अब तक जीवन में जितने प्रकार के अनुभव से सामना हुआ, उनमें परिवर्तन के बारे में मैं सबसे विश्‍वास के साथ संवाद करता हूं. ऐसा इसलिए, क्‍योंकि इसे मैंने सबसे अधिक विश्‍वास, स्‍नेह और आस्‍था के साथ जिया. हम सब बचपन से पढ़ते, सुनते आए हैं कि परिवर्तन, जिंदगी का सबसे बड़ा सत्‍य है. इसे अक्‍सर ऐसे कहा जाता है कि पर‍िवर्तन ही स्‍थाई है. बाकी सब तो अपनी जगह अंगद के पांव की तरह खड़े हैं, बस परिवर्तन है, जो थमता नहीं.

डियर जिंदगी : रिटायरमेंट और अकेलापन!

इसके बाद भी हम सबसे अधिक अगर किसी चीज से डरते हैं तो वह परिवर्तन है. क्‍या है, जो हमें परिवर्तन से रोकता है! आशंका. ऐसा नहीं हुआ तो क्‍या होगा! मैं अगर यह नहीं कर पाया तो क्‍या होगा. ‘डियर जिंदगी’ को बड़ी संख्‍या में ईमेल, व्‍हाट्सअप मैसेज मिल रहे हैं. इनमें जिंदगी के सवालों के साथ उनकी कहानियां भी हैं. आज हम इनमें से दो कहानियां आपके लिए लाए हैं. बाहरी नहीं, भीतरी चुनौती हमें अक्‍सर डराती है. यह अपनों से ही मिलती है. ऐसे में सबसे जरूरी इरादों पर डटे रहना, हार नहीं मानना है. सपनों, परिवर्तन के प्रति आस्‍था ही असली पूंजी है!

डियर जिंदगी: फैसला कौन करेगा!

कहानी-1: मंदसौर, मप्र से आईटी इंजीनियर जीतेंद्र शर्मा लिखते हैं कि तीन साल पहले उनके पास एक निजी कंपनी से दिल्‍ली जाकर काम करने का ऑफर था. उन्‍होंने इस डर से इंकार कर दिया कि यहां सबकुछ व्‍यवस्थित था. अपना शहर, अपने लोग और सुकून. लेकिन एक साल बाद ही उन्‍हें अहसास हुआ कि उनका निर्णय गलत था. इसके बाद उन्‍होंने नई नौकरी के लिए कोशिश शुरू कर दी. लेकिन उसके बाद भी वह इस बात से डर रहे थे कि नई कंपनी में खुद को कैसे संभालेंगे. उसके बाद उन्‍हें ‘डियर जिंदगी’ की कुछ पोस्‍ट उनके एक मित्र के माध्‍यम से मिलीं. जिससे उनका अपने काम के प्रति आत्‍मविश्‍वास प्रबल हुआ. इसके साथ ही यह डर भी जाता रहा कि ‘लोग क्‍या कहेंगे!’

डियर जिंदगी: रेगिस्तान होने से बचना!

हम भारत के सबसे बड़े डर में से एक ‘क्‍या कहेंगे लोग’ पर निरंतर बात कर रहे हैं. यह एक ऐसी मानसिक बाधा है, जिसके चक्रव्‍यूह में अनगिनत सपने दम तोड़ देते हैं.

अब क्‍या: खुशी की बात है कि जीतेंद्र ने इस बार बाहर निकलने का फैसला नहीं बदला . इस समय वह हैदराबाद की एक आईटी कंपनी में काम कर रहे हैं. उन्‍हें शुभकामना.

डियर जिंदगी: ‘ऐसा होता आया है’ से मुक्ति!

कहानी-2: शालिनी शर्मा- हिसार, हरियाणा के ऐसे गांव से आती हैं, जहां बच्चियों को गांव से बाहर पढ़ने की अनुमति न के बराबर है. उनको किसी तरह दिल्‍ली आकर सिविल सर्विसेज की तैयारी करने की इजाजत मिली. लेकिन जल्‍दी ही समझ में आ गया कि आईएएस उनके लिए सही चुनाव नहीं है. उन्‍होंने पत्रकारिता को चुन लिया. परिवार को समझाने की कोशिश की, लेकिन परिवार किसी तरह राजी नहीं हुआ. शालिनी ने अपना निर्णय नहीं बदला. व‍िरोध के बाद भी डटी रहीं. आज एक प्रतिष्‍ठि‍त चैनल में काम कर रही हैं. कुछ समय पहले उसी गांव में उनको सम्‍मान के लिए बुलाया गया.

डियर जिंदगी: विश्‍वास के भरोसे का टूटना!

अब क्‍या : शालिनी अपने गांव, समाज की ब्रांड एंबेसेडर हैं. लड़कियों के लिए प्रेरणा हैं. शिक्षा और निर्णय लेने की अलख जगा रही हैं.

दोनों कहानियां क्‍या सिखाती हैं . कौन है, जो विरोध करता है. परिवर्तन करने से रोकता है. सबसे बड़े स्‍पीड ब्रेकर हमारे लिए कौन बुनता है! यह सब काम हमारे अपने ही करते हैं. इसलिए जब कोई नई चाहत मन में आकार लेती है, तो उसे अच्‍छी तरह तौलिए कि कहीं यह चाहत केवल आकर्षण तो नहीं है. जब यह तय कर लें कि यह गहरी इच्‍छा, आस्‍था है, तो उसे पूरा करने के लिए पूरी शक्ति से जुट जाइए! सारे विरोध सहने के लिए तैयार रहिए, क्‍योंकि सफलता का स्‍वाद बिना विरोध, संघर्ष के अधूरा होता है!

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(लेखक ज़ी न्यूज़ के डिजिटल एडिटर हैं)

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