कुछ लोग जिनमें क्षमता है, अपनी बात कहने की. वह क्‍या कहते हैं! क्‍या वह कोई नई बात कहते दिखते हैं. कुछ ऐसा जो हमारी सड़ी-गली सोच-विचार की शैली को बदलने में मदद कर सके. सबकुछ वैसा, जैसा चला आ रहा है, उसे कौन बदलेगा. नए सवाल, सोच की बात करना अंतरिक्ष में जाने जैसी चीज नहीं है. लेकिन इसे ऐसा ही बना दिया गया है!

क‍हीं कोई नया विचार नहीं. जो चला आ रहा है, बस उस पर वैसे ही चलते रहो. गनीमत है कि सांस लेने का कोई तरीका सार्वजनिक रूप से नहीं बताया गया, वरना अगर कोई थोड़ा अधिक मुंह उठाकर सांस ले लेता तो हम उसे नास्तिक, परंपरा का विध्‍वंसक न जाने क्‍या-क्‍या कहने लगते.

बनाए हुए रास्‍तों के प्रति हमारे मन में इतना दुराग्रह भरा हुआ है कि नए के विचार को हमने अपराध बना दिया है. लोग डरने लगे हैं, नया सोचते हुए. भारत के गांव, शहर, समाज में शादियों के तौर तरीके देखिए. बारातियों, घरातियों का व्‍यवहार देखिए.

डियर जिंदगी: यह दीवार कैसे टूटेगी!

आडंबर की इंतिहा देखिए. कहते नहीं थकते कि जहां नारियों की पूजा होती है, वहां देवता बसते हैं. लेकिन नारियों की पूजा कहां होती है, उन्‍हें तो पुरुषों की आज्ञा मानने, खुद पूजा करने में लगा दिया गया है. अधिकार जैसे पुरुष की संपदा हैं! मोटे तौर पर आपको यह बातें परंपरा नजर आएंगी. कुछ लोग तो इसे संस्‍कार भी कह देंगे. लेकिन मैं इसे केवल खराब, गली और कुंठित आदत कहता हूं.

हम समाज के रूप में नया रास्‍ता बुनने की जगह एक ही लीक पर चलते रहने को कहीं अधिक महत्‍व देते हैं. इसलिए हम अपनी सड़ी-गली सोच, आदतों से आगे नहीं निकल पा रहे हैं. जो चला आ रहा है, वही चल रहा है. ऐसा करते रहना क्‍यों जरूरी है, ऐसा क्‍यों करते रहना चाहिए, इसका कोई ठोस जवाब नहीं होने के बाद भी. इसके मूल में हमारे समाज का चिंतन से दूर रहना और विश्‍वासी होना है.जब तक आदत नहीं बदलेगी, सोच नहीं बदलेगी. हम भला कैसे बदलेंगे. हम जीवन को कैसे समझेंगे. जब जीवन को समझेंगे नहीं, तो उसे जीना कैसे संभव होगा. हम बासी, गल चुकी आदतों के गुलाम बने रहेंगे.

गांव में हमारे बड़े घर में एक कमरा बरसों से बंद था. उसका कोई उपयोग नहीं था. कमरे में कोई उजाला नहीं था, बरसों से. एक दिन किसी ने वहां एक छोटा सा दीया जला दिया. कई बरस का अंधेरा कुछ ही देर में मिट गया.

डियर जिंदगी: गंभीरता और स्‍नेह !

आदतों, बासी सोच का हटना, मिटना असंभव नहीं, लेकिन मुश्किल काम है, क्‍योंकि यह हजारों साल की गुलामी है! हमें नई सोच से एलर्जी है, हां, हम हर बात मान लेते हैं, भरोसा करने को तैयार बैठें हैं, क्‍यों बता दें कि ऐसा कर लो. फि‍र देखो हम कैसे उसे पलकों पर बिठा लेगे.

हम दूसरों का सहारा लेने में उस्‍ताद हो गए हैं. इसलिए हमने सोचना छोड़ दिया है. सबसे अधिक सुख हमें ‘फॉलोअर’ बनने में मिलता है. इसलिए अपना जीवन भी हम दूसरे के दिखाए रास्‍ते से जीते हैं. खुद फैसले नहीं करते, आदत तो दूर की बात है.

दूसरे का वि‍चार उठा लेना, नकल कर लेना, उस पर भरोसा कर लेना यह हजारों बरस की आदत है. कैसे बदलेगी!

एक लेखक मित्र हैं. वह अक्‍सर शराब के लिए कोई न कोई आकर्षक बहाना तलाशते रहते हैं. उनकी ठोस समझ है कि शराब मानसिक खुराक के लिए बुनियादी चीज़ है. एक दिन डॉक्‍टर ने कह दिया कि शराब बंद करनी पड़ेगी तब भी वह राज़ी न हुए. उनने कहा, यहां के डॉक्‍टर के बस की बात नहीं. अमेरिका में किसी से पूछा. कोई बड़ा डॉक्‍टर खोजो. वही बता पाएगा कि अव्‍वल दर्जे की शराब से कोई नुकसान नहीं!

डियर जिंदगी: दर्द के सहयात्री!

वह शराब पर तो इस कदर फि‍दा हैं कि उसकी शान में ग़ालिब से नीचे बात नहीं करते. यह अकेले उनकी नहीं, भारतीय समाज की लत है. हम आदतों को बदलते नहीं, छोड़़ते नहीं. तब भी नहीं, जब प्रश्‍न उस जीवन का है, जो हमें सबसे प्रिय है. हां उनके लिए दिलफरेब़, लुभावने तर्क गढ़ लेते हैं.

अरे! कम से कम अपने जीवन के लिए अपने तर्क तो लाइए. उसके लिए भी दूसरे की मिसाल. इसलिए, विनम्र अनुरोध है कि चीज़ों के प्रति अपनी दृष्टि खुद विकसित करें. सबके साथ रहें, सबकी सुनें, लेकिन अपनी ठोस समझ भी बनाएं. दूसरों की नकल, उनके साथ बहने से आपको कभी किनारा नहीं मिलेगा.

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