पटना: ‘सुशासन बाबू’ के नाम से नीतीश कुमार को कई लोग बुलाते हैं. ऐसे में नाम से साफ होता है कि नीतीश की छवि लोगों के नजरों में क्या है. नीतीश कुमार ने कभी भी भ्रष्टाचार को समर्थन नहीं दिया. चाहे लालू प्रसाद यादव के चारा घोटाला मामले को लेकर बिहार में जदयू और आरजेडी गठबंधन की सरकार को भंग करना रहा हो या फिर प्रशांत किशोर के बयानबाजी के कारण उन्हें पार्टी से निकालना. नीतीश ने हमेशा फैसले लेने में कोताही नहीं बरती है. आज नीतीश कुमार का जन्मदिन है. आज ही के दिन साल 1951 में सुशासन बाबू का जन्म नालंदा जिले के हरनौत कल्याण बिगहा गांव में हुआ था. आज हम आपको उनके जीवन के संघर्षों से रूबरू कराने वाले हैं और बताएंगे कि कैसे उनकी राजनीति में एंट्री हुई. Also Read - बिहार के मुख्यमंत्री को जान मारने की धमकी, 25 लाख रुपये का रखा इनाम

सुशासन बाबू का जन्म Also Read - पैसे नहीं होने पर पत्नी ने उठाया नीतीश कुमार का चुनावी खर्च, आज बिहार के राजनीतिक तख्त पर है दबदबा

नीतीश कुमार का जन्म 01 मार्च 1951 में बिहार के नालन्दा जिले में हुआ था. उनके पिता कविराज राम लखन एक वैध थे. नीतीश कुमार को उनके पिता मुन्ना कहकर बुलाया करते थे. Also Read - नीतीश कुमार का बयान- एनपीआर 2010 के प्रारूप में हो लागू, केंद्र को लिखा पत्र

सरकारी नौकरी छोड़ बनाई सरकार

नीतीश कुमार ने अपनी स्कूल की पढ़ाई बख्तियारपुर स्थित गणेश हाईस्कूल से पूरी की है. इसके बाद उन्होंने बिहार से ही इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की और बिहार बिजली विभाग में नौकरी करने लगे. हालांकि उनका मन कभी भी इस नौकरी में नहीं लगा और उन्होंने बिजली विभाग की नौकरी छोड़कर राजनीति में एंट्री करने का फैसला लिया. नीतीश कुमार को उनकी पहचान इंदिरा गांधी की सरकार के दौरान हुए जेपी आंदोलन से मिली.

एक आंदोलन ने बदली जिंदगी

साल 1974 में देश में इंदिरा गांधी की सरकार थी. कांग्रेस सरकार में बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार को लेकर पूरे देश में आंदोलन हो रही थी. इस आंदोलन का नेतृत्व जय प्रकाश नारायण (जेपी नारायण) कर रहे थे. इस आंदोलन की अगुवाई बिहार में नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान कर रहे थे. इस आंदोलन में नीतीश कुमार ने अहम भूमिका निभाई थी. यहीं से नीतीश कुमार के राजनीतिक सफर की शुरुआत मानी जाती है, क्योंकि इस आंदोलन के बाद उन्हें काफी पहचान मिली और पूरे देश में लोग उन्हें पहचानने लगे थे.

परिवार की जिम्मेदारी और गरीबी

नीतीश कुमार के पिता कविराज राम लखन का निधन साल 1978 में हो गया. इसके बाद परिवार की पूरी जिम्मेदारी नीतीश के कंधे पर आ गई थी. लोग यहां तक बताते हैं कि पिता के निधन के बाद नीतीश के पास अखबार पढ़ने तक के पैसे नहीं थे. हालांकि इससे पहले नीतीश कुमार जनता पार्टी की तरफ से साल 1977 में चुनाव लड़ चुके थे लेकिन इस चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था.

पत्नी ने उठाया चुनावी खर्चा

साल 1977 में जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ने व हारने के बावजूद भी नीतीश राजनीति से दूर नहीं हुए. इसके बाद साल 1985 में उन्होंने लोकदल से चुनाव लड़ा था. इस दौरान उन्हें चुनाव लड़ने के लिए पार्टी की तरफ से काफी कम पैसे मुहैया कराए गए थे. इतने कम पैसे में चुनावी खर्चे पूरे नहीं हो सकते थे. ऐसे वक्त में नीतीश की पत्नी मंजू सिन्हा ने नीतीश का साथ दिया और उन्हें पैसे दिए. लेकिन मंजू सिन्हा ने एक शर्त भी रखी थी कि अगर इस चुनाव में जीत नहीं हुई तो नीतीश को राजनीति से दूर होना होगा. तब जाकर नीतीश कुमार की पत्नी ने उन्हें अपनी बचत के पैसों को नीतीश कुमार को दे दिया ताकि वो चुनाव लड़ सके. बता दें कि मंजू सिन्हा पटना के स्कूल में शिक्षक थीं.

जीत का स्वाद

नीतीश कुमार ने हरनौत से बिहार विधानसभा चुनाव पहली बार जीता. इसके बाद उन्होंने कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा और एक के बाद एक जीत उनके कदमों में आती गई. साल 1987 में नीतीश कुमार को युवा लोकदल का अध्यक्ष चुन लिया गया. साल 2000 में नीतीश कुमार पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने थे. इस दौरान उनका कार्यकाल मात्र 7 दिनों तक चला और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था. इसके बाद साल 2002 में नीतीश कुमार को रेलवे मंत्री बनाया गया और उन्होंने रेलवे विभाग में कई सारे रिफॉर्म्स लाए. तत्काल ऑनलाइन टिकट की सुविधा नीतीश कुमार की ही देन है. 30 अक्टूबर 2003 को उन्होंने खुद की पार्टी जनता दल यूनाइटेड की स्थापना की जिसमें कई पार्टियों का विलय किया गया. नीतीश कुमार आज भी बिहार के मुख्यमंत्री हैं.