'एक देश बारह दुनिया'- किस्से और पंक्तियां उनके लिए जो अपनी जड़ों से उजड़ गए! (पुस्तक समीक्षा)

हिन्दी के ग्रामीण पत्रकार शिरीष खरे ने अपना यह अनुभव अपनी नई किताब 'एक देश बारह दुनिया' में बयां किया है.

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जिंदगी बुनते थे

वो बिखर गए.

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ठांव-ठांव हो गए.

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और छांव-छांव से पता पूछना बेकार है.

कई लोगों ने एक जगह से मिलकर एक नारा लगाया. मैं खुश हूं, बल्कि गदगद हूं, यह देखकर कि वैराट गांव में एक घर की लंबी और खुली दहलान पर वैराट और पसतलई गांव के लोगों ने मेरे यहां आने की सूचना पर बैठक रखी है.

पचास से ज्यादा लोग और खासतौर से महिलाएं अपने-अपने काम छोड़कर यहां क्या सोचकर बैठी हैं! मैं इनके बारे में बात करने के लिए आने वाला कोई पहला पत्रकार या सामाजिक कार्यकर्ता भी नहीं हूं! फिर कालूराम मुझे बताता है कि ये बाहर से आए व्यक्तियों का इसी तरह से स्वागत और सम्मान करते हैं. सम्मान के जवाब में मेरा एक हाथ अपनेआप ही उठ गया, भीतर ही भीतर यह सोचकर कि न मैं मंत्री हूं और न अफसर, जो मेरे लिखे से इनकी तकदीर बदल जाएगी! फिर भी इनकी उम्मीद और इनका प्यार मेरी जिंदगी की पूंजी है.

यह सच्चाई है कि कोरकू समुदाय के लोग अपनी पहचान के लिए संघर्षरत हैं, लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि इस तरह के समुदायों के सामने आकर मुझे मेरी पहचान हासिल होती है, वरना मेरी दुनिया में तो मुझमें कोई बात नहीं है. मेरी दुनिया से अलग इस दुनिया के लोग हर बार पूरे अनुशासन और ध्यान से मेरी बातें सुनते और अपनी बातें सुनाते हैं, लेकिन इस दुनिया से बाहर जब यहीं बातें मैं सुनाता हूं तो कौन सुनता है! मैं खुद इनकी तरह ही वंचित हूं, ये व्यवस्था से वंचित हैं और मैं अपने पेशे से."

हिन्दी के ग्रामीण पत्रकार शिरीष खरे ने अपना यह अनुभव अपनी नई किताब 'एक देश बारह दुनिया' में बयां किया है. यह अनुभव आज से बारह साल पहले महाराष्ट्र के विदर्भ की सतपुड़ा स्थित मेलघाट पहाड़ियों से है, जहां वह कुपोषण की एक न्यूज स्टोरी के सिलसिले में कोरकू आदिवासियों के बीच पहुंचे थे. 'राजपाल एंड सन्स, नई-दिल्ली' से आई इस पुस्तक में वह तस्वीर उभरती है जो अक्सर छिपाई जाती है. इसमें देश के उपेक्षित लोगों की ऐसी आवाजों को शामिल किया गया है जिन्हें अमूमन अनसुना और अनदेखा किया जाता है. इस तरह, इस पुस्तक में कुल बारह रिपोर्ताज हैं जो भारत की आत्मा कहे जाने वाले गांवों के अनुभवों को साझा करने से जुड़े हुए हैं.

मराठी उपन्यासकार और सामाजिक कार्यकर्ता 'एक देश बारह दुनिया' के बारे में कहते हैं कि इसमें यहां विमुक्त-घुमंतू समुदायों की दिनचर्या के दुख, दर्द, संघर्षों की ऐसी लंबी और अनछुई सच्चाईयां दर्ज हैं जिनसे मानवीय संवेदनाएं किनारा कर गईं. पुस्तक में पारधी, तिरमली और सैय्यद मदारी जैसी उत्पीड़ितों के अंधेरों से होकर उनकी एक अदभुत संस्कृति भी सामने रखी है. इसके अलावा, उस्मानाबाद से कर्नाटक के बीच कई किलोमीटर दूर के ठांव-ठिकाने तक जाकर गन्ने की खेतों में शोषण की पैदावार का शोकाकुल विवरण है. यह पुस्तक संविधान की संकल्पना के आसपास घूमती है, जिसमें सभी भारतवासियों के लिए स्वतंत्रता, समता, न्याय और बंधुता के मूल्य शामिल हैं.

पुस्तक: एक देश बारह दुनिया

लेखक: शिरीष खरे

पृष्ठ: 208 पेपरबैक

मूल्य: 196 रुपए

प्रकाशन: राजपाल एंड सन्स, नई-दिल्ली

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Published Date:July 8, 2021 10:14 AM IST

Updated Date:July 8, 2021 10:14 AM IST

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