‘डियर जिंदगी’ को हर दिन संदेश, सुझाव, प्रतिक्रिया मिल रही है. लिखने के लिए पाठक की ओर से सुझाव नियमित रूप से मिलते रहें, तो इससे बढ़कर दूसरी बात नहीं हो सकती. ऐसा ही एक किस्‍सा हमें मध्‍यप्रदेश के सिंगरौली से सुधीर रंजन त्रिपाठी ने भेजा है. उनका आभार व्‍यक्‍त करते हुए हम इसे आज के संवाद में शामिल कर रहे हैं. आशा है, इसके सूत्र आपको जिंदगी के अर्थ तलाशने में मददगार होंगे.

ऑस्ट्रेलिया की ब्रोनी वेयर बरसों तक ऐसे काम की तलाश में रहीं, जिससे जिंदगी को दिशा मिल सके. उन्‍हें अपने लिए ऐसी नौकरी तलाशने में इसलिए मुश्किल आ रही थी क्‍योंकि उनके पास कोई ट्रेनिंग, योग्‍यता, अनुभव नहीं था. इसी बीच उन्होंने एक हॉस्पिटल की ‘पैलिएटिव केयर यूनिट’ में काम करना शुरू किया. इस यूनिट में ‘टर्मिनली इल’ या अंतिम चरण वाले मरीज को ही भर्ती किया जाता है. उसमें मृत्यु से जूझ रहे लाइलाज बीमारियों, असहनीय दर्द से पीड़ित मरीजों की दवा धीरे-धीरे कम की जाती है. काउंसलिंग के माध्यम से उनकी आध्‍यात्‍मिक, ‘फेथ’ हीलिंग की जाती है, जिससे वह शांतिपूर्ण मृत्यु की ओर बढ़ सकें.

डियर जिंदगी : जिन्‍हें अब तक माफ न कर पाए हों…

ब्रोनी वेयर ने ब्रिटेन, मिडिल ईस्ट में कई बरस तक मरीजों की काउंसलिंग करते हुए पाया कि मरते हुए लोगों को कोई न कोई पछतावा (रीग्रेट) जरूर था. बरसों तक सैकड़ों मरीजों की काउंसलिंग करने के बाद ब्रोनी वेयर ने मरते हुए मरीजों के सबसे बड़े पछतावे (रीग्रेट्स) में एक ‘कॉमन पैटर्न’ पाया. वेयर कहती हैं, ‘हम सब इस बात को मानते हैं कि मरता हुआ व्यक्ति हमेशा सच बोलता है, उसकी कही एक-एक बात इपिफनी (ईश्वर की वाणी) जैसी होती है.’

डियर जिंदगी: आत्‍महत्‍या और मन का ‘रेगिस्‍तान’!

इसी धारणा पर काम करते हुए मरीजों के सबसे बड़े पछतावे को ब्रोनी वेयर ने 2009 में एक ब्लॉग के रूप में रिकॉर्ड किया. दो साल बाद उन्‍होंने अपने निष्कर्ष को एक किताब ‘द टॉप फाइव रीग्रेटस ऑफ द डाइंग’ (The Top Five Regrets Of The Dying) के रूम में प्रकाशित किया. ऐसा कहा जाता है कि किताब को दस लाख से अधिक पाठक मिले. इससे प्रेरित होने वालों की भी संख्‍या बहुत अधिक है.

आइए, ब्रोनी वेयर के ‘पांच सबसे बड़े पछतावों’ से मिलें. समझने की कोशिश करें कि कहीं हमारी जिंदगी भी तो ऐसे किसी मोड़ की ओर नहीं मुड़ रही. कई बार न चाहते हुए भी हम उन राहों की ओर चल पड़ते हैं, जहां से बचने का ख्‍वाब मन की गहराई में बहुत भीतर तक धंसा होता है…

डियर जिंदगी: जब मन का न हो…

1. ‘काश मैं दूसरों के अनुसार न जीकर अपने अनुसार ज़िंदगी जीने की हिम्मत जुटा पाता.’ यह सभी मरीजों के बीच सबसे सामान्‍य पछतावा था. इसमें यह भी शामिल था कि जब तक हम यह महसूस करते हैं कि अच्‍छी सेहत ही आजादी से जीने की राह देती है, तब तक यह हाथ से निकल चुकी होती है.

2. ‘मैंने इतनी मेहनत न की होती’. ब्रोनी ने बताया कि उन्होंने जितने भी पुरुष मरीजों का इलाज किया, लगभग सभी को यह पछतावा था. उन्होंने अपने रिश्तों को समय न दे पाने की गलती मानी. ज्‍यादातर मरीजों को पछतावा था कि उन्होंने अपना अधिकतर जीवन अपने आॅफिस पर खर्च किया. सभी ने कहा कि वे थोड़ी कम कड़ी मेहनत करके अपने और अपनों के लिए समय निकाल सकते थे.

3. ‘काश मैं अपनी भावना का इज़हार करने की हिम्मत जुटाता.’ ब्रोनी वेयर ने पाया कि बहुत सारे लोगों ने अपनी भावनाओं का केवल इस कारण गला घोंट दिया, जिससे कि शांति बनी रहे. परिणाम स्वरूप उनको औसत दर्जे का जीवन जीना पड़ा. वे अपनी वास्तविक योग्यता के अनुसार जगह नहीं पा सके. इस बात की कड़वाहट, असंतोष के कारण उनको तनाव समेत कई बीमारियां हुईं.

डियर जिंदगी: अतीत की छाया और रिश्‍ते!

4. ‘काश, मैं अपने दोस्तों के सम्पर्क में रहा होता.’ ब्रोनी ने देखा कि अधिकांश लोगों को मृत्यु के नज़दीक पहुंचने तक पुरानी दोस्ती के पूरे फायदों का वास्तविक एहसास ही नहीं हुआ था. अधिकतर तो अपनी ज़िंदगी में इतने उलझ गए थे कि उनकी कई वर्ष पुरानी ‘गोल्डन फ़्रेंडशिप’ उनके हाथ से निकल गई थी. उनको दोस्ती को अपेक्षित समय और जोर न देने का गहरा अफ़सोस था। हर कोई मरते वक्त अपने दोस्तों को याद कर रहा था.

5. ‘काश, मैं खुद को खुश रख पाता.’ कई लोगों को जीवन के अंत तक पता ही नहीं लगता है कि खुशी भी एक चुनाव है. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि खुशी तुरंत हासिल करने की चीज है. यह ‘अभी नहीं तो कभी नहीं’ को याद करने पर ही हासिल हो सकती है.

आइए, खुद से, अपने दोस्‍तों, उनसे जिनसे भी आप प्रेम करते हैं. जिनकी परवाह करते हैं, उनके लिए संकल्‍प लें कि उनकी जिंदगी में इनमें से एक भी पछतावा नहीं रहने देंगे. पछतावामुक्‍त जीवन की शुभकामना के साथ…