राजस्थान विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार अंतिम दौर में है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी तक वहां लगातार प्रचार कर रहे हैं. दूसरी तरफ बीजेपी, कांग्रेस के साथ-साथ बसपा-सपा के अलावा हनुमान बेनीवाल और घनश्याम तिवाड़ी जैसे नेताओं ने चुनाव जीतने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है. राज्य में एक तरफ हर पांच साल में सरकार बदलने की परिपाटी की चर्चा है तो दूसरी तरफ वसुंधरा राजे, अशोक गहलोत और सचिन पायलट पर बात हो रही है. जनता वोटिंग से एक दिन पहले 6 दिसंबर तक इंतजार करने की बात कह रही है. ऐसे में राजस्थान के जयपुर, दौसा, भरतपुर, टोंक और रामगढ़ के अलावा कई विधानसभा सीट में चुनाव मिजाज देखने के बाद ये कहा जा सकता है कि चुनाव इन 5 मुद्दे के इर्द-गिर्द ही घूम रहा है.

कभी राजेश पायलट का गढ़ रहा दौसा हो या बीजेपी का मजबूत किला जयपुर. भरतपुर या टोंक. राजस्थान की जनता चुनाव में पार्टियों-नेताओं के साथ-साथ निर्दलीयों को भी भांप रही है. जनता चुनाव की बात तो कर रही है, लेकिन अभी भी वह 7 दिसंबर को वोटिंग से पहले तक बदलने वाली हर स्थिति पर नजर बनाए हुई है. ऐसे में ये कह सकते हैं कि राज्य में एंटी इनकम्बेंसी तो है, लेकिन जनता का मिजाज अभी भी स्पष्ट तौर पर नहीं बन पाया है. आइए जानते हैं कि किन 5 मुद्दे पर राजस्थान की जनता बात कर रही है?

1> विकास
साल 2013 से चुनावों में कोई शब्द सबसे ज्यादा सुना या बोला जा रहा है तो वह विकास है. राजस्थान की भी जनता इस मुद्दे पर सवाल खड़ा कर रही है. वह वसुंधरा राजे सिंधिया की वर्तमान सरकार को देख रही है और अशोक गहलोत की पुरानी सरकार से तुलना कर रही है. वहीं, सचिन पायलट से भी उम्मीद लगाए हुए है. इस बीच वह पीएम नरेंद्र मोदी पर भी बात करने लग रहे हैं. राज्य में स्मार्ट सिटी से लेकर बिजली, सड़क और पानी पर तो चर्चा हो ही रही है. कोटपुतली के रहने वाले सूरज मीणा कहते हैं कि राज्य में विकास के नाम पर कुछ नहीं हुआ है. युवा से लेकर बुजुर्ग कभी आधार कनेक्ट कर रहा हैं तो कभी कुछ. वह उसी में उलझे हुए हैं और कार्यकाल बीत गया. दूसरी तरफ शाहपुरा के दौलतराम मीणा दौसा की चमचमाती सड़क का हवाला देते हुए कहते हैं कि ये सड़क बता रही है कि राज्य की मूलभूत सुविधाओं पर वसुंधरा सरकार ने कितना काम किया है.

राहुल गांधी को ‘जादू दिखाने’ वाला शख्स, आज कैसे बन गया कांग्रेस का ‘चाणक्य’

2> सीएम का चेहरा
राजस्थान में सीएम का चेहरा एक बड़ा सवाल है. बीजेपी की तरफ झुकाव रखने वाले सीएम के चेहरे पर वसुंधरा राजे सिंधिया को लेकर उतने उत्साहित नहीं दिख रहे हैं. उनमें थोड़ी नाराजगी है तो मुख्यमंत्री की कार्यप्रणाली को लेकर चिंता भी है. दूसरी तरफ अशोक गहलोत उनके लिए पुराने परखे हुए चेहरे हैं तो सचिन पायलट के रूप में एक युवा नेतृत्व देख रहे हैं. जनता, गहलोत और पायलट को लेकर उम्मीदें पालती दिख रही है. हालांकि, एक पक्ष ये कह रहा है कि कांग्रेस सीएम के फेस को लेकर अंतर्कलह की स्थिति में है तो दूसरा पक्ष ये कह रहा है कि दोनों में से कोई सीएम बन जाए, बस सरकार बदलनी चाहिए. लब्बोलुआब ये है कि राज्य में सीएम कौन होगा, इस पर भी खूब बात हो रही है. रामगढ़ के साधुराम का कहना है कि कांग्रेस अपने में लड़ रही है. पहले दो सीएम थे और अब सीपी जोशी ने कह दिया है कि राज्य में 5 सीएम कैंडिडेट हैं. ऐसे में वहां आंतरिक गुटबाजी दिखती है. दूसरी तरफ साधुराम का कहना है कि वसुंधरा से जनता खुश नहीं है. गहलोत अनुभवी हैं तो पायलट युवा हैं. दोनों में से कोई भी सीएम बन जाए.

3> बागी उम्मीदवार
बीजेपी और कांग्रेस से टिकट नहीं पाए कई मंत्री, विधायक, पूर्व मंत्री से लेकर कद्दावर नेता तक बगावत कर मैदान में उतर गए हैं. वहीं, कई को दूसरी क्षेत्रीय पार्टियों का सहारा मिला है. ऐसे में वह अपनी-अपनी सीट पर मजूबत लड़ाई लड़ते दिख रहे हैं. राज्य में उन्हें लेकर भी कई तरह की चर्चाएं हैं. कहीं ये कहा जाता है कि 40-50 निर्दलीय चुनाव जीतेंगे तो कहीं या तक कहा जाता है कि सरकार किसकी बनेगी, यह निर्दलीय ही तय करेंगे. दौसा हो या जयुपर शहर, निर्दलीय उम्मीदवारों पर खूब चर्चा हुई. स्थानीय व्यापारी रवि खंडेलवाल कहते हैं कि बीजेपी और कांग्रेस ने अपने काम करने वाले विधायकों के टिकट काटे हैं. ऐसे में निर्दलीय काफी संख्या जीतेंगे. उन्होंने खुद लोकतांत्रिक कांग्रेस के उम्मीदवार को वोट देने की बात कही.

बेटी, बहू, समधन बन वोट मांगती हैं ये ‘महारानी’, मध्य प्रदेश में हारने वाली कैसे बनीं राजस्थान की सीएम

4> रोजगार और किसान
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी रोजगार और किसान की बात लगातार कर रहे हैं. वहीं, कांग्रेस का पूरा संगठन इस मुद्दे को गांव की पगडंडी से लेकर शहर की गलियों तक पहुंचाने की कोशिश कर रहा है. वह वसुंधरा सरकार से लेकर नरेंद्र मोदी सरकार तक पर इस मुद्दे पर जमकर आलोचना कर रहे हैं. वहीं, बीजेपी पिछले 70 साल का हवाला देते हुए कह रही है कि औसत निकाली जाए तो बीजेपी की सरकारों ने रोजगार सृजन का काम तो किया ही, किसानों के हित में ज्यादा फैसले लिए. बहरहाल, रोजगार और किसान का मुद्दा भी राज्य में छाया है.

5 > नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी
नरेंद्र मोदी जबसे राष्ट्रीय राजनीति में आए हैं और फिर प्रधानमंत्री बने हैं राज्यों के चुनाव में भी वह बीजेपी का चेहरा बने हैं. यूपी-बिहार से लेकर कश्मीर तक, नॉर्थ ईस्ट से लेकर गुजरात और कर्नाटक चुनाव तक बीजेपी नरेंद्र मोदी के चेहर पर ही चुनाव लड़ी है. इसके साथ ही वह यह नैरेटिव गढ़ने में कामयाब हुई है कि देश को एक मजबूत नेतृत्व की जरूरत है, जो सिर्फ नरेंद्र मोदी ही हैं. वहीं, कांग्रेस मोदी के मुकाबले राहुल गांधी को प्रोजेक्ट करने की कोई कसर नहीं छोड़ रही है. वह केंद्र और राज्य में बीजेपी सरकार की नाकामियों की गिनाने में जुटी है. इसमें नोटबंदी से लेकर राफेल और बेरोजगारी से लेकर किसानों तक के मुद्दे शामिल हैं. ऐसे में राज्यों के नेताओं के साथ-साथ नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी पर भी खूब चर्चा हो रही है. जनता सीएम फेस के साथ-साथ मोदी-राहुल पर भी बात कर रही है. एक पक्ष ये कह रहा है कि अंतिम दिनों में नरेंद्र मोदी के प्रचार से असर पड़ेगा और राजस्थान चुनाव भी गुजरात चुनाव की तरह साबित होगा तो दूसरा पक्ष ये कह रहा है कि नरेंद्र मोदी का करिश्मा खत्म हो चुका है.