नई दिल्ली. विश्वगुरु, गुरुदेव और भारत के पहले नोबेल पुरस्कार विजेता! बंगाल की माटी के महान कर्मयोगी रबीन्द्रनाथ ठाकुर या रबीन्द्रनाथ टैगोर (Rabindranath Tagore) को पूरा संसार इन्हीं विशेषणों से जानता और समझता है. यह भी संयोग ही है कि जिस अगस्त के महीने में हम गुरुदेव की पुण्यतिथि मनाते हैं, उसी महीने में देश की आजादी का जश्न मनाने का दिन भी आता है, जिस अवसर पर टैगोर की लिखी रचना ही राष्ट्रगान के रूप में गाई जाती है. गुरुदेव को साहित्यकार, चित्रकार, संगीतकार, समाज सुधारक और शिक्षाविद के रूप में देश और विदेशों में जाना गया. साहित्य और संस्कृति में उनके योगदान को आप इस बात से भी समझ सकते हैं कि गुरुदेव की दो रचनाएं दो देशों का राष्ट्रगान बनी. भारत और बांग्लादेश के राष्ट्रगान गुरुदेव की रचनाएं ही हैं. भारत का ‘जन गण मन…’ और बांग्लादेश का ‘आमार सोनार बांग्ला…’ गुरुदेव की ही रचना है. गुरुदेव को उनकी पुण्यतिथि पर याद करने के लिए आप उनकी रचनाएं पढ़ सकते हैं. यूट्यूब पर पड़े सैकड़ों वीडियो देख सकते हैं. आज, जबकि बंगाल में संस्कृति के नाम सियासी जंग लड़ी जा रही है या जंग के आगाज की भूमिका तैयार की जा रही है, ऐसे में गुरुदेव को याद करना जरूरी हो जाता है. आइए हम आपको कुछ वजह देते हैं गुरुदेव को याद करने के लिए. Also Read - Rabindranath Tagore death anniversary: रबीन्द्रनाथ ठाकुर की ये प्रेरणादायक बातें बदल देंगी जिंदगी के प्रति आपका नजरिया

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गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर की प्रारंभिक शिक्षा संपूर्ण नहीं हुई थी. घर पर ही शुरुआती शिक्षा के बाद उन्हें इंग्लैंड भेजा गया, लेकिन वहां भी वे अपनी शिक्षा पूरी नहीं कर पाए. बावजूद इसके उनका साहित्य-संसार एक सागर की तरह है, जिसमें डूबने के बाद आप इसी दुनिया में डूबे रहना चाहेंगे. ‘राजर्षि’, ‘नौका डुबी’, ‘गोरा’ या फिर विश्वप्रसिद्ध ‘गीतांजलि’ जैसी कालजयी रचनाओं को पढ़ते हुए गुरुदेव की छवि आपके दिल-ओ-दिमाग में साकार होगी. यह अनोखी बात है कि जिस व्यक्ति की स्कूली शिक्षा अधूरी रही हो, उसने शांतिनिकेतन के रूप में ऐसा प्रायोगिक शिक्षण केंद्र शुरू किया, जो आज शैक्षणिक महत्ता के उच्च प्रतिष्ठित संस्थानों में गिना जाता है.

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सुनिए रबीन्द्र संगीत

प्रकृति, पूजा, भक्ति और सांस्कृतिक विविधता को समेटे हुए गुरुदेव ने 2 हजार से ज्यादा गीतों की रचनाएं की. इन्हें खुद ही स्वरबद्ध किया और गाकर दुनिया के सामने रखा. हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की परंपरा और बंगाल की संस्कृति की झलक इन गीतों में स्पष्ट नजर आई, जिसे बाद में रबीन्द्र संगीत का ही नाम दे दिया गया. आज गुरुदेव की पुण्यतिथि पर उन्हें याद करते हुए आप इस संगीत का आनंद उठा सकते हैं.

शांतिनिकेतन हो आइए

गुरुदेव रबीन्द्रनाथ ठाकुर को याद करने का एक और सुलभ रास्ता है. आप शांतिनिकेतन की सैर कर आइए. विश्वभारती विश्वविद्यालय में घूमते हुए आपको न सिर्फ गुरुदेव की याद आएगी, बल्कि आप खुद को उनके विचार के करीब पाएंगे. यहां का सुरम्य वातावरण, शैक्षणिक माहौल आपको कालातीत अनुभव देगा. आप विश्वगुरु का सान्निध्य महसूस कर सकेंगे. गुरुदेव के बहाने शांतिनिकेतन-टूर से आप खुद को ऊर्जावान बना सकेंगे.