Gopaldas Neeraj Birth Anniversary: हिंदी साहित्य और हिंदी कविता का एक ऐसा नाम जिसनें अपने जीवन की आखिरी सांस तक कृतियां और नग्में गढ़ी हैं. कविता को मंच पर बिठाने की ज़िम्मेदारी लिए इस कवी ने हिंदी काव्य पाठ को एक नई ऊंचाई दी. ‘कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे’, जैसी ज़िंदा पंक्ति को रचने वाले हिंदी के सबसे लाडले बेटे गोपालदास सक्सेना ‘नीरज’ की आज 95वीं जयंती है.

नीरज ने अपनी ज़िंदगी में ना जानें कितनी महफ़िलों की शमा रौशन की मगर उनके दिल ने कभी शोहरतों और पैसों का पीछा नहीं किया. पद्मभूषण पुरस्कार से सम्मानित नीरज का जन्म उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के पुरवाली गांव में 4 जनवरी 1925 को हुआ. नीरज ने जितना योगदान हिंदी साहित्य में दिया है उतनी ही मेहनत उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में भी किया. नीरज पहले ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में भारत सरकार ने दो-दो बार सम्मानित किया. 1991 में पद्मश्री और 2007 में पद्मभूषण पुरस्कार से उन्हें नवाज़ा गया.

नीरज ने हिंदी साहित्य के साथ उर्दू अदब की भी बड़ी मोहब्बत से ख़िदमत की. उन्हें ‘विश्व उर्दू पुरस्कार’ से भी सम्मानित किया गया. नीरज एक ऐसा व्यक्तित्व जिनके साए में कविता ने खुद को निखारना शुरू कर दिया. एक किस्सा जो नीरज के जीवन का अभिन्न अंग रहा वो ये था कि जब उन्होंने मेरठ कॉलेज, मेरठ में हिंदी प्रवक्ता के पद पर काम करना शुरू किया तब उन पर कुछ महीने के अंदर ही कॉलेज प्रशासन द्वारा कक्षाएं न लेने और रोमांस करने के आरोप लगाए गए जिससे गुस्सा होकर नीरज ने स्वयं ही नौकरी से इस्तीफा दे दिया.

इस महा कवी ने कवी सम्मेलनों और मुशायरों के अलावा हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में भी अपने गीतों से लोगों का दिल जीता है. नीरज के हिस्से में कई सुपरहिट गानें सांस लेती हैं जिनमें ‘काल का पहिया घूमे रे भइया!’ (फ़िल्म: चंदा और बिजली),  ‘बस यही अपराध मैं हर बार करता हूँ’ (फ़िल्म: पहचान), ‘ए भाई! ज़रा देख के चलो’ (फ़िल्म: मेरा नाम जोकर) शामिल हैं.

फिल्मी दुनिया में भी नीरज ने हिंदी काव्य का परचम बड़ी बुलंदी पर लहराया है. उन्हें लगातार तीन बार फिल्म फेयर पुरस्कार से भी नवाज़ा गया है. सादगी और ज़िंदादिली का पोशाक ओढ़े नीरज ने इस दुनिया को 19 जुलाई 2018 को अलविदा कह दिया था. साहित्य और सिनेमा के इस ‘गुरूर’ को हम तहे दिल से श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं.