जिस तेजी से गूगल हमारी सोच, समझ पर हावी होता जा रहा है, उससे आगे चलकर हमारा समय, समाज और इतिहास गूगल ‘से पहले’ और गूगल ‘के बाद’ के आधार पर बंट जाएगा. गूगल हमारे दिमाग को बहुत तेजी से प्रभावित, नियंत्रित करने लगा है. वह सोचने की क्षमता को तेजी से कम करते हुए हमें अपनी आदत डलवाने में कामयाब हो गया है.

कोलंबिया यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक डॉ. बेटसी स्‍पैरो कहते हैं कि जब हम कोई सूचना चाहते हैं, तो गूगल की ओर दौड़ते हैं. यह एक बीमारी है, जिसे ‘गूगल प्रभाव’ कहा जा रहा है. हम धीरे-धीरे अपनी स्‍मृति पर जोर देने की जगह सूचना हासिल करने के बाहरी, तकनीकी साधनों पर विश्‍वास करने लगते हैं.

कुछ दिन पहले मैं सुशिक्षित परिवार के साथ संवाद में था. उनके घर पर किताबों की कमी नहीं. विभिन्‍न विषयों पर बात करने वाले लोग हैं. वहां तीन बड़े बच्‍चों की माताजी जो स्‍वयं एक शिक्षिका, लेखिका हैं, उन्‍होंने यह कहते हुए चिंता जताई कि उनके बच्‍चे वैसे तो समझदार हैं, लेकिन वह भी ‘फेक न्‍यूज’ के जाल में फंस जाते हैं. वह किताबों की जगह अब हर बात को गूगल में जांचकर देखना चाहते हैं. यह एक ऐसे परिवार का संदर्भ है, जो मेरी दृष्‍टि में बहुत सम्‍मानित, शिक्षित है.

डियर जिंदगी: असफल बच्‍चे के साथ!

गूगल की निर्भरता स्‍मार्टफोन आने के बाद बहुत अधिक तेजी से बढ़ी. अब हमें छोटे-छोटे रास्‍ते याद नहीं रहते. जो कुछ हम सुनते, पढ़ते, बात करते हैं, वह याद नहीं रहता. असल में गूगल को हमने अपना सब कुछ मान लिया है. हम भूल रहे हैं कि गूगल कुछ और नहीं हमारे ही द्वारा ‘भरी सूचना’ का संसार है. वहां जो कुछ सामने आ रहा है, वह कभी न कभी तो हमने ही किया होगा.

विषय को अधिक तकनीकी न बनाते हुए इस तरह समझिए कि आपकी ‘सोच, रुचि और समझ’ कैसे बन रही है. इसको सबसे अधिक कौन बढ़ावा दे रहा है. आपके व्‍यवहार की छोटी-छोटी बात का अध्‍ययन करके आपको समझने का काम अब लगभग पूरा होने वाला है.

एक सरल उदाहरण से समझिए. दस-पांच बरस पहले तक हम किसी चीज के पक्ष में बहस, चर्चा करते हुए एक-दूसरे को अखबार, व्‍यक्तिगत अनुभव, किताबों का ब्योरा देते थे. अब हर चीज़ गूगल पर आकर ठहर गई है. स्थितियां यहां तक आ गई हैं कि अगर हम अपने बारे में कुछ बताना चाहें, तो वह भी हमसे बेहतर गूगल कर रहा है.

डियर जिंदगी : बच्‍चों को अपने जैसा नहीं बनाना !

हमारे स्‍वभाव, मिजाज और व्‍यवहार में गूगल, सोशल मीडिया का प्रभाव बढ़ने के साथ तेजी से परिवर्तन आने लगा है. हमारा ध्‍यान, अध्‍ययन स्‍वयं पर होने की जगह दूसरों की ओर अधिक चला गया. हम अपने ‘भीतर’ को इतना अधिक बदलने जा रहे हैं कि वह कुछ जो बिल्‍कुल अपना है, धीरे-धीरे अपने से ही दूर होता जा रहा है.

वह कुछ जो बिल्‍कुल मेरा अपना है! जो मैं हूं. असल में वही जीवन की मूल ऊर्जा है. बाकी सब आने जाने हैं. मुखौटे, नाटक में पहने जाते हैं. थोड़ी देर के लिए पहने जाते हैं. हमेशा के लिए नहीं. अपने स्‍वभाव को छोड़कर, उसके विपरीत जाना अपने ही विरुद्ध होने जैसा है. अपने विरुद्ध जाते ही हम एक दुनिया रचने लगते हैं, जहां सबसे पहले स्‍वयं पर संदेह शुरू होता है. अपनी कमतरी का अहसास, दूसरों के श्रेष्‍ठ होने का भाव हमारे मन, दिमाग पर आक्रमण करने लगता है. हम तुलना के जाल में ऐसे फंसने लगते हैं कि कोई विकल्‍प ही नजर नहीं आता. चीजें हमारी समझ,‍ नियंत्रण से बाहर निकलती जाती हैं.

डियर जिंदगी: जोड़े रखना ‘मन के तार’!

समाज में बढ़ता तनाव, गहरी होती उदासी का बड़ा कारण अपने मूल स्‍वभाव, मिजाज से किनारा करना है. दूसरे का कुछ अच्‍छा ग्रहण करने में कोई खामी नहीं, लेकिन ऐसा करते हुए हम अपने को मिटा नहीं सकते! यह दांव हमारी चेतना और अस्तित्‍व के लिए आत्‍मघाती है. स्‍वयं को बचाए रखना कुछ-कुछ वैसा ही है, जैसे जैव विविधता! सबकी खूबियों का सम्‍मान कीजिए, लेकिन अपने को भी बचाए रखिए. यह आपका होना, आपके अस्तित्‍व के लिए सबसे जरूरी है.

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