बात जरा पुरानी है. जयपुर लिटरेचर फेस्‍टिवल में सुपरिचित लेखक ओमप्रकाश वाल्‍मिकि से संवाद का अवसर मिला. ओमप्रकाश जी सामाजिक अस्‍पृश्‍यता, छुआछूत के अधिकतम भेदभाव के बीच पले-बढ़े थे. एक फेलोशिप पर काम करते हुए, चिट्ठियां लिखते हुए मैं उनके संपर्क में आया. उनकी आत्‍मकथा ‘जूठन’ हर किसी को पढ़नी चाहिए. उनकी कही कुछ बातें अचानक ‘डियर जिंदगी’ में आज की पोस्‍ट लिखते हुए याद आ गईं. क्‍योंकि उनका दुख से गहरा साक्षात्‍कार था. जीवन के इतने विविध रंग उन्‍होंने देखे थे, जो हम जैसे सामान्‍य लोगों की कल्‍पना से बाहर हैं.

डियर जिंदगी : ‘मन’ की ओर से इतनी बेरुखी क्‍यों…

मैंने पूछा था, इतने दुखों का सामना कैसे किया. कैसे इतना बहिष्‍कार, पीड़ा, हिंसा सहने के बाद भी आपका मन, स्‍नेह से भरा है. उसमें किसी के प्रति दुत्‍कार नहीं. उन्‍होंने कहा था, ‘साथ छूट जाने का अर्थ हमेशा सब छूट जाना नहीं होता. सबकुछ छूट जाने के बाद भी काफी कुछ बचा होता है. जो बचा होता है, उससे प्रेम करना चाहिए. इससे जिंदगी आसानी से कट जाती है.’

मुझे उनकी बातें मुलाकात के आठ साल बाद इसलिए भी याद हैं, क्‍योंकि उसी दौरान हमारे एक मित्र अपने जीवन में किसी का साथ छूटने से एकदम फिल्‍मी अंदाज में व्‍यवहार कर रहे थे. जिसमें दूसरों के लिए कुछ नहीं था, बस दूसरों की दी आजादी का बेजा इस्‍तेमाल था. वह उस समय घर-परिवार और नौकरी के साथ ऐसे व्‍यवहार कर रहे थे, मानो दूसरे ही इस रिश्‍ते की टूटन के लिए जिम्‍मेदार हों.

डियर जिंदगी: कहां है सुख और सुखी कौन!

यह औसतन भारतीय व्‍यवहार की कहानी है. हम प्रेम, संबंध,लरिश्‍तों में शायद ही कभी सहज रहते हों. हमें हर चीज में अति पसंद है. जबकि यह बचपन से सुनते हैं, ‘अति सर्वत्र वर्जयते.’ कितनी मजेदार बात है कि बचपन में समझी बातें ‘बड़े’ होते ही आसानी से भुला देते हैं, तब जबकि उनकी सबसे ज्‍यादा जरूरत होती है.

ओमप्रकाश जी ने कितनी पते की बात कही थी. कटु अनुभवों और दूसरों के अपमान से भरा जीवन जीने वाला कैसे अपने ‘जीवन दर्शन’ से चीजों को सरल बना लेता है.आज इसी ‘जीवन दर्शन’ की हम सबको जरूरत है. खासतौर पर उन सबको, ऐसे लोगों को जो उम्र, रिश्‍तों के किसी खास मोड़ पर किसी का साथ छूट जाने से इतने दुखी, व्‍याकुल और उदास हो जाते हैं कि जिंदगी का मूल्‍य उसके सदके कर देते हैं.

डियर जिंदगी : बच्‍चों को कितना स्‍नेह चाहिए!

‘डियर जिंदगी’ के बहुत से पाठक इन दिनों कह रहे हैं कि दुख पर पढ़ना, लिखना बात करना तो ठीक है, लेकिन उसका सामना करना बहुत मुश्किल. यह पोस्‍ट इस बात को समझने की कोशिश है. जिंदगी में सबकुछ संभव है, बस स्‍वयं के प्रति आस्‍था और अपने होने का अर्थ स्‍पष्‍ट हो.

जब आपका हाथ, साथ कोई ऐसा व्‍यक्ति छोड़ दे, जिसके बारे में आपने कल्‍पना भी न की हो, तो यह बातें आपकी मदद कर सकती हैं…

प्रकृति में अटूट विश्‍वास: आप चाहें तो इसे सरलता के लिए ‘ईश्‍वर’ से बदल सकते हैं. इसके मायने यह हैं कि आप स्‍वयं में भरोसा करते हैं. क्‍योंकि आप दुनिया के सृजन में अपनी हिस्‍सेदारी पर यकीन करते हैं और अपनी भूमिका पर भी.

डियर जिंदगी : आंसू सुख की ओर ‘मुड़’ जाना है…

आपका समय: जिंदगी दूसरे के भरोसे नहीं, ‘अपने पांव में बेबाई फूटने’ पर समझ में आती है. किसी का साथ छोड़ देने का अर्थ हुआ कि जो कंफर्ट उसके साथ था, अब खत्‍म! तो आपके संघर्ष का समय शुरू. जिंदगी में हम जो भी बनते हैं, वह दूसरों के पीछे जाने से नहीं, अपना रास्‍ता बनाने से बनते हैं. इसलिए साथ छूटना एक वरदान भी है, बशर्ते आप उसे प्रकृति के नजरिए से समझें. वह मेरा साथ छोड़ गया\गई. युवाओं की जिंदगी का बहुत सारा समय इसी स्‍यापे में खूबसूरत होने की जगह ग्रहण का शिकार हो रहा है.

डियर जिंदगी : जीने की तमन्‍ना से प्‍यार करें, मरने के अरमान से नहीं…

एक रिश्‍ते में उलझे हुए पांच-पांच बरस हो जाते हैं, लेकिन एक-दूसरे पर भरोसा नहीं. और जब किसी ने फैसला कर लिया तो जिंदगी को हम चंदग्रहण की तरह ट्रीट करने लगते हैं. यह तो अपने ही प्रति अन्‍याय है. ‘जो तुम्‍हारे साथ नहीं है, वह तुम्‍हारे योग्‍य नहीं था.’ यह फिलॅासफी बड़े काम की है.

सवाल यह नहीं कि तुम किसी के साथ कितने बरस से हो और वह तुम्हें छोड़ गया, असली बात यह है कि आगे एक लंबा जीवन प्रतीक्षा में है. वह कहीं बेहतर साथी खोजने के लिए पर्याप्‍त है. बदलिए.

अगर आप आज भी वैसे सोचते, समझते हैं, जैसे दस बरस पहले थे. तो यकीन मानिए आपके रिश्‍ते संकट में हैं. लोग आपको छोड़ ही जाएंगे! क्‍योंकि दुनिया कहां से कहां पहुंच गई और आप वहीं खड़े रह गए. इसलिए जिसने आपको छोड़कर नींद से जगाया, वह अनजाने में भला कर गया.

इसलिए, छोड़ जाने वालों के प्रति उदार, कृतज्ञ रहिए. उस उजाले की ओर देखिए, जो आंचल में रोशनी लिए आपकी प्रतीक्षा कर रहा है.

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(लेखक ज़ी न्यूज़ के डिजिटल एडिटर हैं)

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