आपको अकेले रहने की कितनी आदत है! जब आप इस बात का जवाब दे रहे हों, तो यह जरूर ध्‍यान रहे कि ‘अकेले’ का अर्थ क्‍या है. अगर आप हम यह समझते हैं कि अकेले रहने से मतलब वहां किसी और कि गैर-मौजूदगी से ही है, तो यह सही अर्थ नहीं है.

अकेले होने का अर्थ है, आप केवल ‘अपने’ साथ हैं. अकेले होने के मायने केवल यही हैं कि आप खुद को समय दे रहे हैं. आप जब प्रकृति के साथ समय बिताते हैं, किताबों के साथ वक्‍त गुजारते हैं. लिखते हैं, सुनते हैं तो भी आप अकेले ही होते हैं.

लेकिन अकेले होने के अर्थ पुराने हो चले हैं. अब अकेले होने के मायने हो गए हैं, आप एक कमरे में चुपचाप मोबाइल के साथ अकेले हैं! आप वीडियो गेम के साथ अकेले हैं. अकेले में आप चैटिंग कर रहे होते हैं.
आजकल यह सब अकेले रहने में गिना जाने लगा है. हमारी जीवनशैली इस तरह के अकेलेपन के बीच बीत रही है.

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लेकिन यह कैसा अकेलापन है. यह तो अकेलापन नहीं, बस अकेलेपन का भ्रम है. अकेलेपन के नाम पर खुद के साथ किया जा रहा छल! अगर आप अकेले नहीं हैं, आप खुद को समय नहीं दे पा रहे हैं. स्‍वयं के साथ अगर हमारा संवाद नहीं हो पा रहा है, तो इसकी कीमत हमको ही चुकानी होगी. मोबाइल के साथ अकेले रहने वाले, चैटिंग में व्‍यस्‍त अकेलपन के बीच रह रहे लोगों की पहचान बहुत आसानी से उनके व्‍यवहार, रवैए से की जा सकती है.

‘अधजगी’ आंखें हमारे बीच तेजी से बढ़ती जा रही हैं. अधूरी नींद, चैटिंग से भरी रातें, फेसबुक की अंतहीन चिंता अंदर से बेसब्र, गुस्‍सैल, खोखला कर रही है. हम इंटरनेट के साथ ‘अकेले’ रहते हैं, अपने साथ नहीं! एक छोटी, सरल मिसाल से समझते हैं. हमारे यहां एक युवा साथी हैं. एक दिन वह मेरे पास आए. उन्होंने कहा, ‘मैं बोर हो रहा हूं. मुझे नींद नहीं आती. हर बात पर गुस्‍से में रहता हूं. क्‍या किया जाए’.

मैंने कहा, सबकुछ तो आप जानते ही हैं, अपने बारे में. फिर परेशानी क्‍या है. मैंने कुछ किताबें दी. (इस सख्‍त हिदायत के साथ कि तय समय में लौटा देंगे. क्‍योंकि ज्‍यादातर लोग किताबें रखकर भूल जाते हैं. इतना ही नहीं, मांगने पर बुरा भी मानते हैं.) और किताबों की एक लिस्‍ट भी.

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वह शाम की शिफ्ट में काम करते हैं सो उनसे कहा, ‘सुबह जब भी उठें, थोड़ा वक्‍त बिना मोबाइल के बिताएं. वह घर के पास पार्क में सुबह करीब एक घंटा बिताने लगे. बिना मोबाइल के!’ कोई महीने भर बाद उन्होंने बताया, ‘बिना मोबाइल के रहना सचमुच में मुश्किल था. लेकिन एक बार आदत हो गई तो पता चला कि ‘अकेले’ कैसे रहा जाता है!’

अब वह सोने से एक घंटे पहले ‘सोशल’ मीडिया से और आधे घंटे पहले मोबाइल से दूर हो जाते हैं. उठने के एक घंटे बाद ही ‘सोशल’ होते हैं. उन्‍होंने बताया कि अब बोरियत, नींद और गुस्‍सा सहज हो रहे हैं. किताबें अकेले नहीं रहने देतीं. और इससे भी बड़ी बात यह कि जब उन्‍हें अकेले होना होता है, तो वह पूरी तरह ‘अकेले’ होते हैं. हर किसी को अपना अकेलापन खोजना होगा. यह इतना मुश्किल भी नहीं, बस जीवन के प्रति थोड़ी सजगता, स्‍नेह की दरकार है!