खेलों के महाकुंभ यानी ‘ओलंपिक’ में जिन दो भारतीय महिला खिलाड़ियों ने बैडमिंटन स्पर्धा में पदक जीता है उनमें से एक का नाम पुसरला वेंकट सिंधू है, जिन्हें दुनिया पीवी सिंधू (PV Sindhu) के नाम से जानती है. सिंधू ओलंपिक में सिल्वर मेडल जीतने वाली भारत की पहली महिला बैडमिंटन खिलाड़ी हैं. 5 जुलाई 1995 को हैदराबाद में जन्मी इस बेहद प्रतिभावान खिलाड़ी ने 8 साल की उम्र में रैकेट अपने हाथ में थामा. इसके बाद से वह पीछे मुड़कर नहीं  देखीं और लगातार सफलता की सीढ़ी चढ़ती चली गईं. सिंधू आज अपना 25वां बर्थडे सेलिब्रेट कर रही हैं.Also Read - Tokyo Olympics 2020: जानें भारत की पहली महिला डबल ओलंपिक पदक विजेता पी वी सिंधु के बारे में

8 साल की उम्र में थामा रैकेट  Also Read - टोक्यो ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने के बाद बोली सिंधू- गोपी सर ने बधाई दी लेकिन साइना ने नहीं

सिंधू सितंबर 2012 में बीडब्ल्यूएफ वर्ल्ड महिला एकल रैंकिंग में टॉप 20 में जगह बनाने के बाद इंटरनेशनल स्तर पर सुर्खियों में आईं. इसके बाद वह टॉप 10 में पहुंचीं. सिंधू के पिता पीवी रमन्ना और माता विजया नेशनल स्तर के वॉलीबॉल खिलाड़ी रहे हैं. खेल में उल्लेखनीय योगदान के लिए पीवी रमन्ना को 2002 में अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. ऐसे में कहा जा सकता है कि उन्हें खेल विरासत में मिला है. महज आठ साल की उम्र में बैडमिंटन को अपनाने वाली सिंधू ने इसके बाद पुलेला गोपीचंद अकादमी का रूख किया. Also Read - Tokyo Olympics 2020 PV Sindhu Win: जीत के बाद मैं कुछ पलों के लिए सन्‍न थी, PV Sindhu बोलीं- कोच ने गले लगाया तो...

ट्रेनिंग के लिए 56 किलोमीटर की दूरी तय करती थीं

पीवी सिंधू ट्रेनिंग के लिए रोजाना 56 किलोमीटर की दूरी तय करती थीं. ट्रेनिंग अकादमी जाने के लिए वह रोज सुबह 3 बजे उठती थीं. उनकी ट्रेनिंंग क्लास सुबह 4:30 बजे शुरू होती थी. ट्रेनिंग के बाद वह सुबह 8:30 बजे स्कूल जाती थीं. लेकिन अब सिंधू के घर से गोपीचंद की अकादमी महज कुछ ही मिनट की दूरी पर है.

अंडर14 कैटेगरी में बनीं चैंपियन 

लंबी कद की इस खिलाड़ी का पहला ऑफिशियल टूर्नामेंट 5वां सर्वो ऑल इंडिया रैंकिंग चैंपियनशिप रहा. सिंधू ने इस टूर्नामेंट के अंडर10 कैटेगरी में हिस्सा लिया था. इसके बाद उन्होंने पुणे में आयोजित अंडर13 कैटेगरी में  सब जूनियर नेशनल्स और ऑल इंडिया रैंकिंग टूर्नामेंट का डबल्स खिताब अपने नाम किया. भारत में आयोजित 51वें नेशनल स्कूल गेम्स में सिंधू ने गोल्ड जीता. वह अंडर-14 कैटेगरी में चैंपियन बनीं.

सिंधू ने साल 2009 में सब जूनियर एशियन बैडमिंटन चैंपियनशिप के जरिए इंटरनेशनल स्तर पर डेब्यू की. उन्होंने इस चैंपियनशिप के जरिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना पहला ब्रॉन्ज मेडल जीता. साल 2010 में सिंधू इरान इंटरनेशनल बैडमिंटन चैलेंज और जूनियर वर्ल्ड बैडमिंटन चैंपियनशिप (मैक्सिको) के क्वार्टर फाइनल में पहुंचने में सफल रही थीं. 17 साल की उम्र में उन्होंने एशियन जूनियर चैंपियनशिप अपने नाम किया.

वर्ल्ड चैंपियनशिप में जीत चुकी हैं 5 मेडल 

साल 2013 और 2014 में सिंधू ने वर्ल्ड चैंपियनशिप में लगातार दो ब्रॉन्ज मेडल जीते. वह इस वर्ल्ड चैंपियनशिप में लगातार दो मेडल जीतने वाली पहली भारतीय शटलर बनीं. वह इस प्रतिष्ठित प्रतियोगिता में दो सिल्वर मेडल  (2017, 2018) जीत चुकी हैं।

साल 2016 में आया करियर में बड़ा मोड़

सिंधू के करियर के लिए साल 2016 बेहतरीन रहा जहां उन्होंने रियो ओलंपिक में सिल्वर मेडल जीता. वह रियो ओलंपिक में भारत की ओर से सिल्वर मेडल जीतने वाली सबसे युवा एथलीट बनीं. इसके बाद उन्हें देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पदम श्री से 2015 में सम्मानित किया गया. सिंधू को साल 2016 में राजीव गांधी खेल रत्न से भी सम्मानित किया जा चुका है.

हैंडबॉल की खिलाड़ी रह चुकी हैं बड़ी बहन 

महिला वर्ल्ड रैंकिंग में कभी नंबर दो रह चुकीं सिंधू की बड़ी बहन दिव्या नेशनल स्तर पर हैंडबॉल की खिलाड़ी रह चुकी हैं। हालांकि बाद में वह डॉक्टर बन गईं।

गोपीचंद से मिली बैडमिंटन खेलने की प्रेरणा

सिंधू को बैडमिंटन खेलने की प्रेरणा मौजूदा नेशनल टीम के कोच पुलेला गोपीचंद से मिली. गोपीचंद ने  साल 2001 में ऑल इंग्लैंड चैंपियनशिप जीता था. उसके बाद से सिंधू ने भविष्य में बैडमिंटन अपनाने का निर्णय लिया. साल 2019 में वर्ल्ड चैंपियनशिप में गोल्ड जीतकर सिंधू ने इतिहास रच दिया. वह ये कारानामा करने वाली भारत की पहली बैडमिंटन खिलाड़ी हैं.

‘कभी पढ़ाई छोड़ने का ख्याल मन में नहीं आया’

सिंधू का कहना है कि उनके मन में कभी भी ये ख्याल नहीं आया कि बैडमिंटन के लिए वह पढ़ाई को छोड़ दें. सिंधू ने हाल में एक सवाल के जवाब में कहा था, ‘ मैं पहले इसे फन के तौर पर खेलती थी. मेरे माता पिता जो वॉलीबॉल खिलाड़ी रह चुके हैं उन्होंने मुझे प्रोत्साहित किया. उन्होंने कहा कि तुम इस खेल को इंज्वाय करो ना कि हार -जीत के बारे में सोचो. मैंने शुरुआत की और हर  दिन मैं अच्छा करती चली गई. मैंने बचपन से पढ़ाई छोड़ने के बारे में नहीं सोची. पढ़ाई भी उतनी ही अहम है. खेल आपको पढ़ाई में अच्छा करने में मदद करता है.’