वह अनुशासित सख्त और अपनी पसंद के अनुसार चलने वाले पिता रहे हैं. उनको जिंदगी ने कुछ भी आसानी से नहीं बख्शा इसलिए उनकी राय होती थी कि जो कुछ मैं तय करूंगा वही बच्चों के लिए सर्वोत्तम होगा. 80 और 90 के दशक में पिता का यह नजरिया और रवैया बहुत आम था इस मायने में वह कोई बहुत अलग थे, ऐसा नहीं कहा जा सकता. क्योंकि उस समय लगभग यही माना जाता था कि बच्चे की समझ, प्रतिभा का उपयोग केवल कठोरता से ही करवाया जा सकता है. इसलिए वह जैसा समय था जैसी सोच थी उसके अनुसार परवरिश करने वाले पिता थे. वह अपने समाज और जातिगत आग्रह को लेकर भी तय विचार वाले व्यक्ति थे.Also Read - बच्चों में 90 प्रतिशत से अधिक प्रभावी है फाइजर की कोरोना वैक्सीन, जानिए कब तक मिलेगी मंजूरी

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एक बार तय हो गया, तय हो गया. उसके बाद बच्चों, पत्नी या किसी मित्र, सखा परिजन के लिए कोई ‘जगह’ नहीं थी. Also Read - दिल्ली सरकार के प्रचार वीडियो में दिखे स्कूली बच्चे, बाल अधिकार आयोग कर सकता है कार्रवाई; जानिए क्यों...

डियर जिंदगी : परवरिश की परीक्षा!

हम समझते हैं कि ‘बच्चे’ कुछ नहीं समझते. जबकि जमाने भर पहले कहा जा चुका है, ‘चाइल्ड इज द फादर ऑफ मैन’! और हम इसका उल्टा ही माने बैठे हैं! मुझे याद नहीं कि लगभग 15 वर्षों तक मैंने उन्हें कभी खुलकर हंसते बोलते देखा हो. इतना जरूर याद है कि वह हमेशा कुछ नाराज, अनमने, गुस्से में, हल्के गुस्से में रहा करते थे. उनके बच्चे बहुत होशियार, स्कूल के नियम-कायदों के अनुसार ‘भारी’ प्रतिभाशाली और निश्चित रूप से ‘चांद’ तक जाने वाले थे .वह बच्चों को ‘सब कुछ’ सिखाते रहे लेकिन आज जबकि उनके बच्चे अपने बच्चों के साथ रह रहे हैं तो मैं कह सकता हूं कि वह बच्चों को प्रेम, स्नेह, आत्मीयता, अनुराग के अलावा सब कुछ सिखा पाने में सफल रहे.

डियर जिंदगी : कितने उदार है, हम!

इस बीच उनके बड़े बेटे ने तय किया कि वह प्रेम विवाह करेंगे. वह अपने तय किए पर कायम रहे, और उसी शहर में तब से लेकर आज तक वह ‘अपने’ परिवार के साथ ‘अलग’ रह रहे हैं. याद है मुझे किस तरह उन्होंने इस कदम को गोपनीय रखा, वह नहीं चाहते थे कि लोग इसके बारे में जाने.

डियर जिंदगी : मेरा होना सबका होना है!

लेकिन लोग कहां मानते हैं जान जाते हैं. तो उसके बाद वह इसकी आलोचना में जुटे रहे. उनकी पत्नी बताती कि बहू भली है, उस की जाति हमारे अनुकूल नहीं है लेकिन वह बहुत सम्मान, आदर, स्नेह से पेश आती है, मुझे बहुत अच्छा लगता है उससे बात करना, उसके पास जाना. उसे भी अच्छा लगता है, बेटी को भी अच्छा लगता है, ‘इनको’ पसंद नहीं. अब पिताजी का पूरा जोर दूसरे बेटे पर था वह उसे अपने नियमों के अनुकूल संचालित करना चाहते थे. बच्चा रोबोट नहीं होता कभी कभी हमें ऐसा लग सकता है कि वह हमारी प्रोग्रामिंग के अनुसार चल रहा है लेकिन बस चल रहा होता है. उसके पास और कोई रास्ता भी तो नहीं होता . लेकिन एक दिन जब उसे रास्ता मिल जाएगा तब वह हमारे साथ क्या करेगा. क्योंकि प्रोग्रामिंग तो हमने अपने नियम, परंपरा, स्वभाव के अनुसार की है न कि उसे समझने की कोशिश की है.

डियर जिंदगी : जीवन के गाल पर डिठौना!

इस किस्से में भी यही हुआ.

हम जिन विचारों से भागने की कोशिश करते हैं, कई बार वह अचानक हमारे गले पड़ जाते हैं. दूसरे बेटे ने भी प्रेम विवाह कर लिया. अब क्या करें, क्योंकि मार्केट में सारा निवेश उसके नाम पर ही तो किया था. अब क्या कहा जाए, अब क्या किया जाए . उसने भी अपनी अलग दुनिया बसा, बना ली!

हम थोड़ा ठहरते हैं. सोचते हैं. ऐसा क्यों हुआ. बच्चे हमेशा माता-पिता से प्रेम करते हैं क्योंकि उनके पास और कोई विकल्प ही नहीं होता. हम इस प्रेम को गहरा करने में मदद करते हैं क्योंकि ऐसा करने से प्रेम की जड़ जीवन में गहरी उतरती जाती है.

लेकिन जरा सोचिए कि अगर प्रेम की जड़ गहरी होने की वजह कटती चली जाए तो जीवन कितना अकेला और असहनीय होता चला जाएगा. उनने बच्चों को होशियार, चतुर, ‘चांद’ पर जाने लायक बनाने की भरपूर कोशिश की लेकिन इस प्रक्रिया में स्नेह की जो चूक हुई, उसने एक हरे-भरे, लहलहाते जीवन को सुखद आत्मीयता की जगह कहीं अधिक कैक्टस और कंटीली झाड़ियों से भर दिया.

उनके बच्चों ने क्या चुना? इससे अधिक कहीं जरूरी बात यह है क्यों चुना? शायद, इसलिए क्योंकि वह उस सहज, सरल , स्नेहिल प्रेम की तलाश में थे जो उन्हें अपने घर, पिता से मिलना चाहिए था, लेकिन नहीं मिला. तो वह बाहर खोजने निकल गए…

यह सब कल की बातें हैं, हमें तो बस यह देखना चाहिए कि कहीं हम आज भी तो वही नहीं कर रहे !

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