आपसे यह साझा करते हुए मुझे हार्दिक प्रसन्‍नता है कि आपकी प्रिय ‘डियर जिंदगी’ अब हिंदी के साथ मराठी, बांग्‍ला और गुजराती में भी स्‍नेह, प्रेम, आत्‍मीयता हासिल कर रही है. इस तरह ‘डिप्रेशन और आत्‍महत्‍या के विरुद्ध’ यह ‘जीवनसंवाद’ भारत के अलग-अलग राज्‍य, शहर तक पहुंच रहा है. आइए, अब इस सूचना से आगे आज का संवाद आरंभ करते हैं.

राजस्‍थान के जोधपुर से एक ईमेल आया है. डॉक्‍टर भुवनेश जैन अपने मित्रों के व्‍यवहार से बहुत दुखी हैं. तनाव में हैं. उनसे दूर चले जाना चाहते हैं, लेकिन यह संभव नहीं, क्‍योंकि रहना जोधपुर में ही है. मेहरानगढ़ के नीचे नीले आसमान की छांव में! वह लिखते हैं कि हम संघर्ष के दिनों में एक साथ आत्‍मीयता से रहते हैं. मुश्किल का सामना करते हैं. मंजिल हासिल करते हैं, उसकी ओर बढ़ते रहते हैं.

डियर जिंदगी: आपको रोकने वाली ‘रस्‍सी’ !

ज़रा सा ‘कुछ’ मिलते ही हमारा व्‍यवहार एक-दूसरे के प्रति बदलने लगता है. हम पहले की तरह ‘एक-दूसरे’ को नहीं, बल्कि एक-दूसरे की हैसियत को महत्‍व देने लगते हैं. तनाव इसी संकरी गली से जिंदगी में दाखिल होता है… इससे वही संबंध जो मुश्किल दिनों में सहारा थे बहुत आगे नहीं जाते. भुवनेश लिखते हैं कि हमने अपने जीवन में आर्थिक हैसियत, कुछ पाने को इतना अधिक कीमती मान लिया है कि अनमोल जिंदगी दांव पर लगा दी है.

डियर जिंदगी: जो मेरे पास है, ‘उसमें भी कुछ है’!

भुवनेश ने जो बात कही, उसमें नया कुछ नहीं. उसके बाद भी घर-घर की यही कहानी है. आप अपने ही परिवार, मित्र, रिश्‍तेदारों के उदाहरण देख सकते हैं. इतना ही नहीं बल्कि मुझे यह भी कहने में संकोच नहीं कि अगर एक खास स्थिति से आप बहुत तेजी से बाहर निकलते हैं. जिसे बोलचाल की भाषा में ‘दिन फिरना’ कहते हैं, तो उसके बाद खुद आपके व्‍यवहार में, आपके आसपास उनके व्‍यवहार में, जो आपसे बेहतर थे, बड़ा परिवर्तन आ जाता है!

हम सबने कभी न कभी समंदर जरूर देखा होगा. उसके तट, फिल्‍म, तस्‍वीर में कहीं न कहीं तो समंदर से मिले ही होंगे. कैसा लगता है उससे मिलकर. बीते दो बरस में मुझे समंदर से कई बार मिलने का मौका मिला. समंदर ने मेरे सोचने, समझने, व्‍यवहार करने के तरीके को गहराई से प्रभावित किया है. मैं उससे सुबह, शाम, दोपहर अलग-अलग वक्‍त पर मिला. कभी अचानक उसे थोड़ा गुस्‍से में पाया, कभी मुस्‍कुराते, तो कभी खुशी से उछलते हुए.’

डियर जिंदगी: टूटे रिश्‍ते की ‘कैद’!

लेकिन एक चीज़ थी जो समंदर में हमेशा ‘एक’ जैसी थी. उसकी मर्यादा. उसके स्‍वभाव में अनुशासन है. यह अनुशासन तब भी नहीं टूटता जब वह अलग-अलग चीजों का सामना कर रहा होता है. जब वह दुखी होता है, कुछ परेशान होता है, खुशियों से लबरेज होता है! समंदर के स्‍वभाव में स्थिरता है. दूसरे को शरण देने का स्‍थायी भाव है. बच्‍चों की गलतियों के लिए उदार क्षमा, अपरिचित के लिए स्‍नेह उसके सबसे बड़े गुण हैं. इसलिए तो वह समंदर है. अनंत, अपार, अपराजित.

डियर जिंदगी: आपका पछतावा क्या होगा!

प्रिय भुवनेश, अब आपको केवल यह सोचना है कि जिन मित्रों, साथियों के व्‍यवहार से आप दुखी, तनाव में हैं. वह क्‍या हैं, अगर वह सचमुच बड़े हो गए हैं, तो उनके व्‍यवहार में बदलाव आना ही नहीं चाहिए था. इससे जाहिर है कि वह असल में अभी छोटे ही हैं. क्‍योंकि बड़े होने की निशानी वह नहीं, जो उनमें झलक रहा है. बल्कि वह है, जो समंदर हमें सिखाता है. अगर भुवनेश की तरह आपके आसपास भी लोगों का बदला व्‍यवहार आपको दुखी करे, तो हमेशा समंदर को याद कीजिएगा! वहां से आशा की नौका मिलेगी, जो सुर‍क्षित तट तक पहुंचा देगी!

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(लेखक ज़ी न्यूज़ के डिजिटल एडिटर हैं)

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