Faiz Ahmad Faiz Birth Anniversary: उर्दू अदब का एक ऐसा शायर जिसने अपने कलाम से इंक़लाब की लौ को पुख़्ता कर दिया. दुनिया के महानतम शायरों और कवियों की फेहरिश्त का वो नाम जिसके लहजे से हुकूमत कंपकंपाती थी.वो शायर जिसने क्रांतिकारी रचनाओं को भी बड़े एहतराम और मोहब्बत से परोसा है. सरहदों को तोड़कर आवाम के दिलों में बसने वाले इस शायर को दुनिया फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ (Faiz Ahmad Faiz) से जानती है. आज इस बाकमाल शायर की जयंती है.

फ़ैज़ ने अपनी ज़िंदगी में ऐसी कई नज़्में लिखी और शेर कहे जो हर वक़्त में, हर सदी में ज़िंदा रखने की सलाहियत रखते है. जब कभी आवाम अपनी लड़ाई लड़ने सड़क पर उतरती है तब उनके लबों पर सांस लेने वाला तराना फ़ैज़ का ही होता है और जब कभी कोई ज़हन मोहब्बत की इबादत को बेताब होता है तब उसके दिल में उठता गुबार भी फ़ैज़ को ही याद करता है. इस ख़ास मौक़े पर हम पेश कर रहे है फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की कुछ ऐसी चुनिंदा रचनाएं जिसे लोगों ने सर आंखों पर बिठा कर रखा है.

Faiz Ahmad Faiz Famous Poems/Poetry/Nazm- यहां पढ़िए फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की मशहूर नज़्में:     

1- मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात

तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है

तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात

तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है

तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए

यूँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाए

और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा

राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म

रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए

जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म

ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए

जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से

पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से

लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे

अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे

और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा

राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

2-बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे

बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे

बोल ज़बाँ अब तक तेरी है

तेरा सुत्वाँ जिस्म है तेरा

बोल कि जाँ अब तक तेरी है

देख कि आहन-गर की दुकाँ में

तुंद हैं शोले सुर्ख़ है आहन

खुलने लगे क़ुफ़्लों के दहाने

फैला हर इक ज़ंजीर का दामन

बोल ये थोड़ा वक़्त बहुत है

जिस्म ओ ज़बाँ की मौत से पहले

बोल कि सच ज़िंदा है अब तक

बोल जो कुछ कहना है कह ले

Faiz Ahmad Faiz Poetry ‘Hum Dekhenge’- Birth Anniversary Special:

3- हम देखेंगे…

लाजिम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिस का वादा है
जो लौह-ए-अज़ल में लिख्खा है

जब जुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गिरां
रूई की तरह उड़ जाएंगे
हम महकूमों के पांव-तले
जब धरती धड़-धड़ धड़केगी

और अहल-ए-हकम के सर-ऊपर
जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी
जब अर्ज-ए-खुदा के काबे से
सब बुत उठवाए जाएंगे
हम अहल-ए-सफा मरदूद-ए-हरम
मसनद पे बिठाए जाएंगे
सब ताज उछाले जाएंगे
सब तख़्त गिराए जाएंगे
बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो ग़ाएब भी है हाज़िर भी
जो मंज़र भी है नाज़िर भी
उट्ठेगा अनल-हक़ का नारा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो
और राज करेगी ख़ल्क़-ए-ख़ुदा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो

4-आख़िरी ख़त…

वो वक़्त मिरी जान बहुत दूर नहीं है

जब दर्द से रुक जाएँगी सब ज़ीस्त की राहें

और हद से गुज़र जाएगा अंदोह-ए-निहानी

थक जाएँगी तरसी हुई नाकाम निगाहें

छिन जाएँगे मुझ से मिरे आँसू मिरी आहें

छिन जाएगी मुझ से मिरी बे-कार जवानी

शायद मिरी उल्फ़त को बहुत याद करोगी

अपने दिल-ए-मासूम को नाशाद करोगी

आओगी मिरी गोर पे तुम अश्क बहाने

नौ-ख़ेज़ बहारों के हसीं फूल चढ़ाने

शायद मिरी तुर्बत को भी ठुकरा के चलोगी

शायद मिरी बे-सूद वफ़ाओं पे हँसोगी

इस वज़्-ए-करम का भी तुम्हें पास न होगा

लेकिन दिल-ए-नाकाम को एहसास न होगा

अल-क़िस्सा मआल-ए-ग़म-ए-उल्फ़त पे हँसो तुम

या अश्क बहाती रहो फ़रियाद करो तुम

माज़ी पे नदामत हो तुम्हें या कि मसर्रत

ख़ामोश पड़ा सोएगा वामांदा-ए-उल्फ़त

Faiz Ahmad Faiz Selected Poetry-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की चुनिंदा नज़्में  

5- हम जो तारीक राहों में मारे गए…

तेरे होंटों के फूलों की चाहत में हम

दार की ख़ुश्क टहनी पे वारे गए

तेरे हातों की शम्ओं की हसरत में हम

नीम-तारीक राहों में मारे गए

सूलियों पर हमारे लबों से परे

तेरे होंटों की लाली लपकती रही

तेरी ज़ुल्फ़ों की मस्ती बरसती रही

तेरे हाथों की चाँदी दमकती रही

जब घुली तेरी राहों में शाम-ए-सितम

हम चले आए लाए जहाँ तक क़दम

लब पे हर्फ़-ए-ग़ज़ल दिल में क़िंदील-ए-ग़म

अपना ग़म था गवाही तिरे हुस्न की

देख क़ाएम रहे इस गवाही पे हम

हम जो तारीक राहों पे मारे गए

ना-रसाई अगर अपनी तक़दीर थी

तेरी उल्फ़त तो अपनी ही तदबीर थी

किस को शिकवा है गर शौक़ के सिलसिले

हिज्र की क़त्ल-गाहों से सब जा मिले

क़त्ल-गाहों से चुन कर हमारे अलम

और निकलेंगे उश्शाक़ के क़ाफ़िले

जिन की राह-ए-तलब से हमारे क़दम

मुख़्तसर कर चले दर्द के फ़ासले

कर चले जिन की ख़ातिर जहाँगीर हम

जाँ गँवा कर तिरी दिलबरी का भरम

हम जो तारीक राहों में मारे गए

6- गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौबहार चले

गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौबहार चले

चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले

कफ़स उदास है, यारों सबा से कुछ तो कहो
कहीं तो बहर-ए-ख़ुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले

कभी तो सुब्ह तेरे कुंज-ए-लब से हो आगाज़
कभी तो शब सर-ए-काकुल से मुश्कबार चले

बड़ा है दर्द का रिश्ता, ये दिल ग़रीब सही
तुम्हारे नाम पे आयेंगे, ग़मगुसार चले

जो हम पे गुज़री सो गुज़री है शब-ए-हिज्राँ
हमारे अश्क़ तेरी आक़बत सँवार चले

हुज़ूर-ए-यार हुई दफ़्तर-ए-जुनूँ की तलब
गिरह में लेके गरेबाँ का तार-तार चले

मुक़ाम “फैज़” कोई राह में जचा ही नहीं
जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले