
Gargi Santosh
गार्गी संतोष, जी मीडिया के India.com में सब-एडिटर के पद पर कार्यरत हैं. वह हाइपरलोकल, नेशनल और वर्ल्ड सेक्शन की जिम्मेदारी संभाल रही हैं. गार्गी को लाइफस्टाइल, हेल्थ, टेक्नोलॉजी, और ... और पढ़ें
बेंगलुरु: भारत का सबसे महत्वकांक्षी स्पेस मिशन ‘Mission Moon’ चंद्रयान-3 (Chandrayaan-3) की चांद से दूरी अब बहुत ही कम रह गई है. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के मुताबिक, चंद्र मिशन: चंद्रयान-3 बुधवार 23 अगस्त को शाम 6:04 बजे चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग करेगा. इस बीच, चंद्रयान- 3 की लैंडिंग की शुरुआत पर पूर्व इसरो चीफ के सिवन (Former ISRO Chief K Sivan) ने India.com से खास बातचीत की. इस दौरान उन्होनें चंद्रयान-3 की संभावित सफलता दर, लूना 25 के क्रैश होने से चंद्रयान-3 मिशन पर क्या प्रभाव पड़ा, चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र पर अंतरिक्ष यान के उतरने का कारण और इस मिशन के सफल होने पर क्या अंतर आएगा इन सबके बारे में बात की.
भारत के चंद्र मिशन को तकनीकी पहलुओं से समझाने वाले सवाल पर सिवन कहते हैं कि चंद्रयान-3 मिशन (Chandrayaan-3 Mission) का पहला और मुख्य उद्देश्य अंतरिक्ष यान को चंद्रमा की सतह पर उतारना है और चंद्रमा पर उतरने के बाद दूसरा लक्ष्य का उप उसके उपकरणोंयोग कर प्रयोगों को अंजाम देना है. के सिवन ने कहा, चंद्रयान-3 का उद्देश्य चांद पर डेटा ढूंढना और इसे पृथ्वी पर भेजना है. उन्होनें बताया कि चांद से आने वाले डेटा का वैज्ञानिक अध्ययन करेंगे और फिर इसका विश्लेषण करेंगे. चंद्रयान-3 द्वारा चंद्रमा पर पानी के अणुओं या किसी नई चीज़ के बारे में विज्ञान का भी उपयोग कर सकेगा.
चंद्रयान-3 मिशन की संभावित सफलता दर और अनिश्चितता को ध्यान में रखते हुए दुर्घटना की संभावना पर पूर्व इसरो चीफ ने कहा, हम कोई भी मिशन शुरू करें तो पूरे आत्मविश्वास के साथ ही आगे बढ़ते हैं लेकिन अंतरिक्ष प्रणाली में हमेशा कुछ न कुछ अनिश्चितता बनी रहती है. उन्होनें कहा, अंतरिक्ष में ऐसा भी कुछ हो सकता है जो ज़मीन पर पहले नहीं हुआ हो जैसे उड़ान के दौरान यान खराब हो जाना. लेकिन इस सबके बावजूद के सिवन ने यकीन दिलाया कि जब हम किसी मिशन की योजना बना रहे होते हैं तो हम हमेशा पूरे आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ते हैं. उन्होनें कहा, न केवल चंद्रयान के दौरान बल्कि अंतरिक्ष संगठन के किसी भी मिशन में हम हमेशा पूरे आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ते हैं.
मालूम हो कि चंद्रयान 3, चंद्रयान 2 का अनुवर्ती मिशन है जिसका लैंडर दुर्भाग्य से लैंडिंग से पहले दुर्घटनाग्रस्त हो गया था. चंद्रयान-3 मिशन में पिछले अनुभव से क्या सावधानियां बरती गई हैं और इस बार लैंडिंग प्रक्रिया में क्या अलग है? इस पर पूर्व इसरो चीफ ने कहा, चंद्रयान-3 की लैंडिंग प्रक्रिया चंद्रयान 2 के समान ही है लेकिन हमने बीते मिशन से सबक सीखा है और इस मिशन के दौरान चंद्रयान-3 में कुछ सुधारात्मक उपाय किए गए हैं जैसे- जहां भी डिजाइन मार्जिन कम है उन्हें बढ़ाया गया है और जहां भी संभव हो वहां बढ़ाया गया है. उन्होनें कहा, अगर कोई प्रणाली विफल हो रही है तो भी मिशन सफल रहेगा.
भारत और रूस दोनों देश चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग का लक्ष्य बना रहे थे लेकिन लूना-25 दुर्घटनाग्रस्त हो गया. क्या इससे हमारे देश के चंद्र मिशन और लैंडिंग पर कोई फर्क पड़ता है? इस सवाल पर उन्होनें कहा, नहीं, रूस के चंद्र मिशन लूना 25 के दुर्घटनाग्रस्त होने से हमारे चंद्रयान 3 मिशन पर कोई प्रभाव या प्रभाव नहीं पड़ेगा. हमारा सिस्टम उनसे बहुत अलग है और हमारे काम करने का तरीका भी बहुत अलग है और अब तक हम उम्मीद के मुताबिक ही काम कर पाए हैं, इसलिए हम उम्मीद कर रहे हैं कि 23 अगस्त की लैंडिंग भी उम्मीद के मुताबिक ही होगी.
लैंडिंग से पहले का समय सबसे महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है इस पर पूर्व इसरो चीफ ने कहा, एक मिशन में कई प्रणालियां शामिल होती हैं और अंतरिक्ष में आंतरिक प्रणाली शुरुआत में काम कर सकती है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि यह कुछ समय बाद भी काम करेगी. इसलिए इस प्रकार की दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटनाएं हमेशा हो सकती हैं लेकिन हम उम्मीद कर रहे हैं कि यह काम करेगा, यह अभी भी काम कर रहा है और यह काम करना जारी रखेगा. हमारा यही मानना है और हमें अपने मिशन पर भरोसा है.
चंद्रयान-3 की लैंडिंग चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र (South Pole) पर होनी है जहां अब तक कोई भी देश लैंडिंग नहीं कर पाया है. ऐसे में भारत ने चंद्रयान-3 की लैंडिंग के लिए दक्षिणी ध्रुव ही क्यों चुना है? इस पर के सिवन ने कहा, NASA की रिपोर्ट के मुताबिक चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर बर्फ है और वहां दूसरे प्राकृतिक संसाधन भी हो सकते हैं. साल 1998 में नासा के मून मिशन में चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर हाइड्रोन की मौजूदगी का पता लगा था. नासा के अनुसार, हाइड्रोजन की मौजूदगी वहां बर्फ होने का सबूत हो सकता है. जानकारी के अनुसार चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर बड़े पहाड़ और कई बड़े-बड़े क्रेटर्स हैं. यहां सूरज की रोशनी भी यहां बहुत कम पड़ती है.
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