बात कुछ अटपटी लग सकती है! दूरी ‘अपने’ मन से. यह भला कैसी दूरी हुई. रहते तो हम हमेशा अपने मन के पास ही हैं. ऐसे में हम मन से दूर कैसे हुए? हमने यह तो पढ़ा, लिखा और सुना है कि मन चंचल है. मन पागल है. मन मनमौजी है लेकिन हमारा मन हमसे दूर हो गया! भला यह क्‍या बात हुई. Also Read - डियर जिंदगी: सबको बदलने की जिद!

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यह बात कुछ ऐसे है कि बचपन का कोई दोस्‍त रहता एक एकदम पड़ोस में है. लेकिन उसका और आपका मिलने का मन होने के बाद भी ‘टाइम’ निकालना मुश्किल हो गया है. चाहते तो हैं, लेकिन चाहने और मिलने के बीच समय की दीवार आ जाती है. परिवार, बच्‍चे और ऑफि‍स आ जाता है. Also Read - डियर जिंदगी: कड़वे पल को संभालना!

कुछ यही मामला ‘अपने’ मन से मिलने का है. हमारी जिंदगी कतरा-कतरा उन चीजों में खर्च होती जा रही है, जो हमारे एजेंडे से बाहर हैं. यह बात कुछ ऐसी हुई कि हमने किसी को खाने पर बुलाया, लेकिन हमारा सारा ध्‍यान तो घर की सफाई, साज-सज्‍जा में लगा रहा. हम घर को सजाने में इतने मशगूल हो गए कि खाने में नमक के अलावा किसी चीज का स्‍वाद ही नहीं रहा.

हम अपने मन के साथ भी कुछ ऐसा ही कर रहे हैं. हम दूसरों के लिए समय निकाल रहे हैं. दूसरों से खूब संवाद कर रहे हैं. मोहल्‍ले, पड़ोस के हम ‘नेता’ हैं और सोशल मीडिया के ‘हीरो’.

दोस्‍तों की कोई पोस्‍ट हमसे शायद ही छूटती हो. हमारी पोस्‍ट पर लाइक भी हजार तो हो ही जाते हैं.

लेकिन हम खुद से कब मिलते हैं, इसका कोई हिसाब नहीं. आखिरी बार आपने ‘अपने’ लिए कैलेंडर में कब तारीख ब्‍लॉक की थी. याद है!

इन दिनों हमें सबकुछ याद रहता है, सिवाए स्‍वयं से संवाद के. अपने लिए समय न निकाल पाने के कारण अनेक हो सकते हैं, लेकिन इसके परिणाम एक जैसे होते हैं.

जो अपने लिए समय नहीं निकाल पाते, अक्‍सर उनके स्‍वभाव में नीरसता के साथ बनावट आ जाती है. हम कई बार दूसरों को खुश करने के चक्‍कर में इतने मशरूफ हो जाते हैं कि अपने बारे में सोचने का समय तक दूसरों के यहां गिरवी रख देते हैं.

कभी बॉस के यहां. तो कभी उन संबंधों के यहां जिन पर हम कुर्बान होते हैं. लेकिन यहां सबसे बड़ी चीज जो मिसिंग है, वह हम हैं! हम खुद से कब बात करते हैं. खुद को आईने में देखना, संवरना, स्‍वयं पर मुग्‍ध होना, आत्‍मप्रशंसा में डूबे रहना, ये सब खुद से संवाद करने की श्रेणी में नहीं आते.

जो अपने मन के पास रहते हैं, वह किसी दूसरे के पास तो हो सकते हैं, लेकिन वह अपने मन को कहीं गिरवी नहीं रखते. वह बहुत दिन तक मन को मारकर नहीं रह सकते.

इसलिए, ऐसे लोग स्‍वयं के निकट रहते हैं. उन्‍हें प्रसन्‍न रहने के लिए दूसरे की जरूरत नहीं होती. वह निरंतर अपने मन के संपर्क में रहते हैं. खुद से बात करते हैं. खुद को हौसला देते हैं. दुनिया की निराशा, नकारात्‍मकता से लोहा लेने का हुनर ऐसे ही विकसित होता है.

जो अपने मन के पास होते हैं. अपने निर्णय स्‍वयं लेते हैं. वह दूसरों के लिए सुख का निर्माण कर सकते हैं, दूसरों के दुख में शामिल हो सकते हैं. लेकिन कोई दूसरा, बाहरी उन्‍हें उनकी अनुमति के बिना दुखी नहीं कर सकता!

अब आप फैसला कीजिए कि आप अपने मन के कितने पास हैं…

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