लोग इसे एक ऐसे स्‍पर्श का नाम दे रहे हैं, जिससे मन में थोड़े स्‍नेह, आशा और प्रेम की मात्रा बढ़ रही है. इनकी कमी ही तो हमारे मन को दुख, अवसाद और कठोरता की ओर धकेल देती है. Also Read - डियर जिंदगी: सबको बदलने की जिद!

 ‘पहले हम पापा के साथ रहते थे, अब पापा हमारे साथ रहते हैं…’

मैं अपने काम के सिलसिले में अक्‍सर मुंबई, अहमदाबाद, जयपुर, कोलकाता जाता रहता हूं. इस सूची में अनेक छोटे-बड़े शहर और भी हैं. यह यात्राएं ‘डियर जिंदगी’ के पहले से हो रही थीं, लेकिन ‘डियर जिंदगी’ के सफर ने जीवंत संवाद का जो अवसर, रस दिया है, इसके बारे में कभी मैंने शायद ही सोचा हो.

आप अपने अनुभव साझा करने के साथ, मन की उन गांठों को खोलने में लगे हैं, जो बिना वजह दिमाग की ‘झूठी-मूठी’ ऐंठन से बन गई थीं. हम जानते ही हैं कि जैसे शरीर में गांठ उसे कैंसर की ओर धकेलती है, वैसे ही मन की गांठ जीवन के रस, स्‍नेह और आत्‍मीयता को सोखकर हमें सूखा, नीरस और दुखी बना देती हैं.

सुबह-सुबह जब मैं लिखने की तैयारी में था, तभी व्हाट्सएप पर एक संदेश मिला, जिसमें राजस्‍थान के कोटा से लेखा तिवाड़ी ने अपने बारे में कुछ बेहद मर्मस्‍पर्शी बातें लिख भेजी हैं. यह कहते हुए कि वह ‘डियर जिंदगी’ से जुड़ी हैं, लेकिन इसकी बातें अक्‍सर उनके दिमाग में आकर अटकी जाती थीं. वह मन, आत्‍मा और आचरण तक नहीं जा रही थीं, लेकिन एक महीने पहले हुए एक अनुभव ने ‘दीवार’ गिरा दी.

अब वह जीवन को पूर्वाग्रह से मुक्‍त रख सकती हैं. उनके मन में स्‍नेह का जो अनूठा स्‍पर्श हासिल हुआ, वह कुछ इस तरह का है…

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लेखा के पति बिजनेसमैन हैं. वह अक्‍सर काम के सिलसिले में बाहर रहते हैं. घर पर हमेशा लेखा की मदद के लिए घरेलू सहायक हैं. ड्राइवर से लेकर हर सुविधा है. एक दिन कुछ ऐसा संयोग हुआ कि ड्राइवर को आने में देरी हो गई. बिटिया की बस छूट गई. तो उनका मन किया कि आज स्‍कूटी से उसे स्‍कूल छोड़ आएं, जो कि घर से मुश्किल से पांच किलोमीटर की दूरी पर है.

बस फिर क्‍या था. उन्‍होंने फटाक से स्‍कूटी उठाई और बेटी को लेकर निकल गईं. मोबाइल रखने का भी ख्‍याल नहीं आया. लौटते समय स्‍पीड ब्रेकर पर गाड़ी का संतुलन बिगड़ गया. हेलमेट होने के बाद भी उनको कुछ चोट लग ही गई. चक्‍कर से आने लगे.

इससे पहले की वह बेहोश होतीं एक परिचित आवाज सुनाई दी. वह माया की थी. माया जो उनके यहां खाना बनाने का काम करती है, उसने उनको सहारा दिया. इसके पहले कि वह कुछ समझ पातीं, माया ने ऑटो रोका और उनको स्‍कूल के एकदम पास में अपने एक कमरे के घर में ले आई.

तुरंत पड़ोस के बच्‍चे से बोलकर पास में प्रैक्टिस करने वाले डॉक्‍टर को बुलाया गया. उसने तुरंत चोट पर मरहम-पट्टी की. उसने थोड़ी देर आराम करने को कहा तो अपने बिस्‍तर पर लिटाने से पहले माया ने बक्‍से से एक नई चादर पलंग पर बिछाई. पास ही माया का पांच बरस का बेटा था, जो थोड़ा लंगड़ाकर चल रहा था, लेकिन मां की भरपूर मदद कर रहा था. तुरंत लेखा को गर्मा-गरम दूध-हल्‍दी के साथ टिटनेस का इंजेक्‍शन, दवाई दे दी गई.

इस दौरान माया ने जिस तरह उसकी चोट की सफाई की. सहजता से उसकी देखभाल की, माया को कुछ ऐसा याद आया, जिससे उनकी आंखें डबडबा गईं.

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हुआ यह था कि कोई छह महीने पहले माया अपने उसी बच्‍चे को जिसे चलने में असुविधा हो रही थी, एक दिन अपने साथ उसके घर ले आई थी. उसे घर के नीचे खेलने के लिए छोड़ दिया गया. वहां वह झूले से ऐसे गिरा कि उसके पांव में गहरी चोट लगी. किसी ने उसे लेखा के घर तक छोड़ा.

लेखा के घर कुछ मेहमान आए थे. वह माया के साथ उनके स्‍वागत में व्‍यस्‍त थीं. जैसे ही माया ने बेटे को देखा वह बेहाल हो उठी. उसने उसे उठाकर सोफे पर बैठा दिया. उसके लिए डिटॉल, दवाई की मांग की. लेखा ने उसे जरूरी चीजें दीं, लेकिन उसकी चिंता बस वहीं तक रही.

और तो और लेखा की मां ने माया को इस बात के लिए डांट दिया कि उसने अपने बेटे को उस सोफे पर बैठा दिया, जिसका नया कवर वह सिंगापुर से लाई थीं. वह खराब हो गया, लेकिन लेखा मां से कुछ न कह पाई.

माया ने बच्‍चे को तुरंत सोफे से उठाया, घर के एक कोने में बैठाया. अपना काम खत्‍म किया और बिना कुछ कहे चले गई.

हां, उसके बाद माया ने बच्‍चे के लिए कुछ पांच हजार एडवांस मांगे तो उनके दिमाग ने ‘नई’ कामवाली बाई के नाम पर देने से रोक दिया.

लेखा की आंखों में बहते आंसू देख माया घबरा गई. उसने ‘दीदी’ कहकर कुछ कहना चाहा, लेकिन तभी याद आया कि लेखा ने दीदी नहीं मैडम कहने को कहा है. माया ने तुरंत बात संभलते हुए कहा, ‘मैडम, आप एकदम ठीक हो, थोड़ी देर में आपको घर छोड़ आएंगे.’

लेखा ने आगे लिखा है, ‘उस घटना के बाद मैंने माया को उसके बच्‍चे के इलाज में मदद की. डॉक्‍टर के पास खुद लेकर गई, लेकिन उससे भी जरूरी और सबसे जरूरी यह बात समझ में आई कि हम अनजाने में स्‍वयं को कितना कठोर, अनुदार और निर्मम बना बैठे हैं. कैसी-कैसी गांठे मन में तैर रही हैं. हमें उनके लिए जो हम पर निर्भर हैं, कहीं अधिक उदार होने की जरूरत है. जो सबल हैं, उनके प्रति स्‍नेह तो सहज, स्‍वाभाविक है.’

चलिए, लेखा जी की बात अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाएं…

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