जीवन क्‍या है! इस बारे में हमें अनंत, विविध विचार मिलते हैं. जो इसके महत्‍व के बारे में अपनी सोच से अवगत कराते हैं. इन सबके बीच एक नई चीज हमारे बीच तेजी से घर कर रही है, डिप्रेशन की कोख से उपजा आत्‍महत्‍या का विचार.

मैं हमेशा से आत्‍मकथा, जीवन के अध्‍ययन पर जोर देता हूं. इससे हमें खास व्‍यक्ति, उस समय के बारे में अधिकतम बातें जानने का अवसर मिलता है. यह बात अलग है कि बहुत कम आत्‍मकथा ऐसी मिलेंगी, जिनके बयान में ‘जैसा जीवन जिया’ वाली स्‍पष्‍टता, सच्‍चाई हो. गांधी की आत्‍मकथा इस बारे में लाजवाब है. अपने बारे में इससे अधिक सच्‍चाई दुर्लभ है.

ऐसा लगता है गांधी स्‍वेटर के फंदे की तरह सिरा पकड़कर बेहद आसानी, सहजता से जीवन को सबके सामने रख देते हैं. गांधी के यहां भी ऐसे अनेक अवसर हैं, जब वह आत्‍मग्‍लानि से भरे हुए हैं. असल में यह प्रसंग उनके मोहनदास से ‘बापू’ की यात्रा के आरंभिक बिंदु हैं. गांधी बचपन में उन सभी चीजों से घ‍िरे हुए थे, जिनके लिए आज भी अभिभावक चिंतित हैं. लेकिन गांधी को सबसे अलग करने वाला केवल एक गुण है, अपने विचार पर दृढ़ता!

बचपन में जिस बच्‍चे गांधी का मन आत्‍महत्‍या जैसे विचार के नजदीक पहुंचा, आगे चलकर उनने ही भारत को नवजीवन दिया. जीवन के महत्‍व की दृष्टि से गांधी की व्‍याख्‍या केवल इस एक वाक्‍य में की जा सकती है, ‘सत्‍याग्रह’. अपने विचार पर कायम रहने की दृढ़ता, गलती स्‍वीकार करना.

डियर जिंदगी: आत्‍महत्‍या से कुछ नहीं बदलता!

इन दिनों मैं गांधी पर राॅबर्ट पेन की ‘द लाइफ एंड डेथ ऑफ महात्‍मा गांधी’ का संवाद प्रकाशन से अनुवाद ‘महात्‍मा गांधी जीवनगाथा’ पढ़ते हुए गांधी की ‘डिप्रेशन और आत्‍महत्‍या के विरुद्ध’ भूमिका पर विचार कर रहा हूं. मुझे लगता है गांधी के विचार देश, समाज के बारे में जितने प्रासंगिक हैं, उतने ही महत्‍वपूर्ण वह जीवन के विकास, उसे तनाव से बचाने के लिए भी हैं.

अब उस बॉयोग्राफी (जीवनी) की बात जो इन दिनों चर्चा में है. संगीतकार एआर रहमान की जीवनी कृष्णा त्रिलोक ने लिखी है. इसमें रहमान स्‍वीकार करते हैं कि पच्‍चीस बरस की उम्र तक वह बेहद निराश थे. वह खुद को इतना असफल मानते थे कि आत्‍महत्‍या के बारे में सोच रहे थे.

पिता के निधन के बाद रहमान के दिन मुश्किल से भरे थे. घर का खर्च चलाने के लिए मां उनके पिता के वाद्य यंत्रों को किराए पर देती थीं. इनको चलाना सिर्फ रहमान को आता था, इसलिए वह यंत्रों के साथ जाते थे, यह उनका काम बन गया था.

डियर जिंदगी: बड़े ‘होते’ हुए…

भारत के सबसे सफल , सुपरिचित संगीतकारों में से एक रहमान कभी भी फिल्‍म में संगीत नहीं देना चाहते थे. वह तो बैंड और नॉन फिल्‍मी म्‍यूजिक तक सीमित रहना चाहते थे. लेकिन परिवार की आर्थिक परेशानी के कारण उन्‍हें यह काम करना पड़ा.

बहुत कम उम्र में वह मलयालम म्‍यूजिक इंडस्‍ट्री में इंस्‍ट्रूमेंटलिस्‍ट के रूप में स्‍थापित हो गए थे . उसके बाद भी वह पच्‍चीस बरस की उम्र तक भारी निराशा, तनाव से घिरे हुए आत्‍महत्‍या के बारे में सोचते रहते थे.

जो रहमान के सामने था , वह उससे हमारी तरह खिन्‍न थे. वह असल में अपनी उस दुनिया में डूबे रहना चाहते थे, जिसका बीज मन में उनकी पिता की संगत में पड़ा था. लेकिन किसी तरह वह अपने संघर्ष के साथ खड़े रहे. अपने सपने को अपनी आंखों में थामे हुए.

डियर जिंदगी: टूटे रिश्‍ते की ‘कैद’!

आज जो आत्‍महत्‍या हमारे सामने आ रही हैं , उनका कारण यही है कि वह अपनी आंखों में बुने ख्‍वाब के लिए संघर्ष की मशाल को आखिरी सांस तक थामें रहने का हौसला छोड़ देते हैं. लड़ना जरूरी है, अपने सपने के लिए.

कोई भी सपना आत्‍महत्‍या से पूरा नहीं होता . उसके लिए जीना होता है, लड़ना होता है. दिन को रात और रात को दिन बनाना होता है. सपने मरकर पूरे नहीं होते, उनके लिए जिंदा रहना सबसे जरूरी शर्त है!

आज जब रहमान पचास बरस से अधिक के हो चुके हैं . हम कह सकते हैं कि अगर रहमान ने आत्‍महत्‍या को स्‍थगित न किया होता, तो हम उनके रचे अनूठे मीठे, सुरीले संगीत से वंचित रह जाते. ‘जय हो’, ‘छैंया-छैंया’ तो इस पड़ाव के कुछ अहसास भर हैं, रहमान का योगदान उस सिनेमा, संगीत, संस्‍कृति को बुनने में कहीं ज्‍यादा है, जो हमें संगीत के सुख के साथ अपने पर गर्व के अवसर देती है.

डियर जिंदगी: जो मेरे पास है, ‘उसमें भी कुछ है’!

आज की ‘डियर जिंदगी’ के मूल किरदार तो रहमान, गांधी हैं. जिनका जीवन हमें समझाता है कि आत्‍महत्‍या का विचार असल में हमेशा स्‍थगित करने योग्‍य है. जीवन कितना भी मुश्किल क्‍यों न हो, वह हमेशा संभावना है. ऐसी यात्रा का संकेत है, जिसका एक छोर तक हमारी नजर से दूर है.

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