औरंगाबाद से जिंदगी के विविध रंग से सराबोर ई-मेल मिला. अनामिका त्रिपाठी लिखती हैं कि ‘डियर जिंदगी’ से उनको हौसला, साहस, विरोध सहने की शक्ति मिलती है. इसने उनकी ऐसे पड़ाव पर धैर्य बनाए रखने में मदद की, जब उन्‍हें परिवार, समाज की ओर से समर्थन, स्‍नेह, आत्‍मीयता नहीं मिल रही थी. Also Read - Chanakya Niti For Marriage: शादी से पहले पार्टनर के बारे में जरूर जान लें ये बातें, वरना बर्बाद हो जाएगा आपका जीवन

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अनामिका कहती हैं कि शादी के पांच साल बाद उनका तलाक हो गया. घरेलू हिंसा, शारीरिक प्रताड़ना के कारण उन्‍होंने अलग होने का फैसला किया. तलाक के कुछ समय तक तो सब ठीक रहा, लेकिन उसके बाद घर की कहानी बदलने लगी. घर परिवार के लोग चाहते थे कि वह जल्‍दी ही अपनी ‘नई’ दुनिया बसा लें. Also Read - पार्टनर संग रोमांस करना चाहते हैं! तो ज्यादा दिमाग लगाना छोड़ दें जनाब...

यह ऐसा दबाव था, जिसके लिए अनामिका तैयार नहीं थीं. उन्‍हें एक रिश्‍ते से दूसरे रिश्‍ते में जाने के लिए समय चाहिए था. कल तक जो परिवार संघर्ष में उनके साथ था, आज वह अचानक उनसे दूर कैसे हो गया. आहिस्‍ता-आहिस्‍ता अनामिका तनाव, गहरी उदासी की ओर बढ़ने लगीं. इसी बीच कुछ पुराने दोस्‍तों का साथ मिला. इन्‍हीं दोस्‍तों में से किसी ने उन्‍हें ‘डियर जिंदगी’ के कुछ लेख व्‍हाट्सअप पर भेजे. उसके बाद से यह सि‍लसिला जारी है.

डियर जिंदगी: दोनों का सही होना!

यह पहली बार है, जब उनकी ओर से हमें ई-मेल मिला है. जिसमें उन्‍होंने जीवन के उस पक्ष की ओर संकेत किया है, जो हममें से हर एक के जीवन में कभी न कभी जरूर आता है. एक ऐसा समय जब परिवार, निकटतम मित्र, रिश्‍तेदार आपके निर्णय पर सवाल खड़े करने लगते हैं.

यह ऐसी मनोदशा के बीच होता है, जिसका उन्‍हें पहले से न तो कोई अनुभव होता है. न ही वह ऐसी स्थिति का सामना करने के लिए मन से तैयार होते हैं. यह बिना तैयारी के परीक्षा देने जैसा है. इससे पहले हम एक आदर्श स्थिति में होते हैं. हमें बचपन से पता है कि संकट में परिवार एक-दूसरे का साथ देने के लिए है. इसलिए हम संकट में एक-दूसरे का साथ तो निभा लेते हैं, लेकिन संकट टलते ही दूसरे संकट शुरू हो जाते हैं. जो पहले संकट जितने ही गहरे होते हैं, लेकिन उनका कोई अनुभव नहीं होने से हम उनको तनाव, अवसाद का कारण बना लेते हैं.

डियर जिंदगी: हम कैसे बदलेंगे!

अनामिका का संकट ऐसा ही है. परिवार के लिए मुश्किल में पड़ी बच्‍ची का साथ देना तो अनिवार्य था, लेकिन उसके बाद का सामना करना पुराने ढंग से शिक्षित, प्रशिक्षित व्‍यक्ति, समाज के लिए थोड़ा नहीं, बहुत मुश्किल काम है.

तलाक, लिव-इन रिलेशनशिप, सगाई के बाद शादी टूटने जैसी‍ स्थितियों के लिए समाज अब तक तैयार नहीं है. सिनेमा में यह रंग खूब भाते हैं, लेकिन जैसे ही हमारे सामने आते हैं, हम असहज हो जाते हैं!

हमें इस बात को समझना होगा कि सबसे जरूरी मनुष्‍य है. किसी भी बंधन, रिश्‍ते से जरूरी मनुष्‍य की अस्‍मिता, स्‍वतंत्रता है. यहां एक बात को गांठ बांधने की जरूरत है, वह है, अपने से बड़ों का आदर अलग बात है, उनके विचार से असहमत होना अलग बात.

मेरे और पिता के संबंध आदर, बिना शर्त और गहरी आत्‍मीयता वाले हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उनके सामाजिक विचार मेरे हैं. मेरे विचार, मेरी सोच स्‍वतंत्र है.

डियर जिंदगी: किससे डरते हैं!

हम समाज, परिवार में एक-दूसरे को जितनी अधिक स्‍वतंत्रता देंगे, हमारे रिश्‍ते उतने ही परिपक्‍व होते जाएंगे! एक-दूसरे के आदर, सम्‍मान से एक-दूसरे की आजादी का कोई संबंध नहीं. अनामिका जी का असली संकट क्‍या था! उनकी पहचान, स्‍वतंत्रता को एक मनुष्‍य के रूप में स्‍वीकार करने की हमारी अक्षमता.

एक-दूसरे का साथ जरूरी है. लेकिन इसके साथ ही यह भी कि ‘अगर तुम न होते’ तो भी मेरी जिंदगी चलती रहेगी/चलेगी. ‘तुम्‍हारा’ साथ जरूरी है, लेकिन इतना नहीं कि उसके बिना मेरी जिंदगी अपाहिज हो जाए! रिश्‍तों में एक-दूसरे को बांधना नहीं है, स्‍वतंत्र करना है! स्‍वतंत्रता जितनी भीतरी होगी, प्रेम भी उतना ही गहरा होगा. मोह के धागे से आगे निकलकर ही प्रेम मिलता है.

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पता : डियर जिंदगी (दयाशंकर मिश्र)

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(लेखक ज़ी न्यूज़ के डिजिटल एडिटर हैं)

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