नई दिल्ली. राष्ट्रीय जनता दल के सुप्रीमो लालू यादव इन दिनों चारा घोटाला के एक मामले में रांची जेल में हैं. बीते लोकसभा चुनाव के दौरान उनकी पार्टी के बिहार में अब तक के शर्मनाक प्रदर्शन को लेकर भी इन दिनों लालू यादव और उनके परिवार पर तंज कसे जा रहे हैं. हालांकि लालू यादव को जानने-समझने वाले जानते हैं कि इन सबके बीच भी लालू ऐसे असाधारण व्यक्ति हैं, जो उठकर खड़ा होना और दौड़ना जानता है. बहरहाल, आज लालू यादव का जन्मदिन है. हालांकि अपने जन्मदिन को लेकर उन्होंने खुद ही कई बार कहा है कि उन्हें आधिकारिक तारीख नहीं मालूम, लेकिन स्कूल के प्रमाणपत्र में इसे 11 जून की तारीख के रूप में दर्ज किया गया है.

हाल ही में लालू यादव के जीवन-संघर्ष को लेकर आई एक किताब ‘गोपालगंज से रायसीना’ में लालू ने कहा भी है, ‘मेरा जीवन बेहद मामूली ढंग से शुरू हुआ. मेरे आसपास सब कुछ इतना साधारण था कि उससे साधारण कुछ और हो ही नहीं सकता. ऐसा लगता है कि घर में किसी को यह भी पता नहीं था कि मैं पैदा किस दिन हुआ. मेरे स्कूल के प्रमाणपत्र में यह 11 जून 1948 दर्ज है, और मैं हर साल इस दिन जन्मदिन की बधाई स्वीकार करता हूं.’

अपने जन्मदिन के बारे में लालू आगे बताते हैं, ‘मुझे पता नहीं कि रिकॉर्ड में यह कैसे दर्ज हुआ, क्योंकि मेरी मां को भी इसकी सिर्फ धुंधली-सी याद भर थी.’ अपने जन्म की कहानी बताते हुए लालू ने कहा है, ‘एक बार जब मैंने जोर देकर जानना चाहा कि आखिर मैं पैदा कब हुआ था, तो वह (लालू की मां) नाराज हो गई थीं. बेरुखी से उन्होंने कहा था कि इससे क्या फर्क पड़ता है. जब मैंने जिद की- यह तब की बात है जब मैं हाईस्कूल में पढ़ता था- तो वह कुछ मायूस हो गईं. वह बोलीं- हमरा नाइखे याद, तू अन्हरिया में जन्मला की अंजोरिया में.’ हालांकि बाद में लालू यादव की मां ने बेटे को खुश करने के लिए उस धगरिन दाई को बुलवाया, जिसने उनके पैदा होने में मदद की थी. राजद सुप्रीमो के जन्मदिन की इसी कहानी के बीच आइए आज पढ़ते हैं उनके बचपन से जुड़ी एक रोचक कथा, जिसमें उनका सामना भूतों से हो गया था.

बरम बाबा के डेरे के बाद श्मशान की सैर

मेरे पिता लोग तीन भाई थे. उनके एक भाई सूधन राय ने शादी नहीं की और संन्यासी हो गए थे. वह काली माई और स्थानीय देवता बरम बाबा की पूजा करते थे और लोगों के शरीर में घुस गए भूतों को भगाते थे. हम जब कभी भात और मछली की बात करते थे, तो वह नाराज हो जाते और गालियां देने लगते. एक बार मेरा भी भूतों से सामना हो गया. यह गर्मियों की चमकदार पूर्णिमा की रात थी. हमारे घर के पीछे एक बड़े से पीपल के पेड़ के नीचे बरम बाबा का अपना ठिकाना था. गांव के एक काका सोरठी-बिरिजभार (भोजपुरी लोक प्रेमकथा) गा रहे थे और बरम बाबा के डेरे में रात्रिभोज के बाद घेरे में बैठकर लोग उन्हें सुन रहे थे. श्रोताओं में मैं भी शामिल था. मुझे चैता, बिरहा, होली, सोरठी और अन्य लोक गीत सुनना अच्छा लगता है और मैं आज भी इन्हें सुनता हूं, क्योंकि ये आपको जड़ों से जोड़े रखते हैं.

प्रस्तुति के दौरान वहीं बरम बाबा के नजदीक गेहूं के पुआल के ढेर में मेरी नींद लग गई. मुझे पता ही नहीं चला कि कब काका ने गाना बंद कर दिया और अन्य ग्रामीण अपने घरों को चल दिए. अचानक दो लड़कों ने मेरे दोस्तों का स्वांग भरकर मुझे जगा दिया और अपने साथ आने के लिए उकसाया. मैं उनींदा था और मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था. वे गांव के बाहर स्थित श्मशान की ओर बढ़ रहे थे और मैं आंखें मलता हुआ उनके पीछे चल रहा था. कुछ दूर चलने के बाद मैं वहीं खेत में लघुशंका के लिए बैठ गया. वे दोनों लड़के मेरे नजदीक खड़े रहे, उनके सिर और चेहरे आधे ढंके हुए थे. मैं जब पेशाब कर ही रहा था, उसी समय हमारे गांव के एक बुजुर्ग तपेसर बाबा अपनी हथेलियों में खैनी लते वहां से गुजर रहे थे और उन्होंने पूछा, ‘कौन है रे?’

मैंने जवाब दिया, ‘हम हैं ललुआ’.

‘तुम कहां जा रहे हो? उठो और घर जाओ.’

जैसे ही तपेसर बाबा ने निर्देश देने के अंदाज में यह कहा, दोनों लड़के वहां से भाग गए. मैं घर लौट आया. अगले दिन सुबह मैं उन दोनों दोस्तों के पास गया, जो मुझे श्मशान घाट ले जा रहे थे. उन्होंने दावा किया कि वे तो रात में अपने घरों में सो रहे थे. यह सुनकर मैं भौंचक्का रह गया और तुरंत तपेसर बाबा के घर गया. उन्होंने भी कहा कि रात में जिस जगह पर वह मुझे मिले थे, वहां वह नहीं गए थे. उन्होंने कहा, ‘मैं तो घर पर सो रहा था.’ मेरा तो दिमाग ही चकरा गया. मैंने मां को सारी बातें बताई. वह बोलीं, ‘जो लोग तुम्हारे दोस्तों का स्वांग भरकर आए थे, वे भूत थे. बरम बाबा ने तपेसर बाबा का रूप धारण कर तुमको बचाया. मेरे बेटे, बरम बाबा ने तुम्हें भूतों से बचाया, वरना वे तुम्हें श्शान घाट ले जाकर मार भी सकते थे.’ उन्होंने मुझे बरम बाबा की प्रार्थना करने की सलाह दी. आज तक जब कभी मैं अपने गांव जाता हूं बरम बाबा के सामने सिर झुकाए बिना आगे नहीं बढ़ता.

(साभारः नलिन वर्मा लिखित पुस्तक ‘गोपालगंज से रायसीना’)