नाटक, कहानी और उपन्यास लिखते-लिखते एक युवा राजनेता से प्रभावित हो जाता है और उसके प्रदेशव्यापी आंदोलन में बढ़-चढ़कर शरीक हो जाता है. भारत जैसे हिंदी बाहुल्य देश में हिंदी के ही खिलाफ मोर्चे में शामिल होता है. जिस देश की पूरी राजनीति राम के नाम पर घूम चुकी होती है, उसी राम की मौजूदगी पर सवाल उठाता है. जहां हिंदू मैरिज एक्ट के तहत दो शादी कानूनी रूप से अपराध हो, वहां सार्वजनिक रूप से दो महिलाओं के साथ रह रहा हो. 14 साल की उम्र से राजनीति में सक्रिय हो. अपने 80 साल के राजनैतिक करियर में दक्षिण भारत में जवाहर लाल नेहरू से लेकर नरेंद्र मोदी तक के लिए चुनौती रहा शख्स आज जीवन और मृत्यु के बीच खड़ा है. हम बात कर रहे हैं  द्रविण मुनेत्र कड़गम नेता मुथुवेल करुणानिधि की. Also Read - तमिलनाडु: वोटिंग से 2 दिन पहले आयकर विभाग की बड़ी कार्रवाई, डीएमके नेता कनिमोझी के घर छापेमारी

करुणानिधि की जिंदगी को झांकते हैं तो लगता है कि हीरो की कहानी लिखते-लिखते वह खुद दक्षिण हीरो बन गया. उनकी करिश्माई छवि की वजह से ही उनकी पार्टी द्विड़ मुनेत्र कड़गम सत्ता में ही नहीं आई, बल्कि करुणानिधि 5 बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री भी बने. साल 1957 में पहली बार विधानसभा पहुंचे करुणानिधि की दखल तमिलनाडु के विधानसभा में दिन प्रतिदिन बढ़ती ही नहीं गई, बल्कि इस तरह मजबूत हुई कि इसका असर दिल्ली तक देखने को मिला. बीमारी से जूझ रहे करुणानिधि का हाल चाल लेने के लिए राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष से लेकर उपराष्ट्रपति तक अस्पताल पहुंचे. अस्पताल के बाहर खड़े सैकड़ों समर्थकों की आखों में आंसू बता रहे हैं कि वहां करुणानिधिक की अहमियत क्या है. Also Read - तमिलनाडु के सीएम ने कहा- करूणानिधि कुछ नहीं कर पाए तो स्टालिन क्या कर लेंगे

राम के अस्तित्व पर उठाया सवाल
साल 2007 में केंद्र में यूपीए की सरकार थी. रामसेतु का मुद्दा गरम था. इसी दौर में करुणानिधि ने राम पर सवाल खड़ा कर दिया. उन्होंने एक बयान में कहा, कहा जा रहा है कि 17 लाख साल पहले एक आदमी था, जिसका नाम राम था. उसके बनाए पुल को हाथ न लगाएं. कौन था ये राम? किस इंजीनियरिंग कॉलेज से ग्रेजुएट था? इसके सबूत कहां हैं? ये बयान करुणानिधि  के ब्राह्मणवाद विरोध के उस तेवर को दिखाता है, जिसकी बदौलत तमिलनाडु में आज भी उनकी तूती बोलती है. एक ऐसा शख्स जो एक विश्वास पर पीले कपड़े पहनता था, वह राम पर इस तरह के सवाल उठाए लोगों को चौकातै हैं, लेकिन करुणानिधि जानते हैं कि उनकी राजनीति किस पर टिकी है और वह उसी के अनुरूप आगे बढ़ते रहे. Also Read - एम. के. अलागिरी की धमकी के बीच एम.के.स्टालिन डीएमके के अध्यक्ष चुने गए

करुणानिधि और शादी
साल 1944 के आसपास करुणानिधि की मुलाकात दक्षिण सिनेमा के प्लेबैक सिंगर सीएस जयरामन की बहन पद्मावती अम्माय्यर से हुई. यह मुलाकात धीरे-धीरे प्रेम में बढ़ गई और 1946 में करुणानिधि और पद्मावती की शादी हो गई. उन्हें एक बेटा भी हुआ, लेकिन साल 1948 में अचानक बीमार हुईं पद्मावती का निधन हो गया. इसके चार साल बाद परिवार वालों ने दयालु अम्मल से उनकी शादी करा दी. उनसे उन्हें तीन बेटे एमके स्टालिन और एकके थामिलारासु और एमके सेल्वी हुए. वहीं, एक बेटी एमके अझागिरी हुई. स्टालिन ही करुणानिधि के उत्तराधिकारी के तौर पर डीएमके की बागडौर संभाले हुए हैं.

 DMK leader, M karunanidhi, karunanidhi personal life, karunanidhi professional life, karunanidhi political life, karunanidhi love affair, karunanidhi life, all you need to know about karunanidhi, you shoul know about karunanidhi, tamilnadu politician karunanidhi, DMK leader karunanidhi

करुणानिधि

ड्रामा ग्रुप की लड़की से प्यार और फिर विवाद
60 के दशक में करुणानिधि राज्य के बड़े नेताओं में शुमार हो चुके थे. डीएमके के प्रचार के लिए एक ड्रामा ग्रुप भी शामिल था. इस ग्रुप में एक कलाकार थी जिसका नाम रजती था. करुणानिधि रजती से प्रभावित हो गए और दोनों एक दूसरे मिलने लगे. इस बीच उनके प्रेम की खबरें भी चलने लगी. परिवार सहित कई लोगों ने इसकी आलोचना शुरू कर दी. ऐसे में करुणानिधि का साथ दिया उनके राजनैतिक गुरु अन्नादुरई ने.

इस तरह हुआ रजती-करुणानिधि का ‘कल्याण’
अन्नादुरई अपनी पार्टी डीएमके के साथ ‘स्वयं मर्यादा कल्याणम्’ नाम से एक कार्यक्रम चला रहे थे. इसके मुताबिक, युवक और युवती शादी के लिए न तो कोर्ट जाते थे और न ही किसी मंत्रोच्चार से बंधते थे. इसके लिए उन्होंने रास्ता निकाला था कि युवक और युवती पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के बीच जिंदगी भर साथ निभाने की कसम खाएंगे. बस करुणानिधि को ये रास्ता मिल गया और उन्होंने इसी व्यवस्था के तहत रजती के साथ पार्टी नेताओं से आशीर्वाद ले लिया. इसके बाद दयालु जहां करुणानिधि की पत्नी रहीं वहीं रजती को संगिनी कहा जाने लगा. रजती से उन्हें कनिमोझी हुई.

दो जगह रहते थे करुणानिधि
हिंदू विवाह अधिनियम के तहत दयालु ही करुणानिधि की पत्नी हैं. लेकिन रजती भी उनकी संगिनी की तरह रहने लगी. कहा जाता है कि उन दिनों करुणानिधि गोपालपुर स्थित अपने आधिकारिक घर पर दिन में पत्नी दयालु के साथ रहते थे. वहीं रात में वह सीजेआई कॉलोनी के बंगले में रजती के साथ रहते थे. हालांकि, इस दौरान रजती और दयालु में अच्छे रिश्ते रहे. लेकिन समय के साथ-साथ दोनों के बच्चों में रिश्ते बिगड़ गए.

भेदभाव से नाराज हो पेरियार के साथ जुड़ गए
करुणानिधि का जन्म साल 1924 में तमिलनाडु के नागापट्टिनम जिले के थिरिक्कुवलाई में हुआ. वह जिस परिवार से आते हैं वह पारंपरिक रूप से वाद्ययंत्र ‘नादस्वरम’ बजाने का काम करता है. करुणानिधि को भी इसी परंपरा के अंतर्गत नादस्वरम सीखने के लिए भेजा गया. लेकिन वहां उन्होंने गुरु के जातिगत भेदभाव को महसूस किया. ये वो दौर था जब राज्य में ई वी रामास्वामी ‘पेरियार’ को सुनने की होड़ मची रहती थी. वह ‘आत्मसम्मान’ के नाम से एक आंदोलन चलाते थे जो कि गैर-ब्राह्मणवादी चीजों से प्रभावित था. इसी दौरान 14 साल की उम्र में करुणानिधि को भी पेरियार का एक भाषण सुनने का मौका मिला और वह उससे प्रभावित होकर उनके आंदोलन में कूद पड़े. उन्होंने हिंदी हटाओ आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया.

 DMK leader, M karunanidhi, karunanidhi personal life, karunanidhi professional life, karunanidhi political life, karunanidhi love affair, karunanidhi life, all you need to know about karunanidhi, you shoul know about karunanidhi, tamilnadu politician karunanidhi, DMK leader karunanidhi

करुणानिधि

आंदोलन से स्क्रिप्टराइटर तक का सफर
साल 1937 में भारत के सभी स्कूलों में हिंदी भाषा को अनिवार्यतौर पर लाए जाने की तैयारी शुरू हुई. पेरियार इसके खिलाफ संघर्ष कर रहे थे. ऐसे में करुणानिधि भी इस आंदोलन के खिलाफ मुखर हो गए और नाटक, पर्चे और अखबार के लिए लिखना शुरू कर दिए. द्रविड़ों के आत्मसम्मान की लड़ाई में मुखर तरीके से आ गए और उनके भाषण कौशल ने लोगों को खूब प्रभावित किया. करुणानिधि की लेखन शैली धीर-धीरे इस तरह हो गई कि उन्होंने तमिल फिल्म इंडस्ट्री में स्क्रीनराइटर के तौर पर काम भी शुरू कर दिया. इस दौरान उन्होंने कई कहानियां, नाटक और उपन्यास लिखी. कहा जाता है कि इन दिनों उन्हें महीने के 10 हजार रुपये तक मिल जाते थे. लेकिन करुणानिधि का मन तो राजनीति में था और वह उसी तरफ बढ़ लिए.

… और बन गए सीएम
करुणानिधि ने द्रविड़ आंदोलन के लिए एक छात्र संगठन बनाया था. लेकिन वह डीएमके की ही राजनीति में सक्रिय रहे. साल 1957 में वह पहली बार कुलीथलाई विधानसभा से सदन पहुंचे. उस वक्त उनकी उम्र 33 साल थी. साल 1967 में वह तमिलनाडु सरकार में मंत्री बनाए गए. लेकिन साल 1969 में डीएमके अध्यक्ष अन्नादुरई की मृत्यु हुई तो वह राज्य के सीएम बने. साल 1969 से 2011 के बीच करुणानिधि 5 बार मुख्यमंत्री बने. वह 10 बार डीएमके के अध्यक्ष बने. इतना ही नहीं 1957 से लेकर 2016 तक वह 13 बार विधायक बने. वह एक ऐसे शख्स हैं जिन्होंने अपने राजनैतिक करियर में एक भी चुनाव नहीं हारे.