नई दिल्ली. आपने फिल्में तो बहुत देखी होंगी. क्या आपको राजकुमार और प्रिया राजवंश वाली फिल्म ‘हीर रांझा’ याद है? आज इस फिल्म को याद करने की वजह है, क्योंकि आज हिन्दी सिनेमा के इतिहास में शायरी या पूरी की पूरी कविताओं पर आधारित फिल्म ‘हीर रांझा’ के संवाद लेखक प्रख्यात शायर कैफी आजमी की पुण्यतिथि है. आज ही के दिन वर्ष 2002 में दिल का दौरा पड़ने से उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में जन्मे इस महान शायर का निधन हो गया था. कैफी आजमी ने अपने जीवन काल में कई फिल्मों के लिए गीत व डायलॉग लिखे. अपने बेहतरीन गानों के लिए उन्हें कई प्रसिद्ध पुरस्कार भी मिले. लेकिन यह एक फिल्म, ‘हीर रांझा’ अद्भुत है. कैफी आजमी का योगदान उर्दू साहित्य में भी अतुलनीय था. उन्होंने 11 साल की उम्र में शायरी करनी शुरू कर दी थी. Also Read - Shabana Azmi-Javed Akhtar Wedding Anniversary: शादीशुदा जावेद अख्तर के प्यार में पड़ गईं थी शबाना आजमी, ऐसी है लव स्टोरी

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एक मुशायरे में शिरकत करते कैफी आजमी.

एक मुशायरे में शिरकत करते कैफी आजमी.

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तरक्कीपसंद शायर के रूप में जाने गए कैफी आजमी ने पूरी जिंदगी आम आदमी की तरह जिया. शायरी में बहुत खास कहने वाले कैफी, परिवार, समाज और देश के लिए हमेशा आम बने रहे. उनके बारे में उनकी बेटी बॉलीवुड अभिनेत्री शबाना आजमी ने लिखा है, ‘वो कभी दूसरों जैसे थे ही नहीं, लेकिन बचपन में ये बात मेरे नन्हें से दिमाग में समाती नहीं थी. न तो वे ऑफिस जाते थे, न अंग्रेजी बोलते थे और न दूसरों के डैडी और पापा की तरह पैंट और शर्ट पहनते थे-सिर्फ सफेद कुर्ता-पजामा. वो डैडी या पापा के बजाय अब्बा थे- ये नाम भी सबसे अलग ही था- मैं स्कूल में अपने दोस्तों से उनके बारे में बात करते कुछ कतराती ही थी. झूठ-मूट कह देती थी- वो कुछ बिजनेस करते हैं. वर्ना सोचिए, क्या यह कहती कि मेरे अब्बा शायर हैं? शायर होने का क्या मतलब? यही न कि कुछ काम नहीं करते!’

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पत्नी शौकत आजमी (बाएं) और बेटी शबाना आजमी के साथ कैफी आजमी की तस्वीर.

जिस बात को छुपाती थी बेटी, वही बन गया फख्र

पिता कैफी आजमी के बारे में अपने अनुभव को बया करते हुए शबाना आजमी लिखती हैं, ‘अब्बा को छुपाकर रखना ज्यादा दिन मुमकिन न रहा. उन्होंने फिल्मों में गीत लिखना शुरू कर दिया था. एक दिन मेरी एक दोस्त ने क्लास में आकर बताया कि उसने मेरे अब्बा का नाम अखबार में पढ़ा है. बस, उस पल के बाद बाजी पलट गई- जहां शर्मिंदगी थी, वहां गौरव आ गया. 40 बच्चे थे क्लास में मगर किसी और के डैडी या पापा का नहीं, मेरे अब्बा का नाम छपा था अखबार में. अब मुझे उनका सबसे अलग तरह का होना भी अच्छा लगने लगा. वो सबकी तरह पैंट-शर्ट नहीं, सफेद कुर्ता-पजामा पहनते हैं-जी! अब मैं उस काले रंग की गुड़िया से भी खेलने लगी जो उन्होंने मुझे कभी लाकर दी थी और समझाया था कि सारे रंगों की तरह काला रंग भी बहुत सुंदर होता है. मगर मुझे तो सात बरस की उम्र में वैसी ही गुड़िया चाहिए थी जैसी मेरी सारी दोस्तों के पास थी- सुनहरे बालों और नीली आंखों वाली. मगर अब जबकि मुझे सबसे अलग अब्बा अच्छे लगने लगे तो फिर उनकी दी हुई गुड़िया लेकर पूरे आत्मविश्वास के साथ अपनी दोस्तों के पास गई और उन्हें अपनी गुड़िया के गुण बताए तो उनकी सुनहरे बालों और नीली आंखों वाली गुड़िया उनके दिल से उतर गई. ये सबसे पहला सबक था जो अब्बा ने मुझे सिखाया कि कामयाबी दूसरों की नकल में नहीं, आत्मविश्वास में है.’

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कैफी आजमी की पहली गजल

इतना तो जिंदगी में किसी की खलल पड़े

हंसने से हो सुकूं न रोने से कल पड़े

जिस तरह हंस रहा हूं मैं पी-पी के गर्म अश्क

यूं दूसरा हंसे तो कलेजा निकल पड़े

इक तुम कि तुमको फिक्र-ए-नशेब-ओ-फराज है

इक हम कि चल पड़े तो बहरहाल चल पड़े

साकी सभी को है गम-ए-तिश्न लबी मगर

मय है इसी की नाम पे जिसकी उबल पड़े

मुद्दत के बाद उसने की तो लुत्फ की निगाह

जी खुश तो हो गया मगर आंसू निकल पड़े

(इनपुटः राजपाल से प्रकाशित ‘कैफी आजमी, चुनी हुई शायरी’)