Faiz Ahmad Faiz Death Anniversary Special: फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, एक ऐसा शायर जिसका कलाम रूमानियत और इंकलाबी मयार पर सलीके से चोट करना जानता है. जब कभी भारतीय उपमहाद्वीप के शायरों का नाम आएगा, फ़ैज़ वहां सबसे ऊपर होंगे. अपनी ज़बान में क्रांति का रस घोले फ़ैज़ ने जिंदगी के उन पहलुओं को भी छुआ है जिसके पास जाने से शायर घबराते हैं. फ़ैज़ ने अपनी शायरी को हर दौर में ज़िंदा रखने के लिए ‘तरक़्क़ी-पसंद’ का रास्ता चुना और इस रास्ते पर चलना यक़ीनन मुश्किल ही होता है. अपनी ज़िंदगी के कुछ अहम हिस्से फ़ैज़ ने जेल की सलाखों के पीछे भी काटे. इस वक्त में उन्होंने ऐसे कई शेर कहें जो मुस्तक़बिल (भविष्य) का चेहरा बन गया. फ़ैज़ ने अपने दस्तार को कभी डगमगाने नहीं दिया. उस वक्त के शासक के खिलाफ भी उन्होंने कई रचनाएं गढ़ी, लेकिन प्रेम रस में. यही साहसिक और सालिकापन फ़ैज़ को फ़ैज़ बनाता है.

जब फ़ैज़ अपनी रातें कारावास में गुजार रहे थे तब उन्होंने ‘ज़िन्दान नामा (कारावास का ब्यौरा)’ को लिख कर आवाम के दिलों में एक ऐसी चिंगारी लगा दी जिसकी लौ से आज भी इंकलाब ज़िंदा है. उस ‘ब्यौरा’ का एक हिस्सा कुछ यूं बातें करता है-

बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
बोल, ज़बाँ अब तक तेरी है
तेरा सुतवाँ जिस्म है तेरा
बोल कि जाँ अब तक तेरी है

इस नज़्म से फ़ैज़ ने अपनी सैकड़ों पीढ़ी को बोलना सिखाया है. अपनी निजी ज़िंदगी में फ़ैज़ ने मोहब्बत का रंग भी घोला. उनकी मोहब्बत ने आने वाली नई नस्लों को मोहब्बत का इज़हार करना भी सिखाया. फ़ैज़ ने एक अंग्रेज़ समाजवादी महिला एलिस जॉर्ज से शादी की और फिर दिल्ली में आ बसे. इस शायर ने जब वक़्त से आंख मिलाया तब दुनिया ने इन्हें कम्युनिस्ट (साम्यवादी) होने और इस्लाम से इतर रहने के आरोपों में बांध दिया. लेकिन ऐसा कहते हैं ना, शायर खुद को आग पर रख कर अपनी ग़ज़लें और नज़्मों को पकाता है. फ़ैज़ ने अंग्रेज़ी हुकूमत में सेना की नौकरी की लेकिन अपने अंदर की ग़ुलामी को कई बार तराशा. देश के बंटवारे के वक्त फ़ैज़ की कलम ने ‘सुबह-ए-आजादी’ जैसी महान कृति को पैदा किया.

सुबह-ए-आजादी’ की शुरुआत करते हुए फैज़ ने लिखा था-

‘ये दाग़ दाग़ उजाला, ये शबगज़ीदा सहर

वो इन्तज़ार था जिस का, ये वो सहर तो नहीं’. 

फ़ैज़ ने हर मुश्किल वक़्त में अपनी आवाज़ बुलंद की और इस बुलंदी की सर परस्ती में उन्हें कई बार बंधक भी बनाया गया. उसी समय की एक मशहूर ग़ज़ल को लोगों ने आज तक अपने दिल के क़रीब रखा है. उन्होंने कहा:

गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौबहार चले

चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले

क़फ़स उदास है, यारो सबा से कुछ तो कहो

कहीं तो बहर-ए-ख़ुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले

कभी तो सुब्ह तेरे कुंज-ए-लब से हो आग़ाज़

कभी तो शब सर-ए-काकुल से मुश्कबार चले

बड़ा है दर्द का रिश्ता, ये दिल ग़रीब सही

तुम्हारे नाम पे आयेंगे, ग़मगुसार चले

जो हम पे गुज़री सो गुज़री है शब-ए-हिज़्रां

हमारे अश्क़ तेरी आक़बत संवार चले

हुज़ूर-ए-यार हुई दफ़्तर-ए-जुनूं की तलब

गिरह में लेके गरेबां का तार-तार चले

मुक़ाम ‘फ़ैज़’ कोई राह में जंचा ही नहीं

जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले

फ़ैज़ चले गए लेकिन हमें अदब और एहतराम से मोहब्बत और ज़िंदगी को जीने का तरीक़ा बता दिया. फ़ैज़, तुमने हमारे ज़बान मे लफ़्ज़ बोए हैं. आने वाली हर नस्ल तुम्हारी इबादत में ख़ामोशी को को कुफ़्र मानेंगी. शुक्रिया फ़ैज़.